Religious Venom

भारत में आज जातिगत व् धार्मिक उन्माद सामूहिक विनाश के हथियार बन गये है किसी रासायनिक या जैविक हथियार से कम नहीं हैं।

ये ऐड्स की बीमारी की तरह फैल रहे है जिसका कोई इलाज नही..कल की धार्मिक सोच आज एक खूनी कट्टरता में तब्दील हो रही हैं…इसका नतीज़ा बहुत भयावह है।

विनाश के ये वायरस कोई और नहीं बल्कि कुछ सत्तालोलुप, क्रूर व् आत्यायी किस्म के लोग फैला रहे हैं और करोड़ों लोगो को अपने स्वार्थ के कारण धर्मों की लड़ाई में झोंकने से नहीं हिचक रहे हैं।

इनके भड़काऊ भाषणों व् सभाओं पर तुरंत प्रतिबन्ध लगना चाहिये।TRP के भूखे मीडिया को अपने शोज में इन लोगों को जगह देना बंद करना चाहिये।

किसी अभद्र व् अश्लील साहित्य की तरह ये युवा मन में गहरे पैंठ रहे हैं और आज का युवा हिंसा व् धार्मिक निंदा का आदी हो रहा है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भावनाओ से खेला जा रहा है व् भड़काया जा रहा है।

हर जगह धार्मिक निंदा की उल्टी फैलाई जा रही है।

स्थिति बद से बदतर होती जा रही हूं ,समय रहते इनपर लगाम लगानी होगी……

Rapes in India

Those that point to higher incident counts of rape in less developed countries in Africa and Asia, fail to take into account that these incident counts have risen proportionally to change in religious demographics, driven by rising conversion rates.

The two other south Asian countries which have higher rate of crime against women are Pakistan and Banglafesh but Compared to India, Bangladesh is a BPL dominant economic landscape. Compared to India, Pakistan as a failed state has no independent cultural identity.

But India?

India is a kaleidoscopic diverse nation, with a ethnically rooted cultural identity.

Things weren’t so bad until politics seeded cultural hate among otherwise peaceful citizens of India.

Rape is a heinous crime against womanhood and against humanity.

Rape isn’t perpetrated by a specific caste, religion or region. The victims of rape are women; rape isn’t a crime against the identity of its victims. Rape is a crime against women, not against religious beliefs. Unparallel suffering is cause to the women victims, and not to the society they belong to.

No one has a right to decide the punishment for a rapist, except the woman victim herself. Only the woman victim has experienced it’s brutality, the physical agony, the death of courage, the expiration of the fighting spirit and confidence. She may never be the same person again, and may live in fear the rest of her life.

Then the culprits too, must bear the agony. The rapist must live in fear the rest of his life. He must be scared to fail in front of a woman, and must experience the deepest humiliation.

Despite increasingly harsh punishments, rapes in India are increasing. The law had failed to instill the fear of punishment in rapists. The degree of cruelty and brutality is rising every day.

50℅ of voters in this country are women, then
why can’t this country provide 50% of its citizens a basic right to safety?

billions are spent on Z-class security and VIP motorcades but the common people are most unsafe?

Let us not blame it on any segment of society.

Let us accept the fact that the system has failed to provide basic security to its women citizens.

There should be exceptions in terms of rape sentencing, because today rapes are more publicized then the punishment of their culprits.

Make punishments public.

Hammer them in public, castrates them in public, stop all sorts of govt benefits and privileges to their entire family.

Let families realise that because of one person’s lack of ability to coexist, how much they have to suffer. There should be open and public disgrace delivered to such people.

And believe me this will stop the rapes…. क्योकी हम हिंदुस्तानी भगवान से नही डरते, लेकिन लोग क्या कहेंगे उससे बहुत डरते हैं |

बेटा-बेटी

एक चौराहे के पास से गुजरते हुए वो देखा जो मैंने पहले कभी नही देखा था।

चौराहे पर टाइल्स लगाने का काम चल रहा था,और वहां दो 17 या 18 साल की लड़कियां टाइल्स लगाने का काम बडी ही कुशलता से कर रही थी।

शायद उतनी कुशलता से कि कोई पुरुष मिस्त्री भी नही लगाता होगा ।दोनों तन्मयता से काम कर रही थी।

दोनों ने अच्छे मॉर्डन कपड़े पहन रखे थे और पूछने पर पता चला एक 9वी क्लास में पढ़ती है और दुसरीं 10वी में।

उनका पिता बीमार था। घर मे 2 छोटे भाई भी थे। लेकिन पिता के द्वारा लिए गये टाइल लगाने के ठेके को पूरा करना था। इन दोनों बहनों ने काम पूरा करने का बीड़ा उठाया और स्कूल से आने के बाद वो शाम को 7 बजे तक टाइल्स लगाती थी 5 दिन में काम पूरा कर दिया।

ये वो बेटियाँ हैं जिन्होंने बेटे की जगह ली, ये उन बेटीयों से कम नही जो महंगी डिग्री पाकर डॉक्टर या इंजीनियर बनती हैँ।

दुसरीं घटना एक हाइवे की थी जहां एक माँ व बेटी चाय समोसे की दुकान चला रही थी बगल ही में दुसरीं बेटी पंक्चर लगाने की दुकान लगाई थी ,जो कला उसने अपने मृत पिता से सीखी थी। घर मे कोई पुरुष नही था सिर्फ विधवा माँ और दो बेटियां लेकिन बेचारगी से जीने के जगह उन्होंने हिम्मत से जीना सीखा।

मैं हैरान ही नही बल्कि प्रभवित भी थी। ये भारत की असली बेटियाँ हैँ जो इतनी विपरीत परिस्थियो में इतनी सहजता से काम कर रही थीं।

हमारे समाज मे एक विचारधारा है कि औरतें कुछ गिने चुने काम कर सकती हैं।

कोई बढ़ई अपनी बेटी को लकड़ी का काम नही सिखाता!

कोई ऑटो वर्कशॉप वाला अपनी बेटियों को गाड़ी का इंजन बांधना नही सीखाता!

कोई सुनार अपनी बेटियों को गहने गढ़ना क्यों नही सिखाता?

कोई दुकानदार अपनी बेटी को गल्ले पर बैठना नही सिखाता?

बिल्डिंग बनाने वाला ठेकेदार अपनी बेटी को बालू मोरंग का मिश्रण नही समझाता।सरिये का भाव नही बताता!

बेटे भले ही निकम्मे हों लेकिन उन्हें तो धक्का मार कर काम सिखाया जाता है लेकिन यदि होशियार बेटी काम पकड़ सकती है तो उसे सिर्फ पढ़ा लिखा कर शादी कर दी जाती है!

महिला सशक्तीकरण सिर्फ पढ़ाई लिखाई के अवसर देने से ही नही होगा,skill india के अंतर्गत बेटियों को vocational ट्रेनिंग भी दी जाये।

लड़कियां भी अपना पैतृक हुनर सीख सकती हैं।

एक पंडित की लड़की पूजा पाठ करा सकती है।
साईकल सुधारने वाले की लड़की पंक्चर बना सकती है।
मशीन रिपेयर वाले की लड़की AC और फ्रिज सुधार सकती है!
ऑटो मैकेनिक की बेटी गाड़ी का इंजन बांध सकती है!
ठेकेदार की बेटी साइट पर जाकर काम देख सकती है।

क्यों लगता है कि लड़कियां ये सब काम नही कर सकती?

क्योंकी बचपन से ये decide कर दिया जाता है कि लड़के क्या कर सकते हैं और लड़कियां क्या कर सकती हैं.. यही सुनते सुनते वो बड़ी होती हैं औऱ उन्हें लगता है कि जो काम पापा या भैया कर सकते हैं,वो उसे नही कर सकती!

और उसके दिमाग मे ये सोच माँ, बाप या पारिवारिक वातावरण ही भरता है।

लड़कियों को चुनने की छूट होनी चाहिये चाहे वो पढ़कर बैंक अफसर बने या फिर कार वर्कशॉप की मालकिन।

तभी बेटों व बेटियीं में भेद खत्म होगा।

गौमाता

कुछ वर्षों पहले विदेश में एक पार्टी में थी जहां बहुत से अंग्रेज़ व कुछ अन्य धर्मों के लोग भी थे।

बात चलते चलते हिन्दू धर्म व उसकी मूर्ति पूजा पर पहुंच गई।
एक अंग्रेज ने मुझसे सवाल किया की हिंदुओं में गौमांस क्यों वर्जित है?
इस सवाल का जवाब खालिस धार्मिक परिपेक्ष में नही दिया जा सकता था क्योंकी वहाँ मौजूद बहुत से लोग हिन्दू धर्म व उसकी मान्यताओं से अनभिज्ञ थे।

उन्हें सिर्फ यह कहकर की गाय कामधेनु है, या शंकर भगवान नन्दी बैल पर सवार हैं या गाय समुद्र मंथन से निकले रत्नों में से एक हैं, संतुष्ट नही किया जा सकता था।

यह बात मुझे उन्हें एक और दृष्टकोण से समझानी पड़ी की,” हज़ारों सालों से भारत कृषि प्रधान देश है और गाय हमारी कृषि के लिए बहुमूल्य है,जिसके हर अवयव से कोई ना कोई लाभ है।

खेत जोतने से लेकर खाद बनाने तक, दूध देने से लेकर चमड़ा उत्पादित करने तक हर जगह गाय बहुमूल्य थी तो कैसे हम सबसे ज्यादा लाभप्रद पशु को सिर्फ आहार के लिए मार सकते थे जबकि कृषि द्वारा उत्पादित अनगिनत पदार्थ हमारे भोजन के लिए उपलभ्ध थे।

इसके अतिरिक्त एक बच्चा ज्यादा से ज्यादा 2 वर्ष तक माँ के दूध पर पोषित हो सकता है उसके बाद जीवन भर गाय के दूध से उसे पौष्टिक तत्व मिलते हैं इस स्थिति में मां के बाद यदि कोई हमे जीवन भर अपने दूध से सिंचित करता है तो वो सिर्फ गाय है इस हिसाब से भी गाय हमारी माँ है और दुनिया का कौन सा बच्चा अपनी माँ को काट कर खायेगा?

गाय हिंदुओं की ही नही हर उस शख्स की माँ है जिसने कभी ना कभी गाय का दूध पिया है।

गाय सारे विश्व् के लिऐ माँ समान है क्योंकी गाय ना होती तो दूध जैसा अमृत ना होता। गोबर जैसी लाभकारी खाद ना होती। गौमूत्र जैसा एंटीसेप्टिक ना होता।

यदि अब भी आप लोग नही समझे कि हिन्दू धर्म कितना गहरा व गूढ़ है तो आप लोग हिन्दू धर्म को कभी नही समझ सकते क्योंकी हमारे यहां कुछ भी तथ्यविहीन नही है।”

यह सुनकर पूरी सभा मे सन्नाटा छा गया। बाद में बहुत से लोगों ने मुझसे आकर कहा कि उन्होंने कभी गौमांस भक्षण को इस नज़र से नही देखा था और उन्होंने गाय का माँस छोड़ने की प्रतिज्ञा की।

हमे यदि अपने धर्म की रक्षा करनी है, उसे मान सम्मान दिलाना है तो सबसे पहले उसे खुद समझना होगा।

ना शब्दों में उलझे ना रिवाज़ों में उलझें
सिर्फ गहरे में जाकर समझना होगा की वो क्या है, क्यों है और कैसे है।

जब कोई आपसे आपके धर्म के बारे में कुतर्क करे तो आपके अंदर इतनी काबलियत व जानकारी होनी चाहिये की आप उसके कुतर्कों को अपने तर्क से ध्वस्त कर सकें। तब ही आप अपने धर्म को सम्मान दिला पायेंगे।

Media Uncut

पांडे जी फ़ोन पर ज़ोर ज़ोर से बात कर रहे थे
“नट्टू भाई !जब तक ऊपर वाले की दया है,कोई बाल भी बांका नही कर सकता’

ऊपर की बालकनी से वर्मा जी सुन रहे थे, अंदर जाकर पत्नी से बोले” पांडे जी का नट्टू से झगड़ा हो गया और इसकी वजह कोई दया नाम की औरत है जिसका बांके नाम के आदमी से संबंध है”

पत्नी ने सुना और वर्मा जी के आफिस जाते ही बगल वाली सरोज भाभी को फोन मिलाया “सुना भाभी जी .. पांडे जी दूसरी शादी करने वाले हैं दया नाम की लड़की से जिसके पहले पति का नाम बांके है,Mrs पांडे को पता चलेगा तो बिचारी मर ही जाएंगी, अच्छा फोन रखती हूं”

सरोज भाभी ने तुरन्त अपने पति सचदेवा जी को फ़ोन लगाया” सुनिए जी पांडे जी कलमुँही दया के चक्कर मे देवी जैसी पत्नी को मारने पर तुले हैं”

सचदेवा जी शाम को भुल्लर साहब से ट्रेन में मिले तो बोले’ “यार, ये पांडे के घर मे उनकी बीबी को मरने मारने का चक्कर चल रहा है, ज़रूर कोई दूसरी औरत होगी’

भुल्लर जी ने घर जाकर बीबी से कहा” सुनो 7 नंबर वाले पांडे की बीबी ने आत्महत्या की कोशिश की , तुम 9 नंबर वालों से पूछो क्या हुआ?’

भुल्लर जी की बीबी ने 9 नंबर वाले सहाय जी के घर फ़ोन मिलाया और पूछा”अरे दीदी!आपने सुना, पांडे जी की बीबी ने आत्महत्या कर ली, बिचारी छोटे छोटे बच्चे छोड़कर चली गयी”

मैडम सहाय ने तुरन्त पांडे जी की बहन को फ़ोन किया और रोते हुई कहा,” आपकी भाभी का देहांत हो गया”
पांडे जी कर बहन उनके घर गई और दरवाजा खुलते ही पांडे जी से लिपटकर दहाड़े मार रोने लगी’ “भैया! मुझे तो पहले ही मालूम था भाभी का नट्टू से कुछ चक्कर था इसीलिये आत्महत्या कर ली ।”

पांडे जी भौंचक्के………….

ऐसा ही कमाल हमारी मीडिया का भी होता है,बात कुछ और होती है पेश कुछ और करते हैं🗣️🗣️🗣️

No one dies of working hard

एक दिन मैं घर के बाहर बड़े तन्मयता से गाड़ीयां धो रही थी। साईकल पर जाता हुआ एक माली रुका और मुझसे पूछा, “कुछ पौधे वैगरह चाहिये?”
मैंने कहा,”चाहियें तो”
उसने कहा,”अपनी मैडम को बुला दो उनसे ही बात करूंगा”
मैंने अंदर जाकर कपड़े बदले और बाहर आकर कहा,”मैं ही मैडम हूँ, पौधे दिखाओ”
वो बेचारा शर्म से पानी पानी हो गया और माफी मांगने लगा।
कसूर उसका नही था!

अक्सर बड़े घरों व बड़ी गाड़ियों में चलने वालों के घर नौकरों की पलटन होती हैं। ऐसे में कोई सोच भी नही सकता की जिनके घर में कई गाड़ियां खड़ी हों और इतना बड़ा घर हो वो लोग अपना काम खुद भी करते होंगे।

अक्सर जान पहचान वाले लोग कहते हैं कि नौकर क्यों नही लगा लेती?
तो मैं उनसे पूछती हूँ कि क्या उन्हें मैं लूली,लंगड़ी या अपाहिज नज़र आती हूँ?यदि नही!तो फिर मैं अपना काम खुद क्यों नही कर सकती!

यदि मुझमे अपने काम खुद करने की सामर्थ्य है तो मैं वही काम नौकर से क्यों कराऊँ?
कभी कभी मैं हैरान होती हूँ कि एक कामकाजी महिला होने के बाद भी मैं अपने सारे घर का काम खुद करना पसंद करती हूँ।

2मंज़िल के घर की सफाई,वृहद बगीचा,
लेकिन घर के झाड़ू पोचे से लेकर गार्डन की सफाई, गाड़ियों को धोना साफ करना,हर तरह का खाना बनाना,साग सब्जी लाना, कपड़े खुद धोना इस्त्री करने से लेकर बर्तन धोने और गमले पेड़ पौधे लगाने का काम भी बड़ी ही सरलता से कर लेती हूँ।

दिन में 100-200 km गाड़ी भी चला लेती हूँ,गोल्फ खेलती हूँ,5km वॉक करती हूँ।समय मिले तो पढ़ती लिखती भी हूँ …
तो फिर हमारी वो गृहणियाँ जो नौकरी भी नही करती,आफिस नही जाती उन्हें अपने ढाई कमरों के घर साफ कराने ,चार बर्तन धोने और 8 रोटी सेकने के लिए नौकर क्यों चाहिये?
जो अंग्रेजों नौकरशाही का कोढ़ हमारे समाज में फैला कर चले गए उनके अपने देशों में घरेलू नौकर रखने का कोई रिवाज़ नही है।वहां वो लोग अपना सारा काम खुद करते हैं। लेकिन हमारे यहाँ अपने घर का काम खुद करने मे शर्म आती है,क्यो?

हमारी गृहणियों को भी जिनके पति सवेरे आफिस चले जाते हैं और शाम को घर लौटते हैं अपने 10 x 10 के कमरे साफ कराने के लिये महरी चाहिए?

मेरे अभिजात्य दोस्त लोगों में जिनकी बीबियाँ हर हफ्ते पार्लर जाती हैं उन्हें वज़न घटाने के लिए सलाद के पत्ते खाना मंज़ूर है!!gym में घण्टो ट्रेड मिल पर हांफना मंज़ूर है, लेकिन अपने घर मे एक गिलास पानी लाने के लिए नौकर चाहिए।

जो नौकरानियां हमारे घरों को साफ करने आती हैं उनके भी परिवार होते हैं बच्चे होते हैं ,ना उनके घरों में कोई खाना बनाने आता है ना ही कोई कपड़े धोने तो फिर जब वो इतने घरों का काम करके अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी निभा लेती हैं तो हम अपने परिवार का पालन पोषण करने में क्यों थक जाते हैं?

दरअसल हमारे यहाँ काम को सिर्फ बोझ समझा जाता है चाहे वो नौकरी में हो निजी जिंदगी में। जिस देश मे कर्मप्रधान गीता की व्यख्या इतने व्यपक स्तर पर होती है वहाँ कर्महीनता से समाज सराबोर है।हम काम मे मज़ा नही ढूंढते, सीखने का आनंद नही जानते,कुशलता का फायदा नही उठाते!

हम अपने घर नौकरों से साफ कराते हैं!

झूठे बर्तन किसी से धुलवाते हैं!

कपड़े धोबी से प्रेस करवाते हैं!

खाना कुक से बनवाते हैं!

बच्चे आया से पलवाते हैँ!

गाड़ी ड्राइवर से धुलवाते हैं!

बगीचा माली से लगवाते हैं!

तो फिर अपने घर के लिये हम क्या करते हैं?

कितने शर्म की बात है एक दिन अगर महरी छुट्टी कर जाये तो कोहराम मच जाता है, फ़ोन करके अडोस पड़ोस में पूछा जाता है।

जिस दिन खाना बनाने वाली ना आये तो होटल से आर्डर होता है या फिर मेग्गी बनता है।

घरेलू नौकर अगर साल में एक बार छुट्टी मांगता है तो हमे बुखार चढ़ जाता है। होली दिवाली व त्योहारों पर भी हम नौकर को छुट्टी देने से कतराते हैं!

जो महिलाएं नौकरीपेशा हैं उनका नौकर रखना वाज़िब बनता है किंतु जो महिलाएँ सिर्फ घर रहकर अपना समय TV देखने या FB और whats app करने में बिताती हैं उन्हें भी हर काम के लिए नौकर चाहिये?

सिर्फ इसलिए क्योंकी वो पैसा देकर काम करा सकती हैं? लेकिन बदले में कितनी बीमारियों को दावत देती हैं शायद ये वो नही जानती।

आज 35 वर्ष से ऊपर की महिलाओं को ब्लड प्रेशर ,मधुमेह, घुटनों के दर्द,कोलेस्ट्रॉल, थायरॉइड जैसी बीमारियां घेर लेती हैं जिसकी वजह सिर्फ और सिर्फ लाइफस्टाइल है।

यदि 2 घण्टे घर की सफाई की जाये तो 320 कैलोरी खर्च होती हैं, 45 मिनट बगीचे में काम करने से 170 कैलोरी खर्च होती हैं, एक गाड़ी की सफाई करने में 67 कैलोरी खर्च होती है,खिड़की दरवाजो को पोंछने से कंधे,हाथ, पीठ व पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं,आटा गूंधने से हाथों में आर्थ्राइटिस नही आता। कपड़े निचोड़ने से कलाई व हाथ की मानपेशियाँ मजबूत होती हैं,20 मिनट तक रोटियां बेलने से फ्रोजन शोल्डर होने की संभावना कम हो जाती है, ज़मीन पर बैठकर काम करने से घुटने जल्दी खराब नही होते।

लेकिन हम इन सबकी ज़िम्मेदारी नौकर पर छोड़कर खुद डॉक्टरों से दोस्ती कर लेते हैँ। फिर शुरू होती है खाने मे परहेज़, टहलना,जिम, या फिर सर्जरी!!

कितना आसान है इन सबसे पीछा छुड़ाना कि हम अपने घर के काम करें और स्वस्थ रहे।मैंने आजतक नही सुना की घर का काम करने से कोई मर गया हो!

लेकिन हम मध्यम व उच्च वर्ग घर के काम को करना शर्म समझते हैं। नौकर ज़रूरत के लिए कम स्टेटस के लिए ज्यादा रखा जाता है। काम ना करके अनजाने में ही हम अपने शरीर के दुश्मन हो जाते हैँ।

पश्चिमी देशों में अमीर से अमीर लोग भी अपना सारा काम खुद करते हैं और इसमें उन्हें कोई शर्म नही लगती। लेकिन हम मर जायेंगे पर काम नही करेंगे।

किसी भी तरह की निर्भरता कष्ट का कारण होती है फिर वो चाहे शारीरिक हो ,भौतिक हो या मानसिक। अपने काम दूसरों से करवा करवा कर हम स्वयं को मानसिक व शारीरिक रूप से पंगु बना लेते हैं और नौकर ना होने के स्थिति में असहाय महसूस करते हैं।ये एक दुखद स्थिति है।

यदि हम काम को बोझ ना समझ के उसका आंनद ले तो वो बोझ नही बल्कि एक दिलचस्प एक्टिविटी लगेगा। Gym से ज्यादा बोरिंग कोई जगह नही उसी की जगह जब आप अपने घर को रगड़ कर साफ करते हैं तो शरीर से *एंडोर्फिन हारमोन* निकलता है जो आपको अपनी मेहनत का फल देखकर खुशी की अनुभूति देता है।

अच्छा खाना बनाकर दूसरों को खिलाने से *सेरोटॉनिन हार्मोन*निकलता है जो तनाव दूर करता है।

जब काम करने के इतने फायदे हैं तो फिर ये मौके क्यो छोड़े जायें!

हम अपना काम स्वयं करके ना सिर्फ शरीर बचाते है बल्कि पैसे भी बचाते हैं और निर्भरता से बचते हैं।

Pleasure in the job puts perfection in the work

Son

कितना कुछ लिखा जाता है बेटियों के लिए
लेकिन बेटे का दर्द पर शायद ही कोई लिखता हो।

बेटा हूँ शायद इसलिये अपने दर्द सांझा नही कर सकता।
आंखों के आँसू अंदर ही रोकने पड़ते हैं क्योंकी उसे कमज़ोरी मान लिया जाता है।

जिस दिन नौकरी का appointment लेटर आता है घर मे सब बहुत खुश होते हैं और मेरा कलेजा एक बार धक से रह जाता है…

खूंटी पर टँगी जीन्स और टी शर्ट बड़े भारी मन से पैक करता हूँ।माँ की बनाई मठरी बड़े प्यार से सहेजता हूँ।

नई जगह कैसी होगी, ये डर माँ बाबा को नही बता सकता
घर मे सब कितना सुरक्षित लगता है .. कुछ भी परेशानी हो माँ व पिताजी का अनुभव उसका समाधान बता ही देता है अब अकेला रहूंगा तो किसकी ओर देखूँगा हर पल ये डर सताता है।

बेटियाँ विदा होते वक़्त खुल कर रो तो सकती हैं..

बेटा घर छोड़ते वक़्त अपने आँसू भी नही दिखा सकता है।

पढ़ाई करके भी जब नौकरी नही मिलती है तो हर पल मन कचोटता है मन तो चाहता है पिताजी अब घर बैठे, आराम करें लेकिन मोर अपने पैरों को देख कर रो देता है।

माँ के तानो व पिताजी के गुस्से को जब तब सहना पड़ता है, जब ज्यादा दुख होता है तो घर से निकल कर दो दोस्तो के साथ आवारागर्दी कर अंदर का गुस्सा शान्त कर लेता है।

माँ बाप के कहने से शादी भी कर ली सोचा था कि अब भरा पूरा परिवार रहेगा हम सब बोलते बतियाते एक साथ शाम को गर्म रोटी खाएंगे। बाबूजी और मैं साथ बैठेंगे , माँ भी बगल में होगी प्यारी सी पत्नी स्नेहभाव से मुझे व बाबूजी को खाना देगी।

लेकिन होता कुछ और है..
घर आते ही बीबी बाहर जाने को तैयार मिलती है उसे खुली हवा चाहिये होती है, माँ को चाय व बाबूजी को गर्म खाना चाहिए होता है। सबके तने हुए चेहरों के बीच मैं त्रिशंकु की तरह सामंजस्य बिठाते बिठाते खुद को खो देता हूँ।

ना बीबी खुश ना माँ बाप खुश। फिर भी मेरी व्यथा व्यथा नही समझी जाती क्योंकी मैं बेटा हूँ।

दिन रात उन बहनों का लाड़ लड़ाया जाता है जो ससुराल से लड़कर महीनों के लिए घर बैठी रहती हैं और मैं बीबी को एक दिन सिनेमा ले जाऊं तो जोरू का गुलाम करार दे दिया जाता हूँ। किस्से अपना दर्द कहूँ? बेटा हूँ सो चुप रह जाता हूँ।

घर मे मेहमान आ जाएं तो मेरा पलँग छीन कर बाहर खटिया दे दी जाती है। सर्दी की रात में चाचा जी को स्टेशन छोड़कर आने की आज्ञा दे दी जाती है, लेकिन एक दिन देर से सोकर उठूं तो नालायक व निक्कमा करार दे दिया जाता हूँ।

बहुत प्यार करता हूँ माँ व पिताजी को, उनके कदमों में स्वर्ग रख देना चाहता हूँ। लेकिन महंगाई व बेकारी मुझे वहां भी ज़लील कर देती है। अपमान के शब्द चुपचाप पी लेता हूँ और उठ कर काम पर चला जाता हूँ।

बेटा माँ बाप का सहारा होता है,लेकिन बेटे के पास भी दुःखों का अंबार होता है।

वो ना माँ को भूला है ना पिताजी को,

बस परिस्थितियों से हारा होता है।

China Effect

मेरे प्रिय भारतवासियों

हम संख्या में चीन से कुछ ही पीछे हैं लेकिन दुनिया फतह करने में बहुत पीछे।

जब हम make in india , made in india , मेरा भारत महान, भारत मेरी जान में उलझे पडें है चीन अपने पंजे छोटे से छोटे देश मे फैला चुका है। कोई देश चीन से अछूता नही है। चीन की जड़ें बहुत गहरी फैल चुकी हैं।

वो भारत के गणेश लक्ष्मी और दिये भी बना रहा है, और रूस के फूलदान भी, वो अफ्रीका के ज़ेबरा भी बना रहा है और हॉलैण्ड के नकली टूलिप्स भी, वो samsung को मात करते नकली फ़ोन भी बना रहा है और Hyundai को मात करने वाली Cherry कार भी।

जब हम प्रजातंत्र, साम्यवाद, मार्क्सवाद में उलझे हैं चीन पूंजीवाद के पिछले दरवाजे से घुस कर अपना स्थान बना चुका हैं।

इतने देशों में घूम चुकी हूं लेकिन हर देश मे एक ही चीज कॉमन मिली .. चीन!!!

हम हनी सिंह से लेकर अमिताभ बच्चन ..
विराट से लेकर रजनीकांत में उलझे हुए हैं और चीन एक ऑक्टोपस की तरह दुनिया मे अपने पंजे फैला चुका है।

दिल्ली के पराठें इम्फाल में नही पहुंचते, महाराष्ट्र की सौल कढ़ी बलिया में नहीं पहुंच पाई लेकिन चाऊमीन हर जगह है।

जितना आप अपने देश के बारे में नही जानते उससे ज्यादा चीन आपके प्रदेशों के बारे में जानता है।

चीन ये भी जानता है कि दिवाली में आप गणेश लक्ष्मी खरीदते हैं और होली में पिचकारी , क्रिसमस में बिजली की लड़ और वास्तु का पिरामिड । लेकिन आप नही जानते की चीन में नया साल कब होता है?

वास्तु छोड़कर आपने फेंगशुई पकड़ लिया है और चावल छोडक़त फ्राइड राइस?

प्लीज ये bjp, कांग्रेस, बसपा, सपा से बाहर निकल कर अपनी अस्मिता के बारे में भी सोचना शुरू करिये वरना दुनिया की दूसरी बड़ी जनसंख्या होकर भी आप कद्दू बन जाएंगे ।

मैंने जो देखा समझा दिया आगे आपकी मर्जी!