China Effect

मेरे प्रिय भारतवासियों

हम संख्या में चीन से कुछ ही पीछे हैं लेकिन दुनिया फतह करने में बहुत पीछे।

जब हम make in india , made in india , मेरा भारत महान, भारत मेरी जान में उलझे पडें है चीन अपने पंजे छोटे से छोटे देश मे फैला चुका है। कोई देश चीन से अछूता नही है। चीन की जड़ें बहुत गहरी फैल चुकी हैं।

वो भारत के गणेश लक्ष्मी और दिये भी बना रहा है, और रूस के फूलदान भी, वो अफ्रीका के ज़ेबरा भी बना रहा है और हॉलैण्ड के नकली टूलिप्स भी, वो samsung को मात करते नकली फ़ोन भी बना रहा है और Hyundai को मात करने वाली Cherry कार भी।

जब हम प्रजातंत्र, साम्यवाद, मार्क्सवाद में उलझे हैं चीन पूंजीवाद के पिछले दरवाजे से घुस कर अपना स्थान बना चुका हैं।

इतने देशों में घूम चुकी हूं लेकिन हर देश मे एक ही चीज कॉमन मिली .. चीन!!!

हम हनी सिंह से लेकर अमिताभ बच्चन ..
विराट से लेकर रजनीकांत में उलझे हुए हैं और चीन एक ऑक्टोपस की तरह दुनिया मे अपने पंजे फैला चुका है।

दिल्ली के पराठें इम्फाल में नही पहुंचते, महाराष्ट्र की सौल कढ़ी बलिया में नहीं पहुंच पाई लेकिन चाऊमीन हर जगह है।

जितना आप अपने देश के बारे में नही जानते उससे ज्यादा चीन आपके प्रदेशों के बारे में जानता है।

चीन ये भी जानता है कि दिवाली में आप गणेश लक्ष्मी खरीदते हैं और होली में पिचकारी , क्रिसमस में बिजली की लड़ और वास्तु का पिरामिड । लेकिन आप नही जानते की चीन में नया साल कब होता है?

वास्तु छोड़कर आपने फेंगशुई पकड़ लिया है और चावल छोडक़त फ्राइड राइस?

प्लीज ये bjp, कांग्रेस, बसपा, सपा से बाहर निकल कर अपनी अस्मिता के बारे में भी सोचना शुरू करिये वरना दुनिया की दूसरी बड़ी जनसंख्या होकर भी आप कद्दू बन जाएंगे ।

मैंने जो देखा समझा दिया आगे आपकी मर्जी!

Children of Lesser Gods

जिस प्रकार हमारे गौ रक्षक भाई ढूँढ ढूँढ कर गौ तस्करों को पकड़ते हैं और गौ माता की रक्षा करते हैं उसी प्रकार का एक प्रयास यदि अबोध व मासूम बच्चों की तस्करी को रोकने के लिए करें तो बहुत से मासूम नर्क जैसा जीवन भोगने से बच जायेंगे

भारत मे करीब 2लाख लोगहर साल मानव तस्करी काशिकार होते हैं, जिसमे से तकरीबन 10% ही विदेशों में भेजे जाते हैं बाकी लोग अपने ही देश मे अपने ही लोगों के द्वारा खरीदे बेचे जाते हैं।

हर 8 मिनट पर एक बच्चा अगवा होता है ,40000 से भी ज्यादा बच्चे हर साल मानव तस्करी का शिकार हो जाते हैं। 3लाख से ज्यादा बच्चे सड़कों पर भीख मांगने पर मज़बूर कर दिये जाते हैं।मानव तस्करी एक ऐसा क्षेत्र है जिससे दुनिया जूझ रही है किन्तु भारत मे इसकी वजहें बहुत ही विस्तृत हैं।

गरीबी इनमे से एक प्रमुख कारण हैं, धिक्कार है हम भारत की जनता पर जहां भूख की वजह से मासूम बच्चे बिक जाते हैं। कैसा दुर्भाग्य है कि भूख माँ बापों को अपना बच्चा बेचने पर मजबूर कर देती है।

मानव तस्करी में 50% से भी ज्यादा बच्चे होते हैं और उनमे से तकरीबन 80% लड़कियाँ होती हैं।

आज भी हमारे देश मे सब्जी की तरह इंसान बिकते हैँ और हम समृद्धि व तकनीकी विकास की बातें करते रहते हैं!

75 से 80 प्रतिशत मानव तस्करी सेक्स व्यापार के लिए होती है जहां छोटी बच्चियों को वो अमानवीय प्रताड़ना दी जाती जिसके बारे में आप सोच भी नही सकते। देश के कुछ हिस्सों में छोटी बच्चियों को देवदासी जैसी घिनोनी प्रथा का शिकार बन आजीवन वैश्यावृति के लिए झोंक दिया जाता है।ये वही देश है जहां छोटी छोटी बच्चियों में देवी माँ का रूप देखा जाता है।

बहुत से बच्चे मजदूरी व घरेलू नौकर का काम करने के लिए बेचे जाते हैं। एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर 9 साल का एक मासूम बच्चा नौकर का काम करता देखा, पूछने पर उसने बताया कि उसकी तनख्वाह से घर पर उसकी माँ उसके 6 साल व 3 साल के भाइयों को पालती है। अगले साल उसका भाई भी उसके साथ आकर काम करने लगेगा। ये हाल है गरीबों के हितों के बारे में राजनीति करने वालों का। बड़े बडे सरकारी अफसर भी छोटे बच्चों को घरेलू नौकर बनाकर रखने से नही चूकते।

सबसे ज्यादा खौफनाक व्यापार है बच्चों के अंगों के व्यापार का। ये धंधा इतने ऊंचे पैमाने पर चलता है कि कल्पना नही की जा सकती। सोने की खान है ये धंधा!! जहाँ एक मासूम शरीर के अंगों को इसी प्रकार बेचा जाता है जैसे बकरे के शरीर के अंगों को।

हम गौ माता के लिए, पक्षियों के लिए, वृक्षों के लिए, पर्यायवरण के लिए इतनी लड़ाई लड़ रहे हैं किंतु जीते जागते इंसानों को बिकने से नही रोक पा रहे?

जिस प्रकार हमारे भाइयों की सतर्क आंखे गौ माता का व्यापार करने वाले निकृष्ट लोगों को भांप लेती हैं यदि उसी प्रकार मासूम बच्चों का व्यापार करने वाले राक्षसों को भी वो पकड़ने लगें तो शायद सारी मानवता उनकी ऋणी हो जायेगी।

यदि हम गौ माता की सुरक्षा के लिए गौ रक्षकों की टीम बना सकते हैं तो हमारे ही देश के मासूम बच्चों की रक्षा के लिए बाल रक्षकों की टीम क्यों नही बना सकते?

ये एक ऐसा क्षेत्र है जहां कानून पूर्णतया कारगर नही हो पाया क्योंकी ऐसे केसों की जानकारी नही हो पाती। जब तब सामाजिक रूप से चेतना नही आएगी तब तक समस्या से निबटना मुश्किल हैं।

सबसे पहले हमें भीख देने की वृत्ति से मुक्ति पानी होगी। जब लोग भीख देना बंद कर देंगे तो इन बच्चों को भीख मांगने के लिए इस्तेमाल होना बंद हो जाएगा।

यदि अपने आस पास किसी बच्चे को घर या दुकान में काम करता देखें तो संबंधित विभाग में गुमनाम शिकायत भेजें।

यदि कहीं कोई डरा सहमा बच्चा संदिग्ध अवस्था मे दिखे तो तुरंत पुलिस को खबर करें।

देवदासी जैसी प्रथा भी सती प्रथा व बाल विवाह जैसी अमानवीय है इसका सामाजिक बहिष्कार करना होगा

ये वही भारत है जहां लोग कहते हैं कि

* बच्चों में भगवान बसता है*

लेकिन इन्ही बच्चों में जिनके अंदर भी भगवान बसता है उनसे हम घरों में झाड़ू पोछा कराते हैं, होटलों में झूठे बर्तन मंजवाते हैं, उनसे भीख मंगवातें हैं, उनसे वेश्या वृति कराते हैं, उन्हें अपराधी बनाते हैं, आतंकवादी बनाते हैं, उनके शरीर के अंग बेचते हैं ,उनपर अत्याचार करते हैं।

और सोचते हैं हम पाप के भागी नही!!

भगवान सिर्फ मंदिरों में ही नही इंसानों में भी बसते हैं इंसानो में बैठे भगवान को भी पूजिये,उससे प्यार करिये।

जिस देश मे बच्चे सुरक्षित हों उस ही देश का भविष्य भी सुरक्षित होता है।

Padmavati “The Black Chapter”


संजय लीला भंसाली की अगली फिल्म की स्क्रिप्ट होनी चाहिये #अल्लाउदीन खिलजी की नाज़ायज़ बेटी की प्रेम कहानी!

अल्लाउदीन की बेटी #फ़िरोज़ा जालौर के युवराज #बीरमदेव की बहादुरी देख कर लट्टू हो गई और बीरम देव से शादी की ज़िद ठान ली।

अल्लाउदीन की धमकियों के बावजूद वीरमदेव ने फ़िरोज़ा से शादी करने से इनकार कर दिया क्योंकी अल्लाउदीन ने उससे धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव रखा था।

यहां तक की वीरमदेव ने अल्लाउदीन के सिपालसलाहर #उलुग खान से सोमनाथ के मंदिर से लूटा हुआ शिवलिंग भी छीन लिया।

खिसियाये हुए अल्लाउदीन ने अपने ख़ास सेनानायक *कमालुद्दीन गुरग को जालौर पर आक्रमण करने भेजा व वीरम देव की सेना ने 2 वर्ष तक युद्ध करने पर भी हार नही मानी व शहीद हुए, सैंकड़ों वीरांगनाओं ने जौहर किया।

#संजयलीलाभंसाली जी अब एक फ़िल्म लुटेरों की अवैध बेटी के इस प्रेमप्रसंग पर हो जाये!!

और उसके बाद भी यदि आगे फ़िल्म बनानी हों तो भारत को लूटने वालों आक्रमणकारियों पर आपको बहुत सी कहानियां मिल जाएंगी।

मुहब्बत की इंतिहा के प्रतीक #शाहजहां को अपने बाप #जहांगीर से हज़ारों रखैलें विरासत में मिली थी, उनपर फ़िल्म बनाइये

शाहजहां के दरबार मे हिन्दू स्त्रियों को सरेआम बेचने के लिए मीनाबाजार लगता था।!उसी परम्परा के चलते दिल्ली में GB रोड जैसा red light area बना।

इसपर भी एक फ़िल्म बनाइये!!

एक और बड़ी दिलचस्प प्रेमकहानी है आपके लिए। प्रेम के पुजारी शाहजहां ने “मुमताज महल” उर्फ “अर्जुमंद-बानो-बेगम” के पति “शेर अफगान खान”जो कि शाहजहां की सेना में सूबेदार था उसकी हत्या करके उससे अपनी बेगम बनाया ।और मुमताज़ उसकी पहली या आखरी बीबी नही थी।उसने मुमताज़ के मरते ही कुछ ही दिनों में उसकी बहन फरज़ाना से निकाह कर लिया था।

इसी शाहजहां पर उसकी अपनी बेटी “जहाँआरा” के साथ भी संबंध रखने के आरोप लगते रहे थे।यहां तक की उसने जहाँआरा की शादी तक नही होने दी। इस बाप बेटी के रिश्ते के ऊपर प्रेम कहानी पर एक फ़िल्म बनाइये क्योंकी हम इसी *शाहजहां* के #ताजमहल पर, मुहब्बत के कसीदे पढ़ते हैं!

लीजिये एक और महानता की कहानी है जब महान
अकबर ने हज़ारों हिंदुओं के सर काटकर नरमुंडों से मीनारें बनाई थी!!(अकबरनामा पढ़िए) इसी अकबर ने कभी अपनी बेटियों का ब्याह नही होने दिया!!
यही अकवर शिकार के लिए जिंदा गुलामों को दौड़ा दौड़ाकर उनका शिकार करता था।
#चित्तौड़ की पराजय के बाद महारानी #जयमाल ने अपनी 12000वीर क्षत्राणीयों के साथ जौहर किया क्योंकी उन्हें अकबर की गुलामी मंज़ूर नही थी।

इसी महान अकबर की कुदृष्टि वीर विधवा रानी #दुर्गावती पर भी थी किन्तु रानी ने अकबर के हरम में जाने के स्थान पर अपनी जान देना गौरवपूर्ण समझा।

ये वही अकबर महान है जिसे लोगों ने #जोधाबाई से प्रेम करते देखने के लिए 200 रु के टिकिट खरीदकर #जोधाअकबर देखी।

बात निकलेगी तो फिर दूर तक जाएगी।

बडी हैरानी की बात है आपको #लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना पर फ़िल्म बनाने की प्रेरणा नही मिलती?

#पन्नाधाय पर फ़िल्म नही बनाते?

आप महारानी #तपस्विनी जो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की भतीजी और बेलूर के जमींदार नारायण राव की बेटी थी व उनकी वीरता की प्रसिद्धि भी दूर-दूर तक थी। उनपर फ़िल्म बनाने का विचार नही आया?

आप रानी दौपडीबाई पर फ़िल्म नही बनाते?

आप फिल्मकारों की creativity इतिहास की काली कथाओं को प्रेमकहनियों में तब्दील करने में ही क्यों खर्च होती है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हमें पराधीन रखने वालों को आप हीरो बना देते हैं!

फिर चाहे वो #मुगलेआज़म हो या फिर #रज़ियासुल्तान की प्रेमकथा!! फिर वो जोधा-अकबर की राजनैतिक शादी को प्रेमकथा बनाना हो या #पद्मावती को घूमर कराना!

आप लोग अपनी crativity के जनून में इतिहास के काले पन्नों की सुनहरी फिल्मे बनाते रहते है

आपकी जैसी सोच ही है जिसने देश मे घुसने वाले लूटेरों व आक्रमणकारियों को हीरो बन दिया।

ऐसी कहानियां कलाकार की कल्पना नही बल्कि उनका फितूर होती हैं।

यदि करोड़ों भारतवासी आपकी बनाई “ब्लैक” जैसी उम्दा फ़िल्म की सराहना करते हैं, तो उन्हें पद्मावती मत परोसिये। बॉक्स आफिस से ऊपर उठकर ,कुछ बेहतर दीजिये।

हमारा इतिहास गौरव गाथाओं से भरा पड़ा है एक आध फ़िल्म उसपर भी बनाइये संजय लीला भंसाली जी !

Smog

दिल्ली वालों की आँख जल्दी से नहीं खुलती। कभी डेंगू ,कभी चिकनगुनिया, और आज ये आलम है क़ि धुंए व प्रदूषण से उठने वाला कोहरा जानलेवा साबित हो रहा है।

इन सबकी वजह प्रकृति के साथ हो रहा खिलवाड़ है। सीमेंट के जंगल बनाने के चक्कर मे पेड़ों के जंगल काट दिये। ज़मीन में उगने वाले वृक्षों का स्थान गमलों में उगने वाले फूलों, व बोन्साई ने ले लिया।

दक्षिण दिल्ली के अमीर रिहायशी घरों में जहां 10 AC चलते हैं प्राकृतिक हवा की इंच भर भी गुंजाइश नही है।

दिल्ली को प्रदूषण नही लालच मार रहा है। 150वर्ग ग़ज़ के टुकड़े पर भी बहुतल्ला इमारत बन जाती है। तीन पुश्त पहले जो बड़े बड़े घर होते थे आज संतानों ने पैसे के लालच में बिल्डरों को बेच दिया और एक एक फ्लैट लेकर जमीन के टुकड़े कर दिए।

घर छोटे होते गये और गाडियाँ बड़ी होती गई। बाबुजी के घर की जगह 3BHK ने ले ली। कपड़े बालकनी की रेल में सूखने लगे और तुलसी खिड़की में। जहां बच्चे आंगन में खेलते थे वो अब बन्द कमरे में वीडियो खेलते हैं।

एक बड़ी अम्बेसेडर गाड़ी में सारा कुनबा घूम लेता था अब हर सदस्य को गाड़ी चाहिये। धूप व आसमान के दर्शन अब खिड़कियों से भी नही होते!!!

हवा बस पार्क व शहर के बाहर मिलती है। अब हंसी के लिए भी पार्क में इकट्ठा होकर बिना मतलब हां हा करना रह गया है।

ऊंची छतों वाले दफ्तरों की जगह कॉर्पोरेट बिल्डिंग में दड़बों में बन्द कबूतर जैसे लोगों ने ले ली। बस टकटकी बांध कंप्यूटर पर झुके रहते हैं।

बिल्डिंग में लिफ्ट इस्तेमाल करते हैं और gym में सीढी वाले स्टेपर पर सीढ़ी चढ़ते हैं। घर से बाहर कदम रखने के लिए गाड़ी चाहिये और gym में 3000 रु महीना देंकर साईकल चलाते हैं। सामान ट्राली में ढोते हैं और gym में 50 किलो का बेंचप्रेस करते हैं।

पीने को पानी बोतल मे लेकिन हर बिल्डिंग की छत पर स्विमिंग पूल होते हैं।

अब भाई इसकी कोई तो कीमत दिल्ली वालों को देनी पड़ेगी। सरकार कोई भी आ जाये क्या दिल्ली वाले गाडियाँ छोड़कर साईकल चलाएंगे? क्या घरों को तोड़कर बिल्डिंगे बनाना बंद करेंगे? क्या पार्किंग की जगह से गाड़ियां हटाकर पेड़ लगाएंगे? क्या मॉल्स को हटाकर शहर से बाहर करेंगे?

Odd-even is not God given .. कोई भी सरकार जादू का डंडा घुमाकर प्रदूषण दूर नही कर सकती!!प्रदूषण लोग करते है सड़कों पर गाड़ियां बढ़ाकर, छोटी जगहों में जरूरत से ज्यादा इंसान ठूँसकर!! गगनचुम्बी इमारतें बढ़ाकर!!

यूरोप के बहुत से देशों में लोग सूट टाई पहनकर साईकल से दफ्तर जाते हैँ। मेट्रो व पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं। प्लास्टिक व कचरे पर रोक रखते हैं।

खाड़ी देशों में जहां निरा रेगिस्तान है हज़ारों पेड़ रोज़ लगाये जा रहे हैं। पानी खर्च करने पर महंगा बिल देना पड़ता है। पानी भी बिजली की तरह ही महंगा है। महंगी पार्किंग हैं। drip irrigation के द्वारा sewage का सारा पानी सारे देश के में पेड़ लगाने के काम आता है और उसका पैसा भी नागरिक देते हैं।

हर समस्या को सरकार के माथे पर ठोकने वाले भारतीय खुद वातावरण को सुधारने में कितना योगदान देते हैं?

यदि समय रहते ना चेते तो दिल्ली वाली समस्या सभी बड़े शहरों में पनपेगी। हवा से बीमारी,पानी से बीमारी, कचरे से बीमारी फैलेगी।

आज पानी बोतल में बिक रहा है कल हवा थैलियों में बिकेगी।

समस्या की जड़ ज़रूरत से ज्यादा उपलब्धी है।

भारत मे गाड़ियों का पंजीकरण 10 साल पर होता है सब हर साल अनिवार्य कर देना चाहिए। यानी हर साल गाड़ी के रजिस्ट्रेशन के पहले टेस्टिंग होनी चाहिये।

बिजली की तरह पानी का भी मीटर होना चाहिये।इससे पानी की बर्बादी पर रोक लगेगी।

हर नागरिक के लिए साल में 100 घण्टे पर्यावरण व कम्युनिटी सर्विस के लिए अनिवार्य कर देने चाहिये वरना उसे दी जाने वाली सुविधाएँ बन्द कर दी जाएं।

गाड़ियों पर टैक्स बढ़ा कर टैक्सी,ट्रेन, रिकशा व मेट्रो सस्ती कर दी जानी चाहिये।

Incentive point system को बढ़ाना चाहिये। यदि कोई नागरिक सिर्फ मेट्रो व पब्लिक ट्रांसपॉर्ट का इस्तेमाल करता है तो उसे एक महीने के फ़्री पास देने चाहिये।

100 से ज्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों को कंपनी ट्रासपोर्ट से ही कर्मचारियों को यात्रा करानी चाहियें।

पार्किंग की फीस बढ़ा देनी चाहिये।

2 से ज्यादा गाड़ी रखने वालों पर luxary tax लगाना चाहिये।

बहुत से लोगों को मेरी इन बातों से बुरा लग रहा होगा किन्तु कड़े उपायों के सिवाय कोई चारा नही है। 123 करोड़ की जनसंख्या यदि अपने वातावरण का ध्यान स्वयं रखने लगे और अपनी ज़िम्मेदारियाँ समझने लगे तो हम दुनिया के बादशाह हो जायेंगे।

ये धुआँ हमारी जली हुई सोच का है और अगर सोच नही बदली तो ये सबको निगल जाएगा।

Be a true indian and true human

Article 370 and 35A

धारा 35A की जड़ें बहुत गहरी हैं..

बात शुरू होती है भारत व पाकिस्तान कर बंटवारे के साथ ही जब नेहरू जी ने कहा कि यद्यपि पाकिस्तान मुसलमानों के लिए बना है लेकिन यदि भारत के मुसलमान चाहें तो वो भारत मे जहां चाहें रह सकते हैं, क्योंकि वो भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश यानी सेक्युलर देश के रूप में देखना चाहते थे, या फिर नेहरू जी के अतीत के पन्ने शायद इस्लाम से जुड़े थे और उन्हें ये डर था कि भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की स्थिति में उनकी गद्दी डावांडोल हो सकती है।

मुसलमानों तो खुश रखने के लिए इस पर विचार होने लगा कि कश्मीर के मुस्लिम बहुल होने के कारण वहाँ मुसलमानों को कुछ खास किस्म की रियायतें व सुविधाएं दी जाये। 26 अक्टूबर 1947 को जब सभी रियासतों का विलय भारत मे हुआ तो कश्मीर के लिए भी वही शर्तें थी जी बाकी रियासतों के लिए थी। उस समय #370 जैसा कोई प्रावधान नही था,क्योंकी उस समय तक भारत का कोई संवीधान नही था।

जब 1949 में संवीधान का प्रारूप तैयार हो रहा था तो शेख अब्दुल्ला ने नेहरू से कश्मीर के लिए विशेष अधिकारों की बात की उसपर नेहरू ने उन्हें डॉ भीमराव अंबेडकर से मिलने को कहा।

डॉ आंबेडकर ने शुरू में विरोध करते हुऐ कहा की एक ही देश के नागरिकों के लिए अलग अलग अधिकार क्यों कर दिए जाएं। शेख अब्दुल्ला के अभिन्न नेहरू जी ने सरदार पटेल से कहा क्यों ना कांग्रेस की कार्य समिति में ये प्रस्ताव पास करा लिया जाए क्योंकी संवीधान सभा की कार्य समिति के अधिकांश सदस्य कांग्रेसी थे। किंतु कांग्रेस कार्य समिति ने भी इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

बाद में नेहरू जी ने सरदार पटेल पर इसके लिए अत्याधिक दबाव डाला,अंतोगत्वा नेहरू जी की ज़िद के चलते धारा 370 को एक प्रेफ़िक्स के माध्यम से संवीधान में जोड़ा गया जिसमें ये स्पष्ट किया गया कि धारा 370 एक अस्थायी या temperary धारा है जिसे बाद में बदल जायेगा।

किन्तु आजतक 370 एक temeprary धारा होते हुए भी 67 साल से संवीधान से हट नही पा रही?? 67 सालों से इतनी सरकारें आई और गई लेकिन किसी सरकार या राजनैतिक दल ने इसे हाथ लगाने की हिम्मत नही की?

और उसकी वजह ये है कि जब सारा देश व उसकी संवैधानिक शक्तियाँ संसद के दायरे में आती हैं तो धारा 370 कश्मीर को संसद के संवेधानिक अधिकारोँ से परे रखती है। संसद पंगु हो जाती है!!!! यानी जब संसद सारे देश के लिए निर्णय लेती है तो कश्मीर के मामले में वो कोई नियंत्रण नही कर सकती।

बात यहीं तक खत्म नही होती। 370 को अधिक मज़बूत बनाने के लिए एक और धारा 35A भी है जो की एक ही देश के नागरिकों के लिए अलग अलग अधिकार तय करती है ,कश्मीर के नागरिकों के अधिकार कुछ और व बाकी देश के नागरिकों के अधिकार कुछ और!!कश्मीर में 4 पीढी से रहने वाले लोगों को भी शरणार्थी समझा जाता है और उन्हें मौलिक अधिकार नही दिये जाते।

370 व 35A द्वारा ये तय किया जाता है की किसे कश्मीर का स्थायी नागरिक समझा जाये किसे नही। कौन लोकसभा के लिए तो वोट दे सकते है लेकिन विधान सभा के लिए नही!! कश्मीर के किन नागरिकों को सरकारी सुविधाएं मिल सकती हैं और किन्हें नहीं!! जब सारे देश मे minority के अधिकारों की बात होती है तो कश्मीर के पंडितों को minority का दर्जा नही दिया जाता अपितु उन्हें अपनी ही जन्मभूमि से विस्थापित होने पर विवश कर दिया जाता है!!उन्हें ना तो सरकारी नौकरी मिलती है ना ही वो सरकारी स्कूल कॉलेज में पढ़ सकते है ,ना ही सरकारी सुविधाएं ले सकते हैं

सन 1954 में भारत के संवीधान निर्माताओं ने भारतीय संसद तक से ये बात छुपाई व 35A को संवीधान की अधिकतर प्रतियों में भी नही छापा जाता। एक बड़ा धोखा संवीधान निर्माताओ ने देश के साथ किया और लाखों लोगों की जानें इसमें गई।

कानून जानने वाले भी ज्यादातर लोगों को 35A की जानकारी इसलिये नही है क्योंकी ये संवीधान के मूल भाग में ना होकर अप्पेडिक्स में है जिसे 1954 में जोड़ा गया व संसद को इसकी जानकारी नही दी गई।सारे नियमो को ताक पर रखकर सिर्फ राष्ट्रपति के आदेशों से इसे संवीधान में जोड़ दिया गया।

क्या आज भारत का नागरिक संसद व संवीधान की पारदर्शिता पर यकीन कर सकता है? क्या संवीधान बना कर छोड़ जाने वालों की पूजा कर सकता है?

जो कांटे संवीधान में हमारे लिए बोए जा चुके हैं हम उनकी कीमत कब तक चुकाएंगे?

10 वर्ष के लिए चलाये जाने वाले आरक्षण को आज 67 साल बाद निरन्तर चलाया जा रहा है और 370 और 35A जैसे अस्थाई धारा से आज देश डगमगा रहा है किंतु वोट की राजनीती से विवश हंमारे भाग्यविधाता कुछ भी करने में असमर्थ हैं?

Should we speak or should we not ?

अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब समझना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है

यदि आरक्षण का विरोध करो तो आपको दलित विरोधी समझा जाता है!

यदि पाकिस्तान का विरोध करो तो मुस्लिम विरोधी समझ जाता है!

गद्दारों का विरोध करो तो कांग्रेस विरोधी समझा जाता है!

GST व नोटबंदी पर बोल दो तो BJP विरोधी समझा जाता है!

कुरीतियों का विरोध करो तो धर्म विरोधी समझा जाता है!

पुरानी पीढ़ी का विरोध करो तो संस्कार विरोधी समझा जाता है!

नई पीढ़ी का विरोध करो तो नए युग का विरोधी समझा जाता है!

सास का पक्ष लो तो बहू विरोधी समझा जाता है!

बहू का साथ दो तो सास विरोधी समझा जाता हूं!

पत्थर मारने वालों का विरोध करो तो कश्मीर विरोधी समझा जाता है!

देश विरोधी पत्रकारों व TV एंकर का विरोध करो तो आपको सेक्युलर विरोधी समझा जाता है!

बाबाओं के विरोध करो तो अधर्मी समझा जाता है!

सफेदपोशों का विरोध करो तो समाज विरोधी समझा जाता है!

चमचों का विरोध करो तो नेता विरोधी समझा जाता है!

सिस्टम की खामियों का विरोध करो तो संविधान विरोधी समझा जाता है!

कुछ भी बोलो ,कुछ भी लिखो लोग कहीं ना कहीं आपकी गर्दन मरोड़ने को तैयार खड़े रहते हैं!

हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है!!

क्या करें ? बोलें की ना बोलें?

Babawaad

पिछले कुछ दिनों से एक के बाद एक बाबाओं का खुलासा हो रहा है। कभी आशाराम,कभी रामरहीम ,कभी फलाहारी और ना जाने कौन कौन !!

लेकिन यहां मैँ इन बाबाओं के कुत्सित कर्मों के बारे में बात नही कर रही। बाबाओं के काले किस्सों से अखबार व TV चँनेल्स रंगे पड़े हैं लेकिन सवाल ये उठता है की ये किस्से बनते कैसे हैं।

यदि विश्लेषण किया जाये तो हर बाबा के किस्से में कोई भी केस ब्लात्कार व शोषण की घटना के तुरंत बाद दर्ज नही हुआ। तकरीबन सारे ही केस हादसों के कुछ समय बाद सामने आये।

आज जब छेड़छाड़ व बलात्कार के शोषित तुरंत कानून की सहायता लेते हैं ब कानून भी अब पूरी तरह से शोषितों की मदद करता है तो इन मामलों में पुलिस में रिपोर्ट बाद में क्यों की जाती है।ज़ाहिर है ये बाबा बहुत ऊपर तक पहुंच रखते है ,नेता से लेकर मंत्री और पूंजीपति से लेकर कानून के रखवाले तक इनके दरबार मे हाजिरी भरते हैं।

अगर ये मान लिया जाए की बाबाओं की पहुंच ऊपर तक है और पीड़ित उनके भय से कानून की शरण लेने से डरते हैं तो फिर किस मोड़ पर वो ये निर्णय करते हैं की अब ये मामला खुले में आना है?

सभी बाबाओं के किस्सों में एक समानता तो है कि :

¶हर पीड़िता अपनी मर्ज़ी से उनके आश्रम में गई।
¶हर एक पीड़िता बाबा को पहले से जानती थी।
¶ हर पीड़िता का परिवार बाबा का भक्त होता है।
¶हर पीड़िता व उसके परिवार को बाबा पर अन्धभरोसा होता है।
¶हर पीड़िता हादसे से पहले भी बाबा के निकट संपर्क में रही हैं।
¶करीब सभी मामलों में पीड़ित के साथ मारपीट, प्रताड़ना या अन्य तरह का शारीरिक उत्पीड़न नही हुए।
¶सभी मामलों में पीड़ित के परिवार वालों ने इस मामलों को शुरू में ही report करने की ज़रूरत नही समझी?

यहाँ सभी को एक बात पर गहराई से ध्यान देना होगा कि महिलाओं को इश्वेर ने कुदरती रूप से ये समझने की ताक़त दी है कि वो जान जाती हैं की किसकी नज़र खराब है,कौनसी हरकत गलत है , गलत तरह से छुआ जाना,या कोई अश्लील इशारे करना।ये सब आभास महिलाएं छोटी उम्र से ही समझ जाती हैं।

एक औरत होने के नाते मैं जानती हूँ की महिलाओं में गलत नीयत को जानने की शक्ति पुरुषों से कहीं ज्यादा होती है।

लेकिन इन सभी किस्सों में ये महिलाएं शुरू में ही इन इशारों को समझ कर सतर्क क्यों नही होती?

इन बलात्कारों में आरोपी बाबा उन्हें सड़क से उठा कर किसी सुनसान जगह में ले जाकर बलात्कार नही करता अपितु ये महिलाएं ये जानते हुए भी की किसी भी पुरुष के पास इस प्रकार से एकांत में रहने पर खतरा हो सकता है फिर भी जाती हैं? क्यों?

जो घरवाले उन्हें किसी लड़के के साथ बात करते देखकर भड़क जाते है क्यो अपने परिवार की स्त्रियो को पराये पुरुष के पास इस प्रकार भेजते हैं?

जो जवान लड़कियाँ इन बाबाओं का शिकार होती हैं क्या उनकी माएँ इसे आभास नही कर पाती की किस प्रकार किसी पुरुष के पास अपनी जवान बेटी को भेजने में खतरा हो सकता है?

क्यों ऐसे समयों में परिवार की कोई अन्य स्त्री या पुरुष पीड़ित के साथ नही होती?

जहाँ बाबा गलत है वहाँ भक्त भी कुछ कम गलत नहीं!

ये वो भक्त हैं जो असलियत जानकर भी अनदेखा करते हैं कुछ पाने की लालसा में कुछ खोना भी पड़ेग ये उस बात को क्यों नही समझते ?

दरअसल इन मामलों की पीड़िता कहीं ना कहीं बाबा से प्रभावित होती हैं या फिर बाबा के पास अपनी किसी इच्छा की पूर्ती या निज स्वार्थ से जाती हैं।

यदि पीड़ित को बाबा कोई नौकरी दिलाता है ,या बाबा उनहे रुपिया पैसा देता है,व्यपार में पैसा देता है,जमीन जायदाद दिलवाता है,कार्य सिद्दी के लिए influential लोगों से जिनमे धनाढ्य व्यपारी से लेकर आला दर्जे के अधिकारी व राजनैतिक व्यक्ति होते हैं, उनसे पीड़ित का संपर्क कराता है, तो फिर पीड़ित को ये बात जान लेनी चाहिये की प्रतिफल में कुछ माँगा जायेगा।

बाबाओं की पावर इतनी होती है कि हनीप्रीत जैसी लड़की अपने पति को छोड़कर अधेड़ उम्र के थुलथुल भांड जैसे बाबा की सरपरस्ती में चली जाती है? वो इन बाबाओं के साथ क्यों संपर्क बनाती हैं? मतलब साफ है पैसा व पावर!!

लोग समझते हैं कि वो बाबा की शरण से सबकुछ फ्री में पा लेंगे।
Nothing is free in life, Everything has a price

बाबा अपनी कृपा की कीमत वसूलते हैं। यदि बाबा किसी जवान औरत पर उपकार करता है तो जानता है की उसे बदले में क्या चाहिये!! जानती ये औरतें भी हैं कि बाबा की उनपर नज़र है किंतु वो सोचती हैं काम निकल जाए फिर देखेँगे।

वो पहली बार शायद बाबा का विरोध नही करती लेकिन बाद में नही चाहती कि उसकी पुनरावृति हो इस डर से या मानसिक यातना से टूट कर वो कानून की शरण लेती हैं।

यदि कोई महिला किसी काम को निकलवाने किसी पुरुष के पास जाती है तो उसे इस बात का अहसास ज़रूर होता है कि सामने बैठा पुरुष बदले में क्या चाहता है लेकिन चाहे वो पारिवारिक मजबूरी हो या आर्थिक मज़बूरी हो या महत्वकांशा कहीं ना कहीं वो महिला झुकती ज़रूर है ,इस प्रकार के बने संबंधों में पुरुष अपने द्वारा दी गई सहायता या उपकार का बदला वसूलते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या महिला स्वयं अपने को इन स्थितियों में ले जाने के लिए किस हद तक तैयार होती है?

वो परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने के लिए तो मजबूरी वश इन संबंधों के लिए तैयार हो जाती है लेकिन वो मानसिक रूप से अपने आप को इसके लिए तैयार नही कर पाती। बाद में अंतर्द्वंद के चलते वो इन घटनाओं को उजागर करने को तैयार हो जाती है।

कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में एक प्रसिद्ध धर्मगुरु की शिष्या को ज्यों ही इस बात का अहसास हुआ की स्पेशल सेवा का मतलब क्या होता है और क्यों बाबाजी स्त्रियों को कमरे में बुलाते है उसने तुरंत पुलिस को सूचित कर दिया,लेकिन सवाल ये है उससे पहले जिन महिलाओं के साथ वो सबकुछ हुआ उसे वो जानकर भी अन्य महिलाओं को सतर्क क्यों नही करती। क्यों एक महिला दूसरी महिला की रक्षा के लिए आगे नही आती?

यौन शोषण भी एक प्रकार की रिश्वत ही है, यदि कोई फ़ेवर पुरुष को दिया जाए यो कीमत रुपये में वसूली जाती है और यही फ़ेवर महिला को दिया जाये तो कीमत शारीरिक संबंध के रूप में भी मांगी जा सकती है।

रिश्वत इसलिये ली जाती है क्योंकी हम अपना काम निकालने के लिए वो कीमत देने को तैयार हैं, यौन शोषण तब होता है जब आपका उद्देश्य, होने वाले शोषण से आपके लिए कहीं ज्यादा कीमत रखता है।

आज स्थिति इतनी खराब है महिलाओं को चरित्र हनन के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है ।यदि राजनीती में प्रतिद्वंदी को रास्ते से हटाना हो तो किसी महिला को छदम रूप में विरोधी के यहां भेज दो, वो महिला बाद में किसी प्रकार के आपतिजनक फ़ोटो व वीडियो बना कर मीडिया व सोशल मीडिया में उसे छपवा देगी। scandal बनेगा और विरोधी खत्म!!

सवाल ये है कि हम महिलाएँ कहीं ना कहीं स्वयं ही ऐसी स्थितियां पैदा कर रही है जिससे यौन शोषण जैसी घटनाएं कम होने की जगह बढ़ रही हैं ।कुछ महिलाएं थोड़े में सब्र करने को तैयार नही। महत्वकांशाएँ निरंतर बढ़ रही है।

यदि महिलाएँ इन situational compromises को छोड़कर यौग्यता बढाने पर ध्यान दें एक मजबूत चरित्र को लेकर चलें तो महिलाओं की स्थिति सम्मानजनक बनेगी। महिलाएं अपने को टूल बनने से रोकें।

यदि इच्छापूर्ती या महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए आप किसी बाबा,नेता,अधिकारी या महत्वपूर्ण व्यक्ति से सम्बंध बनाने को तैयार हैं तो आप समाज मे महिलाओं के सम्मान को गिराने की ज़िम्मेदार है जिसका नुकसान सभी स्त्रीजाति को होगा।

I request all my women fellow citizens to live life with dignity and do not use short cuts.