बेटा-बेटी

एक चौराहे के पास से गुजरते हुए वो देखा जो मैंने पहले कभी नही देखा था।

चौराहे पर टाइल्स लगाने का काम चल रहा था,और वहां दो 17 या 18 साल की लड़कियां टाइल्स लगाने का काम बडी ही कुशलता से कर रही थी।

शायद उतनी कुशलता से कि कोई पुरुष मिस्त्री भी नही लगाता होगा ।दोनों तन्मयता से काम कर रही थी।

दोनों ने अच्छे मॉर्डन कपड़े पहन रखे थे और पूछने पर पता चला एक 9वी क्लास में पढ़ती है और दुसरीं 10वी में।

उनका पिता बीमार था। घर मे 2 छोटे भाई भी थे। लेकिन पिता के द्वारा लिए गये टाइल लगाने के ठेके को पूरा करना था। इन दोनों बहनों ने काम पूरा करने का बीड़ा उठाया और स्कूल से आने के बाद वो शाम को 7 बजे तक टाइल्स लगाती थी 5 दिन में काम पूरा कर दिया।

ये वो बेटियाँ हैं जिन्होंने बेटे की जगह ली, ये उन बेटीयों से कम नही जो महंगी डिग्री पाकर डॉक्टर या इंजीनियर बनती हैँ।

दुसरीं घटना एक हाइवे की थी जहां एक माँ व बेटी चाय समोसे की दुकान चला रही थी बगल ही में दुसरीं बेटी पंक्चर लगाने की दुकान लगाई थी ,जो कला उसने अपने मृत पिता से सीखी थी। घर मे कोई पुरुष नही था सिर्फ विधवा माँ और दो बेटियां लेकिन बेचारगी से जीने के जगह उन्होंने हिम्मत से जीना सीखा।

मैं हैरान ही नही बल्कि प्रभवित भी थी। ये भारत की असली बेटियाँ हैँ जो इतनी विपरीत परिस्थियो में इतनी सहजता से काम कर रही थीं।

हमारे समाज मे एक विचारधारा है कि औरतें कुछ गिने चुने काम कर सकती हैं।

कोई बढ़ई अपनी बेटी को लकड़ी का काम नही सिखाता!

कोई ऑटो वर्कशॉप वाला अपनी बेटियों को गाड़ी का इंजन बांधना नही सीखाता!

कोई सुनार अपनी बेटियों को गहने गढ़ना क्यों नही सिखाता?

कोई दुकानदार अपनी बेटी को गल्ले पर बैठना नही सिखाता?

बिल्डिंग बनाने वाला ठेकेदार अपनी बेटी को बालू मोरंग का मिश्रण नही समझाता।सरिये का भाव नही बताता!

बेटे भले ही निकम्मे हों लेकिन उन्हें तो धक्का मार कर काम सिखाया जाता है लेकिन यदि होशियार बेटी काम पकड़ सकती है तो उसे सिर्फ पढ़ा लिखा कर शादी कर दी जाती है!

महिला सशक्तीकरण सिर्फ पढ़ाई लिखाई के अवसर देने से ही नही होगा,skill india के अंतर्गत बेटियों को vocational ट्रेनिंग भी दी जाये।

लड़कियां भी अपना पैतृक हुनर सीख सकती हैं।

एक पंडित की लड़की पूजा पाठ करा सकती है।
साईकल सुधारने वाले की लड़की पंक्चर बना सकती है।
मशीन रिपेयर वाले की लड़की AC और फ्रिज सुधार सकती है!
ऑटो मैकेनिक की बेटी गाड़ी का इंजन बांध सकती है!
ठेकेदार की बेटी साइट पर जाकर काम देख सकती है।

क्यों लगता है कि लड़कियां ये सब काम नही कर सकती?

क्योंकी बचपन से ये decide कर दिया जाता है कि लड़के क्या कर सकते हैं और लड़कियां क्या कर सकती हैं.. यही सुनते सुनते वो बड़ी होती हैं औऱ उन्हें लगता है कि जो काम पापा या भैया कर सकते हैं,वो उसे नही कर सकती!

और उसके दिमाग मे ये सोच माँ, बाप या पारिवारिक वातावरण ही भरता है।

लड़कियों को चुनने की छूट होनी चाहिये चाहे वो पढ़कर बैंक अफसर बने या फिर कार वर्कशॉप की मालकिन।

तभी बेटों व बेटियीं में भेद खत्म होगा।

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