Babawaad

पिछले कुछ दिनों से एक के बाद एक बाबाओं का खुलासा हो रहा है। कभी आशाराम,कभी रामरहीम ,कभी फलाहारी और ना जाने कौन कौन !!

लेकिन यहां मैँ इन बाबाओं के कुत्सित कर्मों के बारे में बात नही कर रही। बाबाओं के काले किस्सों से अखबार व TV चँनेल्स रंगे पड़े हैं लेकिन सवाल ये उठता है की ये किस्से बनते कैसे हैं।

यदि विश्लेषण किया जाये तो हर बाबा के किस्से में कोई भी केस ब्लात्कार व शोषण की घटना के तुरंत बाद दर्ज नही हुआ। तकरीबन सारे ही केस हादसों के कुछ समय बाद सामने आये।

आज जब छेड़छाड़ व बलात्कार के शोषित तुरंत कानून की सहायता लेते हैं ब कानून भी अब पूरी तरह से शोषितों की मदद करता है तो इन मामलों में पुलिस में रिपोर्ट बाद में क्यों की जाती है।ज़ाहिर है ये बाबा बहुत ऊपर तक पहुंच रखते है ,नेता से लेकर मंत्री और पूंजीपति से लेकर कानून के रखवाले तक इनके दरबार मे हाजिरी भरते हैं।

अगर ये मान लिया जाए की बाबाओं की पहुंच ऊपर तक है और पीड़ित उनके भय से कानून की शरण लेने से डरते हैं तो फिर किस मोड़ पर वो ये निर्णय करते हैं की अब ये मामला खुले में आना है?

सभी बाबाओं के किस्सों में एक समानता तो है कि :

¶हर पीड़िता अपनी मर्ज़ी से उनके आश्रम में गई।
¶हर एक पीड़िता बाबा को पहले से जानती थी।
¶ हर पीड़िता का परिवार बाबा का भक्त होता है।
¶हर पीड़िता व उसके परिवार को बाबा पर अन्धभरोसा होता है।
¶हर पीड़िता हादसे से पहले भी बाबा के निकट संपर्क में रही हैं।
¶करीब सभी मामलों में पीड़ित के साथ मारपीट, प्रताड़ना या अन्य तरह का शारीरिक उत्पीड़न नही हुए।
¶सभी मामलों में पीड़ित के परिवार वालों ने इस मामलों को शुरू में ही report करने की ज़रूरत नही समझी?

यहाँ सभी को एक बात पर गहराई से ध्यान देना होगा कि महिलाओं को इश्वेर ने कुदरती रूप से ये समझने की ताक़त दी है कि वो जान जाती हैं की किसकी नज़र खराब है,कौनसी हरकत गलत है , गलत तरह से छुआ जाना,या कोई अश्लील इशारे करना।ये सब आभास महिलाएं छोटी उम्र से ही समझ जाती हैं।

एक औरत होने के नाते मैं जानती हूँ की महिलाओं में गलत नीयत को जानने की शक्ति पुरुषों से कहीं ज्यादा होती है।

लेकिन इन सभी किस्सों में ये महिलाएं शुरू में ही इन इशारों को समझ कर सतर्क क्यों नही होती?

इन बलात्कारों में आरोपी बाबा उन्हें सड़क से उठा कर किसी सुनसान जगह में ले जाकर बलात्कार नही करता अपितु ये महिलाएं ये जानते हुए भी की किसी भी पुरुष के पास इस प्रकार से एकांत में रहने पर खतरा हो सकता है फिर भी जाती हैं? क्यों?

जो घरवाले उन्हें किसी लड़के के साथ बात करते देखकर भड़क जाते है क्यो अपने परिवार की स्त्रियो को पराये पुरुष के पास इस प्रकार भेजते हैं?

जो जवान लड़कियाँ इन बाबाओं का शिकार होती हैं क्या उनकी माएँ इसे आभास नही कर पाती की किस प्रकार किसी पुरुष के पास अपनी जवान बेटी को भेजने में खतरा हो सकता है?

क्यों ऐसे समयों में परिवार की कोई अन्य स्त्री या पुरुष पीड़ित के साथ नही होती?

जहाँ बाबा गलत है वहाँ भक्त भी कुछ कम गलत नहीं!

ये वो भक्त हैं जो असलियत जानकर भी अनदेखा करते हैं कुछ पाने की लालसा में कुछ खोना भी पड़ेग ये उस बात को क्यों नही समझते ?

दरअसल इन मामलों की पीड़िता कहीं ना कहीं बाबा से प्रभावित होती हैं या फिर बाबा के पास अपनी किसी इच्छा की पूर्ती या निज स्वार्थ से जाती हैं।

यदि पीड़ित को बाबा कोई नौकरी दिलाता है ,या बाबा उनहे रुपिया पैसा देता है,व्यपार में पैसा देता है,जमीन जायदाद दिलवाता है,कार्य सिद्दी के लिए influential लोगों से जिनमे धनाढ्य व्यपारी से लेकर आला दर्जे के अधिकारी व राजनैतिक व्यक्ति होते हैं, उनसे पीड़ित का संपर्क कराता है, तो फिर पीड़ित को ये बात जान लेनी चाहिये की प्रतिफल में कुछ माँगा जायेगा।

बाबाओं की पावर इतनी होती है कि हनीप्रीत जैसी लड़की अपने पति को छोड़कर अधेड़ उम्र के थुलथुल भांड जैसे बाबा की सरपरस्ती में चली जाती है? वो इन बाबाओं के साथ क्यों संपर्क बनाती हैं? मतलब साफ है पैसा व पावर!!

लोग समझते हैं कि वो बाबा की शरण से सबकुछ फ्री में पा लेंगे।
Nothing is free in life, Everything has a price

बाबा अपनी कृपा की कीमत वसूलते हैं। यदि बाबा किसी जवान औरत पर उपकार करता है तो जानता है की उसे बदले में क्या चाहिये!! जानती ये औरतें भी हैं कि बाबा की उनपर नज़र है किंतु वो सोचती हैं काम निकल जाए फिर देखेँगे।

वो पहली बार शायद बाबा का विरोध नही करती लेकिन बाद में नही चाहती कि उसकी पुनरावृति हो इस डर से या मानसिक यातना से टूट कर वो कानून की शरण लेती हैं।

यदि कोई महिला किसी काम को निकलवाने किसी पुरुष के पास जाती है तो उसे इस बात का अहसास ज़रूर होता है कि सामने बैठा पुरुष बदले में क्या चाहता है लेकिन चाहे वो पारिवारिक मजबूरी हो या आर्थिक मज़बूरी हो या महत्वकांशा कहीं ना कहीं वो महिला झुकती ज़रूर है ,इस प्रकार के बने संबंधों में पुरुष अपने द्वारा दी गई सहायता या उपकार का बदला वसूलते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या महिला स्वयं अपने को इन स्थितियों में ले जाने के लिए किस हद तक तैयार होती है?

वो परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने के लिए तो मजबूरी वश इन संबंधों के लिए तैयार हो जाती है लेकिन वो मानसिक रूप से अपने आप को इसके लिए तैयार नही कर पाती। बाद में अंतर्द्वंद के चलते वो इन घटनाओं को उजागर करने को तैयार हो जाती है।

कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में एक प्रसिद्ध धर्मगुरु की शिष्या को ज्यों ही इस बात का अहसास हुआ की स्पेशल सेवा का मतलब क्या होता है और क्यों बाबाजी स्त्रियों को कमरे में बुलाते है उसने तुरंत पुलिस को सूचित कर दिया,लेकिन सवाल ये है उससे पहले जिन महिलाओं के साथ वो सबकुछ हुआ उसे वो जानकर भी अन्य महिलाओं को सतर्क क्यों नही करती। क्यों एक महिला दूसरी महिला की रक्षा के लिए आगे नही आती?

यौन शोषण भी एक प्रकार की रिश्वत ही है, यदि कोई फ़ेवर पुरुष को दिया जाए यो कीमत रुपये में वसूली जाती है और यही फ़ेवर महिला को दिया जाये तो कीमत शारीरिक संबंध के रूप में भी मांगी जा सकती है।

रिश्वत इसलिये ली जाती है क्योंकी हम अपना काम निकालने के लिए वो कीमत देने को तैयार हैं, यौन शोषण तब होता है जब आपका उद्देश्य, होने वाले शोषण से आपके लिए कहीं ज्यादा कीमत रखता है।

आज स्थिति इतनी खराब है महिलाओं को चरित्र हनन के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है ।यदि राजनीती में प्रतिद्वंदी को रास्ते से हटाना हो तो किसी महिला को छदम रूप में विरोधी के यहां भेज दो, वो महिला बाद में किसी प्रकार के आपतिजनक फ़ोटो व वीडियो बना कर मीडिया व सोशल मीडिया में उसे छपवा देगी। scandal बनेगा और विरोधी खत्म!!

सवाल ये है कि हम महिलाएँ कहीं ना कहीं स्वयं ही ऐसी स्थितियां पैदा कर रही है जिससे यौन शोषण जैसी घटनाएं कम होने की जगह बढ़ रही हैं ।कुछ महिलाएं थोड़े में सब्र करने को तैयार नही। महत्वकांशाएँ निरंतर बढ़ रही है।

यदि महिलाएँ इन situational compromises को छोड़कर यौग्यता बढाने पर ध्यान दें एक मजबूत चरित्र को लेकर चलें तो महिलाओं की स्थिति सम्मानजनक बनेगी। महिलाएं अपने को टूल बनने से रोकें।

यदि इच्छापूर्ती या महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए आप किसी बाबा,नेता,अधिकारी या महत्वपूर्ण व्यक्ति से सम्बंध बनाने को तैयार हैं तो आप समाज मे महिलाओं के सम्मान को गिराने की ज़िम्मेदार है जिसका नुकसान सभी स्त्रीजाति को होगा।

I request all my women fellow citizens to live life with dignity and do not use short cuts.

9 Days of Navratri

देवी प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोsखिलस्य।

प्रसीद विश्वेतरि पाहि विश्वं त्वमीश्चरी देवी चराचरस्य।

देवी मां की उपासना व पूजा के ये 9 दिन बहुत पावन होते हैं, इसमें पूजापाठ के साथ साथ इच्छाओं के त्याग का भी बहुत महत्व है। यदि शरीर व स्वास्थ्य साथ दे तो सूक्ष्म व सादा भोजन करना चाहिए।

सर्व मंगलं मांगल्ये शिवे सर्वाथ साधिके।

शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥

लेकिन यहाँ भोजन के त्याग से ज्यादा महत्वपूर्ण है बुरे विचारों व बुरे कर्मों का त्याग करना। हमारे मन मे जो बुराई रुपी राक्षस छुपे हैं माँ भगवती उनका नाश करे। कोशिश करके अपनी बुराइयों पर विजय पायें।

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:।
स्वस्थै स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।।
द्रारिद्र दु:ख भयहारिणि का त्वदन्या। सर्वोपकारकारणाय सदाह्यद्र्रचिता।।

आजकल व्यस्तता सबके जीवन मे अत्यधिक हैं फिर भी हो सके तो समय निकालकर चंडी पाठ या सप्तशती का पाठ करना चाहिये। प्रतिदिन पूरा पाठ ना हो सके तो थोड़ा थोड़ा करके पढ़ना चाहिए।

बहुत से लोग सिर्फ शब्दों पर जाते हैं आपको आश्चर्य होगा की उसमे कितने गूढ़ संदेश छुपे हैं।
यदि सिर्फ कवच का भी पाठ करें तो आप ज्यादा postive महसूस करेंगे।

क्योंकी कवच पाठ में हम अपने शरीर की बाहरी-आंतरिक अंगों की रक्षा और स्वस्थ रहने की बात करते हैं। कवच पाठ में एक-एक करके हम उन सभी अंगों का नाम ये श्रद्धा रखते हुए लेते हैं कि देवी दुर्गा उन अंगों को स्वस्थ रखते हुए हमें सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं। इस तरह की पॉजिटिव सोच को जब हम किसी भी ईश्वरीय शक्ति से जोड़ते हैं तो वे बातें हमारे मन में और भी ज्यादा मजबूती से जड़ें जमा लेती हैं।

कुछ कुतर्की लोग उसमे से कुछ अंशो को अश्लील करार देते है जिसमे देवी के रूप की व्यख्या की गई है, उन्हें शब्दों के पीछे छुपा रहस्य नही समझ आ सकता। जिन लोगों को मनोहर कहानियां पढ़ने की आदत हो उन्हें देवी में माँ का रूप कैसे नज़र आएगा।

सृष्टिस्थिति विनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि! नमोऽस्तुते॥

जो लोग किसी कारणवश पूजा पाठ या व्रत ना भी कर पाते हों उन्हें भी चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं क्योंकी
“पूत कपूत सुने है पर ना माता सुनी कुमाता”

उनके ऊपर भी देवी मां की कृपा उतनी ही रहेगी बस थोड़ा बुराइयों का बलिदान माँ के चरणों मे कर दें।
धर्म का पालन विचारों में होना ज्यादा जरूरी है बजाय आडंबरों के!!

इस नवरात्री अपने अंदर के राक्षसों का मर्दन करें।

ना बुरा करें ना होने दें।

Happy Mother-In-Law Day

आप सोच रहे होंगे कि ये दिन तो कभी सुना ही नही!!

आज मेरी *सास*का श्राद्ध था।सभी रीतिरिवाज करने के बाद भी ऐसा नही लग रहा था कि वो हमारे साथ नही हैं। मैँ हर पल उन्हें परिवार में महसूस करती हूँ। उनका मार्गदर्शन आज भी हमे मिलता है।

आज मैं जो कुछ भी हूँ उसमे एक बड़ा योगदान उनका भी है। उनसे इतना कुछ सीखने को मिला की लगा कि जीवन मे वो बहुत काम आ रहा है। उन्होंने सीखाया कि परिस्तिथियों से कैसे लड़कर आगे बढ़ा जाता है। किस प्रकार परिवार को जोड़कर रखा जाता है।
कर्मठ बनो क्योंकी काम करने से कोई नही मरता। मुझे निर्भीक बनाया। किसी भी कठिन परिस्थिति में वो सम्बल देती थीं। उनका छोटा सा कथन”घबराओ नही,सब ठीक हो जाएगा” सुनती थी तो लगता था वाकई सब ठीक हो जाता है।

मुझसे बहुत सारी गलतियां भी होती थी लेकिब उनमे बहुत धैर्य था वो मेरे समझने का इंतज़ार कर लेती थी। सबसे बड़ी चीज जो सीखी स्वाभिमान व संतोष , शायद इसलिये कभी घर मे “अपना पराया” व “तेरा मेरा” नही हुआ। कभी किसी से ईर्ष्या नही हुई।

भारतीय संस्कृति में एक स्त्री को 2 बार जन्म होता है । एक तो जब वह एक बेटी के रूप में किसी के घर जन्मती है और दूसरा जब वह किसी के घर मे बहु के रूप में आती है।

जन्म देने वाली माँ जीवन के आरंभिक वर्षों में उसका पालन पोषण करके उसे एक ज़िम्मेदार वयस्क बनाती है लेकिन विवाह के बाद सास रूपी माता उसे एक परिवार को संभालने की दीक्षा देती है जो अगली 2 से 3 पीढी तक उसके काम आता है। सास ही सिखाती है इतने रिश्तों के बीच कैसे तालमेल बिठा कर परिवार को एकसाथ लेकर चलते हैं।

वो हमें अपना वो बेटा सौंप देती हैं जिसे उन्होंने अपनी छाती के नीचे रखकर पाला था। और एक सास कैसा महसूस करती है वो हमें तब पता चलता है जब हम स्वयं माँ बनते हैं।

पता नही क्यों हमारे समाज मे सास शब्द को एक उपहासिक पद के रूप में समझा जाता है। ज्यादातर कहानी किस्सों में ,TV सीरियल में ,फिल्मों में सास को एक खलनायिका के रूप में प्रस्तूत किया जाता है। जबकि वो भी किसी की माँ भी होती है, वो स्वयं भी सास बहू वाले रिश्ते से निकलकर आई होती है। आपके पति को उन्होंने 9 महीने पेट मे रखा व अपना दूध पिलाकर बड़ा किया।

सारे संस्कार माँ बाप ही नही देंकर भेजते ,बहुत से संस्कार ससुराल से भी सीखे जाते हैं। जो स्त्रियाँ ससुराल रूपी गंगा में डुबकी लगा लेती हैं वो अपने वैवाहिक जीवन मे ज्यादा सफल होती है।

कोई भी रिश्ता अपने आप सफल नही हो सकता, उसे सफल बनाना पड़ता है। रिश्तों को मजबूत करने के लिये उनमे निस्वार्थ प्रेम ,आदर व उदारता की सीमेंट डालनी पड़ती हैं । जिनके घर की दीवारें मजबूत होती हैं उनमें बाहर वाले सेंध नही लगा सकते।

यदि बहु अपने को सास की जगह रखकर सोचे और सास स्वयं को बहु की जगह रखकर सोचे तो सबकुछ साफ साफ समझ आ जायेगा ।

सभी विवाहित बहने से कहूँगी
“रिश्तों को ढोईये मत ,रिश्तों को जीना सीखिये”
ससुराल *जेल*नही *जीवन* है।

Care When They Are Here

पार्किन में गाड़ी में बैठी मैं कुछ पढ़ रही थी तभी खिड़की पर आहट हुई,बाहर एक वृद्ध महिला एक कपड़ा लिए गाड़ी का शीशा पोंछ रही थी।

शक्ल से वो किसी ठीक ठाक घर की लग रही थी।मैंने कहा “अम्मा ये उम्र तुम्हारी काम करने की नही घर बैठ कर सेवा कराने की है”उन्होंने बताया की घर मे बेटा, बहु पोते सभी हैं किंतु सवेरे ही वो उसे घर से निकाल देते हैं, कि मांग कर दिनभर गुज़ारा करे,आत्मसम्मान की वजह से वो भीख नही मांग पाती तो गाड़ी के शीशे पोंछ 2-4 रु कमाने की कोशिश करती है। मैंने उन्हें सम्मान से पास वाले ठेले से चाय पिलाई व समोसा खिलाया। उस माँ के काँपते हाथों में कप देखकर मैं सोच रही थी ये वही बेटा होगा जिसे इसने हर तकलीफ से बचा कर पाला होगा और आज वो इसे एक रोटी नही दे रहा।

ये कोई एक कहानी नही,बहुत सी ऐसी घटनाओं को देखा। समाज के सम्मानित सेवा निवृत्त बुजुर्गों तक का घोर अपमान व उपेक्षा हो रही है।जो आज भी हज़ारों रु पेंशन के घर मे दे रहे हैं और उनके बच्चे उन्हें टूटी कुर्सी की तरह घर के किसी कोने में रख देते हैं।

मेरी माताजी के कुछ पुराने सहयोगियों का हाल देखा। बुजुर्ग महिलाएँ घर का साग सब्जी रिक्शाओं पर व पैदल चलकर लाती है।
जबकि उनके बेटे बहु गाड़ियों में घूमते हैं। इस उम्र में भी वो सारे घर का खाना बनाती हैं। इन बुजुर्गों ने अपनी जीवन भर की कमाई से बेटों को आलीशान कोठियां बना कर दी और अब भी पोते पोतियों की ख्वाइश पूरी करते हैं लेकिन वही बेटा बहु उन्हें 2 रोटी भी इज़्ज़त से नही देते।

एक और बुजुर्ग दंपती हैं जिन्हें उन्ही के बेटे बहु ने घर से निकालकर एक कमरे में सिमट दिया है। उनकी बहू रसोई में घुस कर चाय भी नही बनाने देती मज़बूरन उन्हें टिफ़िन सर्विस लगानी पड़ी। दिल पर पत्थर रखकर उन्होंने अदालत की शरण ली।

अन्य बुजुर्ग महिला जिनकी टांग टूटी हुई है बैसाखी पर चलती हैं आलीशान कोठी के अपने कमरे को रात बन्द के सोती हैं क्योंकी बेटा रोज़ जान से मारने की धमकी देता है, सिर्फ इसलिए,कि वो अपनी पूरी पेंशन उसे नही देती।

एक और दंपती हैं जिनमे से एक को लकवा है और वो अपनी नित्य क्रियाओं तक को भी करने में असमर्थ हैं लेकिन घर का कोई सदस्य उनके कमरे तक मे नही आता। उनका दोनों का खाना भी कमरे के बाहर ही रख दिया जाता है।

ये सब देखकर मुझे ये लिखने पर मजबूर होना पड़ा ” जीते जी जिन्होंने माता पिता को एक रोटी चैन से नही दी उनके श्राद्ध में कुत्ते और कौवे को रोटी खिलाते हैं”

आज समाज मे कुछ बुजुर्गों की स्थिति बहुत दयनीय है ना तो उन्हें वो सम्मान मिल रहा है ना ही सेवा जिसके वो हक़दार हैं। ऐसे में कैसे उनके बच्चे उनका आशीर्वाद पा सकते हैं।

कोरे रिवाज़ों को निभाने से कर्तव्यों की इति नही हो जाती। रिश्तों का कर्ज ना तो दान देने से उतरता है ना ही पंडित को खाना खिलाने से।

माता पिता की आत्मा को उनके जीते जी प्रसन्न रखिये। उन्हें आपके थोड़े से सम्मान व थोड़ी सी सेवा की अपेक्षा है। उनकी इच्छाओं को जीते जी पूरा करिये।

कोई पंडित या जानवर आपके दिए भोजन को उनतक नही पहुंचा पायेगा यदि आपने जीते जी उन्हें कष्ट दिया होगा।

जीते जी उन्हें तीर्थ कराइए ,गंगा में प्रवाहित की अस्थियों से उनकी अतृप्त इच्छा नही पूरी होगी।

जीते जी उन्हें अच्छे व साफ कपड़े दीजिये मरणोपरांत दान दिये कपड़ों से उनकी आत्मा नही प्रसन्न होगी।

जीते जी उन्हें अच्छा भोजन कराइये वरना चाहे लाखो की दावत करिये उनकी आत्मा तो भूखी है दुनिया से गई होगी।

जीते जी समय निकाल कर उनके पास कुछ देर बैठिये। अपने बच्चों को बुजुर्गों से स्नेह करना सिखाइये वरना चाहे कितने कंबल दान करिये वो मुड़कर आपको आशीर्वाद देने नही आयेंगे।

जिन्हें माता पिता ,बाबा दादी व बुजुर्गों का आशीर्वाद नही मिलता वो चाहे कितनी दौलत कमा लें दुःख उनका पीछा नही छोड़ते।

सामाजिक रूढ़ियों से ज्यादा पारिवारिक कर्तव्य निभाइये और कोशिश करिये आपके माँ बाप जीते जी अपने सारे आशीर्वाद आपके लिए छोड़ जायें।

उनके छोड़े हुए धन व जायदाद से ज्यादा उनका छोड़ा हुआ आशीर्वाद आपके काम आयेगा।

Cover system

हम भारत वासियों को कवर चढ़ाने का बहुत शौक है
बाज़ार से बहुत सुंदर सोफा खरीदेंगे लेकिन फिर उसे भद्दे सफेद जाली के कवर से ढक देंगे।

बढ़िया रंग का सुंदर सूटकेस खरीदेंगे फिर उसपर मिलिट्री रंग का कपड़ा चढ़ा देंगे।

मखमल की रजाई पर फूल वाले फर्द का कवर

फ्रिज पर कवर
माइक्रोवेव पर कवर
वाशिंग मशीन पर कवर
मिक्सी पर कवर
थर्मस वाली बोतल पर कवर
TV पर कवर
कार पर कवर
कार की कवर्ड सीट पर एक और कवर
स्टेयरिंग पर कवर
गियर पर कवर
फुट मैट पर एक और कवर
सुंदर शीशे वाली डाइनिंग टेबल पर प्लास्टिक का कवर
स्टूल कवर
चेयर कवर
मोबाइल कवर
बेडशीट के ऊपर बेड कवर
गैस के सिलिंडर पर कवर
RO पर कवर
किताबों पर कवर
काली कमाई पर कवर
गलत हरकतों पर कवर
बुरी नियत पर कवर

लेकिन…..
कचरे के डिब्बे पर ढक्कन नदारद
खुली नालियों के कवर नदारद
कमोड पर ढक्कन नदारद
मैनहोल के ढक्कन नदारद
सर से हेलमेट नदारद
खुले खाने पर से कवर नदारद

क्या ढकना है क्या खुला रखना…

ये हम कब समझेंगे??

“डेरा झूठा सौदा”

भारत आदिकाल से गुरुओं का देश रहा है जहां बहुत से गुरु हुए जिन्होंने समाज को राह दिखायी लेकिन आज भारत पाखंडी बाबाओं से भरा पड़ा है।

आज से करीब 190 साल पहले राजा राममोहन राय ने समाज के सभी धर्मों में तथाकथित धर्मगुरुओं के बढ़ते हुए आधिपत्य के बारे में कहा था कि श्रद्धालू इश्वेर की शक्ति को ना पहचानकर समाज मे से ही उपजे हुए कुछ लोगों की महत्वकांशा का शिकार हो जाएंगे। इसी कड़ी में औरतें कुछ और आगे बढ़कर उन्हें अपना सर्वस्व तक सौंपने को तैयार हो जाएंगी। ये समाज के पतन का कारण भी हो सकता हैं। (thoughts roughly extracted from “Indias Struggle for Independence” By Bipin Chandra)

राम रहीम, रामपाल,आसाराम,राधे माँ, और ना जाने कितने ऐसे नाम जो जनता को उल्लू बनाने की फैक्ट्रियां चला रहे है और लोग बड़े चाव से उन्हें TV पर ही दंडवत करके जन्म सफल करते रहते है ।

चलिये आपको बाबा कैसे बनते हैं उसकी एक सच्ची घटना बताती हूँ।बात कुछ पुरानी है लेकिन आज देश मे हो रहे ढोंग के व्यपार को मद्देनजर रखते हुए मैं इसे आपसे साझा कर रही हूँ ।

एक यात्रा के दौरान कुछ घण्टे एक बाबाजी का सहयात्री बनने का मौका मिला। वो जमाना मोबाइल रिकॉर्डिंग का नही था सो घटना दिमाग मे ही रिकॉर्ड रही।

उन बाबाजी ने बताया के वो 5 भाई बहन में अपने माँ बाप की सबसे नालायक संतान थे,पढ़ाई में मन नही लगता था,जब तब घर से भाग जाते थे। उनकी 2 ही विशेषता थी कि वो वाकपटु थे और सुरीला कंठ पाया था।

धन के अभाव में कभी मंदिर में तो कभी दुकानों के बरामदे में सो जाते थे। उन्हें किसी भी प्रकार के काम करने में कोई रुचि नही थी सिर्फ घूमना व आवारागर्दी करना पसंद था।

एक बार वो किसी चिलम बाबा के डेरे पर रुके वहां से उन्हें चिलम की लत लग गई। वहां उन्होंने सीखा की कैसे चिलम बाबा सारा दिन जनता को उल्लू बनाते थे। ज्यादातर लोग या तो घरेलू झगड़ों के तंत्र मंत्र कराने आते थे या अधिक अधिक से अधिक धन किस प्रकार प्राप्त हो इसके लिए चरण दबाते थे।

चिलमबाबा भक्तों को चिलम की राख भभूत बता कर बांटते रहते थे। रात में गुरु चेला खूब हंसते थे की किस प्रकार वो लोगों को काठ का उल्लू बनाते थे।

सबसे आसान शिकार घरेलू महिलाएं होती थी।

वहीँ से हमारे इन महाशय को बाबा बनने का आईडिया आया। पहले उन्होंने दाड़ी व बाल इत्यादी बढ़ाये। कई प्रकार की मालाएं पहनी हुलिया बदला। फिर उन्होंने वहां से कुछ दूर एक गाँव को अपनी शिकारस्थली के रूप में चुना।

वहां एक खेत मे पीपल के नींचे चबूतरे पर एक छोटा सा मंदिर बना हुआ था वहीँ डेरा डाला।

2-4 दिन में वो गांव के एक आध लोगों को राम कथा सुनाने लगे। धीरे धीरे रोज़ शाम को मंडली जुड़ने लगी। गांव के घरों से बाबा का भोजन आने लगा। बाबा के लिए कमरा बन गया।

बाबा ने एक दिन कहा की मैं एक हफ्ते तक ध्यान में जाऊँगा व गाँव के कल्याण के लिये भगवान से मिलकर आऊँगा। बाबा कमरे में बंद हो गए उन्होंने अपने एक शातिर चेले के माध्यम से अंदर भोजन इत्यादी की व्यवस्था कर ली। बाबा को ध्यान में देखने के लिए भीड़ जुड़ने लगी। एक हफ्ते बाद बाबा ने बाहर आकर कहा की वो साक्षात भगवान से मिलकर आएं हैं और भगवान ने कहा है की इस गांव में अगर एक भव्य मंदिर का निर्माण होगा व रोज़ भगवत कथा होगी तो भगवान ये इस गांव में आकर बस जाएंगे।

फिर क्या था मंदिर निर्माण के लिए चंदा जुटना शुरू हो गया। लोग हर संभव दान देने लगे। मंदिर का प्रांगण बड़ा हो गया। जिस बिचारे गरीब की ज़मीन थी उसपर सभी तरह का दबाव पड़ने लगा की वो ज़मीन अब भगवान की हो गई और उसके परिवार पर भगवान की कृपा हो गई। स्थानीय नेता भी बाबा के पास आने लगे क्योंकी बाबा अपने भक्तों को जिसे वोट देने को कहेंगे भक्त उसे ही वोट देंगे।

फिर आस पास की जमीनें हड़पने का सिलसिला शुरू हुए क्योंकी अब मंदिर ही नही आश्रम भी बनना था। अब बड़े बड़े सेठ लोग भी उसमे सहयोग देने लगे। बाबा का दरबार लगने लगा। छोटे बड़े सब बाबा के दरबार मे मत्था टेकने आने लगे। भंडारा होने लगा। मंदिर के बाहर दुकाने बन गयी वो भी मंदिर के ट्रस्ट के अधीन थी जिसके मुखिया बाबा व उनके साहूकार चेले थे। कारोबार चल निकला।

फिर एक दिन कीर्तन में बाबा की नज़र एक सुंदर दुखियारी पर पड़ी जिसे बाबा ने एकांत में बुलाया पता लगा पति को नशे की लत थी सो वो लड़कर मॉयके आ गयी थी। बाबाजी की lovestory शुरू हो गई। धीरे धीरे वो सुंदरी, साध्वी में बदल गयी व बाबा की सेवा में आश्रम में रहने लगी। उसका काम महिला श्रद्धालुओं की भीड़ जुटाने का था। सास बहू, पति पत्नी, बांझपन, पुत्र रत्न की प्रप्ति जैसे टोनों के लिए बाबाजी की सेवाएं ली जाने लगी। बाबाजी महिलाओं के भगवान हो गए।

वो हर महिला को कहते थे की सिर्फ वो ही बाबा के लिए बनी है और हर महिला अपने को बाबाजी की चहेती समझने लगी। बाबा की महिला टीम तैयार थी। गाहे बगाहे बाबा जी अपनी चेलियों को स्थानीय पावरफुल लोगों के पास भेजने लगे। जमीनें आश्रम के नाम पर खरीदी जाने लगी। फिर वहां पैसे वाली पार्टियों से product सप्लाई पर पैसा लगवाया जाने लगा। दान व धर्म के नाम पर काला पैसा सफेद करवाने का कारोबार शुरू हो गया। राजनेता भी बाबा की शक्ति को समझने लगे। उनके पैर छूने व आशीर्वाद लेने आने लगे।

बहुत खास लोगों के लिए आश्रम में सुर, सुरा सुंदरी सभी का इंतज़ाम होता था। सबकी बिगड़ी सवारने वाले बाबा जी ने सबसे पहले अपनी बिगड़ी सुधार ली।

कुटिया की जगह बाबा के महल बन गया। एक धूर्त निठल्ला अब भगवान बन गया। लोग उनकी माला, तावीज़ पहनने लगे और उल्लू बनने का सिलसिला चलता रहा।

जब तक हम अपने लालच, लोभ व गलत वृतियों को क़ाबू नही रखेंगे ना जाने ऐसे कितने बाबा हमारी कमज़ोरियों का फायदा उठाते रहेंगे ।