परिवारवाद का दुर्भाग्यवाद

dirty-politics

रात 12 बजे जब आधी दुनिया सो रही थी भारत ने पदार्पण किया नए युग में चोरों और लुटेरों के साथ। सारे इनाम उन्ही में बांटे गए जो चेहरों को नहीं जूतों को देखते थे।भारत को स्वतंत्रता मिली किंतु गन्दा लिहाफ ओढे हुए। हम को ब्रिटिश की गुलामी से निजात तब भी नहीं मिली।
ये जाहिर सी बात है स्वतंत्रता के बाद कोई देश पुराने आकाओं के बनाये नियम छोडकर नए परिवेश की रचना करता है,किन्तु हमारी बदकिस्मती की आज तक शिक्षा से लेकर सविधान तक सब कुछ अंग्रेजों के छोड़े अवशेषों पर बना हुआ है।

यहाँ तक की नाम भी वही जो उन्होंने दिया.. विदेशों में आज भी भारत ” India “है।

आज भी अंग्रेजी हमारी कामकाज की प्राथमिक भाषा है। सारा सविधान अंग्रेजी में है। IPC अंग्रेजी में है और तो और ज्यादातर सरकारी प्रपत्र अंग्रेजी में है। अंग्रेजो ने एक बिना हड्डी की जमात यहाँ छोड दी जिसका नाम था “बाबू” आज भी उनकी जात नहीं बदली। देश का नियंत्रण उन मिला जो विदेशो से उच्च शिक्षा प्राप्त करके आये थे चाहे गांधी , नेहरू ,या फिर अम्बेडकर। वो जो विदेशी सभ्यता का लुत्फ़ उठा चुके थे कभी न कभी। समाज में इज्जत पाने के लिए ” lawyer” या ” barrister होना जरूरी था। और ये लोग बजाये समाज की तरक्की में सहायक होने के राजनीती में लग गए। आजादी पूर्व जब भारत गरीबी ,भुखमरी और आकाल जैसी समस्यओं से जूझ रहा था इन्होंने विदेशी शिक्षा को जानना जरूरी समझा। उस समय इन्होंने जब आम आदमी को भरपेट रोटी नहीं मिलती थी महंगी विदेशी पढाई को प्राथमिकता दी। नेहरू की पहली कैबिनेट के 18 मंत्रियों में से सिर्फ 3 मंत्री वकालत पास नहीं थे ना ही महंगी विदेशी शिक्षा हांसिल की थी। श्यामा प्रसाद मुकर्जी, बलदेव सिंह व् जगजीवन राम । बाकी सब बजाये देश में कानून पढ़ाने की जगह राजनीति में घुस गए जिसका फल हम आज तक भोग रहे हैं।

नेहरू जो की परिवारवादी ,स्वार्थी व् अहंकारी थे एक चाल ये चली की सभी विपक्षी दलों के लोगों को कैबिनेट में जगह दी। जिससे कोई विरोध ना हो। 1962 की शर्मनाक हार के बाद भी नेहरू जीत गए। क्योँकि मजबूत विपक्ष नहीं था। सच तो ये है कि लाखों चीनी सिपाहियों से लड़ने के लिए सिर्फ 14000 भारतीय सिपाही थे। वजह नेहरू का पंचशील का राग ,आज तक वो शर्मनाक हार भारत के लिए एक धब्बा है।

ये विरासत हमें कांग्रेस ने दी है जिनकी चरण वंदना 60 वर्षो तक देश ने की। आज भी भारत को वो पार्टी नहीं मिली जो सिर्फ और सिर्फ भारत की और भारत के लोगों के हितों के बारे में सोच सके। वही शिक्षा प्रणाली, वही सविधान ,वही मानसिकता और वही दोगले लोग । अंग्रेज आज भी यही है। आज भी device and rule ही चल रहा है।

दुर्भाग्यशाली है पर सच है!!

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