The Real Progress

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भारत उपलब्धियों का देश है इसमें कोई संदेह नही किन्तु पिछले 300 वर्ष में अगर तरक्की का मूल्यांकन किया जाये तो हम पाएंगे कि क्या वजह है जो पश्चिम हमसे आगे निकल गया।

यहॉ मैँ आध्यत्मिक या धार्मिक तरक्की की नही अपितु ,भौतिक, राष्ट्रीय व भौगोलिक तरक्की की बात कर रही हूँ

ये संदेश हिन्दू और मुसलमान दोनो के ही लिए है जब वो भारत की तरक्की में अपना अपना योगदान गिनाते हैं तो उन्हें ये सब भी जानना चाहिये।

यदि हम 250 वर्ष का इतिहास खंगाले तो पता चलता है , कि आधुनिक विश्व यानी 1800 के बाद , जो दुनिया मे तरक़्क़ी हुई , उसमें पश्चिमी मुल्को यानी यहूदी और ईसाई लोगो का बहुत बड़ा हाथ है !

हिन्दूओं और मुस्लिमो का इस विकास मे 1% का भी योगदान नही है !
हॉं !!…इतिहास में हमपर कितनी बार आक्रमण हुआ इससे किताबों के पन्ने रंगे पड़े हैं। ये गौरव की नही बल्कि शर्म की बात है की ना जाने कितनी विदेशी ताकतों ने हमे गुलाम बनाया, कुछ तो कमी रही होगी हमारे अन्दर!!

1800 से लेकर 1940 तक हिंदू और मुसलमान सिर्फ बादशाहत या गद्दी के लिये लड़ते रहे !हम आज़ादी के लिए तो लड़ते रहे लेकिन तरक्की के लिए लड़ना ज़रूरी नही समझा!

अगर आप दुनिया के 100 बड़े वैज्ञानिको के नाम लिखें , तो बस दो चार हिन्दू और मुसलमान के मिलेंगे ! बाक़ी सब पश्चिम देशों के हैं वो इसलिये की हमने अपने देश के वैज्ञानिकों को साधन व सहायता उपलब्ध कराना जरूरी नही समझा। नोबल पुरूस्कार पाने वालों में से कितने हिन्दू और मुसलमान हैं?

पूरी दुनिया मे 61 इस्लामी मुल्क है , जिनकी जनसंख्या 1.50 अरब के करीब है लेकिन कुल 435 यूनिवर्सिटी है !
दूसरी तरफ हिन्दू की जनसंख्या 1.26 अरब के क़रीब है लेकिन लगभग 385 ही यूनिवर्सिटी है !
इधर अकेले अमेरिका मे 3 हज़ार से अधिक और छोटे से देश जापान मे 900 से अधिक यूनिवर्सिटी है !

ईसाई दुनिया के 45% नौजवान यूनिवर्सिटी तक पहुंचते हैं ! वहीं मुसलमान नौजवान मुश्किल से 2% और हिन्दू नौजवान करीब 8 % से 10% उच्च शिक्षा ग्रहण करते हैं !

दुनिया के 200 बड़ी यूनिवर्सिटी मे से 54 अमेरिका में, 24 इंग्लेंड में ,17 ऑस्ट्रेलिया में ,10 चीन में, 10 जापान में ,10 हॉलॅंड में, 9 फ़्राँस में ,8 जर्मनी में , सिर्फ 2 भारत और 1 इस्लामी मुल्क में हैं !

आज़ादी से पहले हर उच्च शिक्षित भारतीय विदेश से शिक्षा ग्रहण करके आता था चाहे वो गांधी हों ,नेहरू हों या अंबेडकर। इस सभी ने कभी इस बात पर चर्चा नही की की भारत की एक मौलिक शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए जो हमारे देश,समाज, संस्कृति व ज़रूरतों को मद्देनजर रखकर हो । आज भी हम अंग्रेजों द्वारा डिज़ाइन की गई शिक्षा प्रणाली को फेर बदलकर चला रहे हैं।

आज भी हमारी शिक्षा पद्धति सिर्फ नौकरों की फ़ौज तैयार करती है, जिसे प्राप्त करके युवा सिर्फ नौकरी ढूंढ सकते हैँ उद्योग व व्यवसाय करके स्वालंबी नही हो सकते।
लाखों रुपये की बिज़नेस की डिग्री हाँसिल कर युवा कुछ हज़ार रुपये की नौकरी ढूँढते हैं अपना व्यवसाय नही लगा सकते!

चलिये अब आर्थिक रूप से देखते है………..

अमेरिका का जी. डी. पी 14.9 ट्रिलियन डॉलर है !
जबकि पूरे इस्लामिक मुल्को का कुल जी. डी. पी 3.5 ट्रिलियन डॉलर है !
वहीं भारत का 1.87 ट्रिलियन डॉलर है !
दुनिया मे इस समय 38,000 मल्टिनॅशनल कम्पनियाँ हैं ! इनमे से 32000 कम्पनियाँ सिर्फ अमेरिका और युरोप में हैं !

आधुनिक दुनिया के 15,000 बड़े अविष्कारों मे 6103 अविष्कार अकेले अमेरिका में और 8410 अविष्कार ईसाइयों या यहूदियों ने किये हैं ! वो इसलिये की अभी भी तकनीकी व साइंस डिग्रियों में चल रही है कुछ नया ईजाद करने के लिये नही।

दुनिया के 50 अमीरो में 20 अमेरिका, 5 इंग्लेंड, 3 चीन , 2 मक्सिको , 2 भारत और 1 अरब मुल्क से हैं ! हमारे यहां अमीर होने का दिखावा तो है किंतु टैक्स के डर से खातों में सब अपने को गरीब दिखाते हैं!

अब बात करते हैं हिन्दू और मुसलमान जनहित , परोपकार या समाज सेवा मे भी ईसाईयों और यहूदियों से पीछे हैं !
आज रेडक्रॉस दुनिया का सब से बड़ा मानवीय संगठन है , इस के बारे मे बताने की जरूरत नहीं है !
बिल गेट्स ने अकेले ही 10 बिलियन डॉलर जो उनकी की करीब 90% संपत्ति है से बिल- मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन की बुनियाद रखी , जो कि पूरे विश्व के 8 करोड़ बच्चो की सेहत का ख्याल रखती है ! हमारे यहाँ लोग NGO इसलिय खोलते हैं जिससे अवैध फंडिंग मिल सके…
भारत में बहुत से अरबपति हैं !
मुकेश अंबानी अपना घर बनाने मे 4000 करोड़ खर्च कर सकते हैं ,अम्बानी बहुएं 5स्टार और 7 स्टार स्कूल पूंजीपतियों के बच्चों के लिए चलाती हैं लेकिन भारत के गरीब बच्चों के नाम पर दो चार NGO को दान देकर बरी हो जाती हैं अरब का अमीर शहज़ादा अपने स्पेशल जहाज पर 500 मिलियन डॉलर खर्च कर सकते हैं !
हमारे दलित नेता लाखों रुपये की गाड़ियों में चलते हैं लेकिन अपने वर्ग के गरीबों के उत्थान का ठेका सरकार से ही उठाते हैं।
मानवीय सहायता के लिये भी पूंजीपति आगे नही आ सकते हैं !

ओलंपिक खेलों में भी अमेरिका ही सब से अधिक गोल्ड जीतता है , हम खेलो में भी आगे नहीं ! हमारे बहुत से खिलाड़ियों को अपने खेल के साधन भी खुद ही जुटाने पड़ते हैं। पिछले दिनों भारत की पहली महिला आइस हॉकी की टीम ने इंटरनेट पर चंदा इक्कठा करके अपने बूते से विश्व् कप खेलने के लिए गई!

हम अपने अतीत पर चाहे जितना गर्व करें किन्तु व्यवहार से अत्यधिक स्वार्थी ही है ! हम आपस में लड़ने पर ही अधिक विश्वास रखते हैं !मानसिक रूप में आज भी हम विदेशी व्यक्ति से अधिक प्रवाभित हैं ! अपनी संस्कृति को छोड़ कर , विदेशी संस्कृति अधिक अपनाते हैं !सिर्फ हर हर महादेव और अल्लाह हो अकबर के नारे लगाने मे , हम सबसे आगे हैं !जरा सोचिये , कि हमें किस तरफ अधिक ध्यान देने की जरुरत है ! क्यों ना हम भी दुनिया में मजबूत स्थान और भागीदारी पाने के लिए प्रयास करें , बजाय विवाद उत्पन्न करने के और हर समय जात पात में उलझने के , खुद कि और देश की ऊन्नती पे ध्यान दे !समाज की जागृती का जिम्मा कुछ व्यक्तियो का ही नही बल्कि सभी जागरूक और विवेकशील नागरिकों के लिए भी उतना ही ज़रूरी है ।

 

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