China Effect

मेरे प्रिय भारतवासियों

हम संख्या में चीन से कुछ ही पीछे हैं लेकिन दुनिया फतह करने में बहुत पीछे।

जब हम make in india , made in india , मेरा भारत महान, भारत मेरी जान में उलझे पडें है चीन अपने पंजे छोटे से छोटे देश मे फैला चुका है। कोई देश चीन से अछूता नही है। चीन की जड़ें बहुत गहरी फैल चुकी हैं।

वो भारत के गणेश लक्ष्मी और दिये भी बना रहा है, और रूस के फूलदान भी, वो अफ्रीका के ज़ेबरा भी बना रहा है और हॉलैण्ड के नकली टूलिप्स भी, वो samsung को मात करते नकली फ़ोन भी बना रहा है और Hyundai को मात करने वाली Cherry कार भी।

जब हम प्रजातंत्र, साम्यवाद, मार्क्सवाद में उलझे हैं चीन पूंजीवाद के पिछले दरवाजे से घुस कर अपना स्थान बना चुका हैं।

इतने देशों में घूम चुकी हूं लेकिन हर देश मे एक ही चीज कॉमन मिली .. चीन!!!

हम हनी सिंह से लेकर अमिताभ बच्चन ..
विराट से लेकर रजनीकांत में उलझे हुए हैं और चीन एक ऑक्टोपस की तरह दुनिया मे अपने पंजे फैला चुका है।

दिल्ली के पराठें इम्फाल में नही पहुंचते, महाराष्ट्र की सौल कढ़ी बलिया में नहीं पहुंच पाई लेकिन चाऊमीन हर जगह है।

जितना आप अपने देश के बारे में नही जानते उससे ज्यादा चीन आपके प्रदेशों के बारे में जानता है।

चीन ये भी जानता है कि दिवाली में आप गणेश लक्ष्मी खरीदते हैं और होली में पिचकारी , क्रिसमस में बिजली की लड़ और वास्तु का पिरामिड । लेकिन आप नही जानते की चीन में नया साल कब होता है?

वास्तु छोड़कर आपने फेंगशुई पकड़ लिया है और चावल छोडक़त फ्राइड राइस?

प्लीज ये bjp, कांग्रेस, बसपा, सपा से बाहर निकल कर अपनी अस्मिता के बारे में भी सोचना शुरू करिये वरना दुनिया की दूसरी बड़ी जनसंख्या होकर भी आप कद्दू बन जाएंगे ।

मैंने जो देखा समझा दिया आगे आपकी मर्जी!

Children of Lesser Gods

जिस प्रकार हमारे गौ रक्षक भाई ढूँढ ढूँढ कर गौ तस्करों को पकड़ते हैं और गौ माता की रक्षा करते हैं उसी प्रकार का एक प्रयास यदि अबोध व मासूम बच्चों की तस्करी को रोकने के लिए करें तो बहुत से मासूम नर्क जैसा जीवन भोगने से बच जायेंगे

भारत मे करीब 2लाख लोगहर साल मानव तस्करी काशिकार होते हैं, जिसमे से तकरीबन 10% ही विदेशों में भेजे जाते हैं बाकी लोग अपने ही देश मे अपने ही लोगों के द्वारा खरीदे बेचे जाते हैं।

हर 8 मिनट पर एक बच्चा अगवा होता है ,40000 से भी ज्यादा बच्चे हर साल मानव तस्करी का शिकार हो जाते हैं। 3लाख से ज्यादा बच्चे सड़कों पर भीख मांगने पर मज़बूर कर दिये जाते हैं।मानव तस्करी एक ऐसा क्षेत्र है जिससे दुनिया जूझ रही है किन्तु भारत मे इसकी वजहें बहुत ही विस्तृत हैं।

गरीबी इनमे से एक प्रमुख कारण हैं, धिक्कार है हम भारत की जनता पर जहां भूख की वजह से मासूम बच्चे बिक जाते हैं। कैसा दुर्भाग्य है कि भूख माँ बापों को अपना बच्चा बेचने पर मजबूर कर देती है।

मानव तस्करी में 50% से भी ज्यादा बच्चे होते हैं और उनमे से तकरीबन 80% लड़कियाँ होती हैं।

आज भी हमारे देश मे सब्जी की तरह इंसान बिकते हैँ और हम समृद्धि व तकनीकी विकास की बातें करते रहते हैं!

75 से 80 प्रतिशत मानव तस्करी सेक्स व्यापार के लिए होती है जहां छोटी बच्चियों को वो अमानवीय प्रताड़ना दी जाती जिसके बारे में आप सोच भी नही सकते। देश के कुछ हिस्सों में छोटी बच्चियों को देवदासी जैसी घिनोनी प्रथा का शिकार बन आजीवन वैश्यावृति के लिए झोंक दिया जाता है।ये वही देश है जहां छोटी छोटी बच्चियों में देवी माँ का रूप देखा जाता है।

बहुत से बच्चे मजदूरी व घरेलू नौकर का काम करने के लिए बेचे जाते हैं। एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर 9 साल का एक मासूम बच्चा नौकर का काम करता देखा, पूछने पर उसने बताया कि उसकी तनख्वाह से घर पर उसकी माँ उसके 6 साल व 3 साल के भाइयों को पालती है। अगले साल उसका भाई भी उसके साथ आकर काम करने लगेगा। ये हाल है गरीबों के हितों के बारे में राजनीति करने वालों का। बड़े बडे सरकारी अफसर भी छोटे बच्चों को घरेलू नौकर बनाकर रखने से नही चूकते।

सबसे ज्यादा खौफनाक व्यापार है बच्चों के अंगों के व्यापार का। ये धंधा इतने ऊंचे पैमाने पर चलता है कि कल्पना नही की जा सकती। सोने की खान है ये धंधा!! जहाँ एक मासूम शरीर के अंगों को इसी प्रकार बेचा जाता है जैसे बकरे के शरीर के अंगों को।

हम गौ माता के लिए, पक्षियों के लिए, वृक्षों के लिए, पर्यायवरण के लिए इतनी लड़ाई लड़ रहे हैं किंतु जीते जागते इंसानों को बिकने से नही रोक पा रहे?

जिस प्रकार हमारे भाइयों की सतर्क आंखे गौ माता का व्यापार करने वाले निकृष्ट लोगों को भांप लेती हैं यदि उसी प्रकार मासूम बच्चों का व्यापार करने वाले राक्षसों को भी वो पकड़ने लगें तो शायद सारी मानवता उनकी ऋणी हो जायेगी।

यदि हम गौ माता की सुरक्षा के लिए गौ रक्षकों की टीम बना सकते हैं तो हमारे ही देश के मासूम बच्चों की रक्षा के लिए बाल रक्षकों की टीम क्यों नही बना सकते?

ये एक ऐसा क्षेत्र है जहां कानून पूर्णतया कारगर नही हो पाया क्योंकी ऐसे केसों की जानकारी नही हो पाती। जब तब सामाजिक रूप से चेतना नही आएगी तब तक समस्या से निबटना मुश्किल हैं।

सबसे पहले हमें भीख देने की वृत्ति से मुक्ति पानी होगी। जब लोग भीख देना बंद कर देंगे तो इन बच्चों को भीख मांगने के लिए इस्तेमाल होना बंद हो जाएगा।

यदि अपने आस पास किसी बच्चे को घर या दुकान में काम करता देखें तो संबंधित विभाग में गुमनाम शिकायत भेजें।

यदि कहीं कोई डरा सहमा बच्चा संदिग्ध अवस्था मे दिखे तो तुरंत पुलिस को खबर करें।

देवदासी जैसी प्रथा भी सती प्रथा व बाल विवाह जैसी अमानवीय है इसका सामाजिक बहिष्कार करना होगा

ये वही भारत है जहां लोग कहते हैं कि

* बच्चों में भगवान बसता है*

लेकिन इन्ही बच्चों में जिनके अंदर भी भगवान बसता है उनसे हम घरों में झाड़ू पोछा कराते हैं, होटलों में झूठे बर्तन मंजवाते हैं, उनसे भीख मंगवातें हैं, उनसे वेश्या वृति कराते हैं, उन्हें अपराधी बनाते हैं, आतंकवादी बनाते हैं, उनके शरीर के अंग बेचते हैं ,उनपर अत्याचार करते हैं।

और सोचते हैं हम पाप के भागी नही!!

भगवान सिर्फ मंदिरों में ही नही इंसानों में भी बसते हैं इंसानो में बैठे भगवान को भी पूजिये,उससे प्यार करिये।

जिस देश मे बच्चे सुरक्षित हों उस ही देश का भविष्य भी सुरक्षित होता है।

Living life the right way

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एक बार एक राजा ने अपने तीन ख़ास मंत्रियों को बुला एक एक थैला दिया और उन्हें वन में से फलों को भर कर लाने को कहा।

पहले मंत्री ने सोचा कि राजा को अच्छे व ताज़े फल पाकर खुशी होगी सो उसने चुन चुनकर ताज़े व बढ़िया फलों से थैला भर लिया।

दूसरे मंत्री ने सोचा राजा को इतनी व्यस्तता में कहां इतनी फुरसत होगी कि वो थैले के फलों को एक एक कर देखेगा। सो उसने अच्छा ,बुरा जो फल पाया थैले में भर लिया।

तीसरे मंत्री ने सोचा कि राजा सिर्फ यही तो देखेगा कि किसका थैला बड़ा है, इसलिये उसने अपने थैले में कूड़ा करकट व पत्थर भर लिए।

तीनो दरबार मे पहुंचे।

लेकिन ये क्या??

राजा ने बिना कुछ देखे तीनों को कारागार में डालने की आज्ञा दे दी और कहा अगले एक महीने तक जो कुछ उन्होंने अपने थैले में जमा किया है उससे अपना पेट भरें।

पहले मंत्री ने आराम से महीना गुजार लिया।
दूसरे मंत्री ने कुछ दिन अच्छे फल खाये फिर सडे फल खाकर किसी तरह जीवन बचाया।
तीसरे मंत्री के पास जीवन बचाने के लिए कुछ नही था। कूड़ा व पत्थर खाने से जीवन कैसे बचता?

जीवन के आखरी चरणों मे जो शुरुआती समय में जमा करते हैं वही काम आता है।

प्रत्यक्ष में जब हम दूसरों के जीवन,सफलता व सम्पन्नता से रश्क करते है तो ये नही जानते कि उनके अंत से ही उनके जीवन मे किये गए कर्मों का अंदाज़ा हो जाता है….

वरना कोई महात्मा क्यों किसीकी गोली से मरता?

क्यों दुनिया पर राज करनेवाले अपने ही अंगरक्षकों की गोली से छलनी होते?

क्यों दूसरों के मुँह से निवाला छीनने वाले आखरी क्षणों में नलियों के सहारे जीने की कोशिश करते हैं ?

क्यों दूसरों के बेटों के हाथों में बंदूम देनेवालों के बेटे उनके ही घरों को आग लगा देते हैं?

क्यों नारी जाति को वस्तु की तरह इस्तेमाल करने वाले किसी औरत की ही वजह से जेल की सलाखों के पीछे सड़ते हैं?

क्यों नोटों के बिस्तर पर सोने वाले मृत्यु को उन्ही नोटों से नही खरीद पाते?

क्यों ईमान बेचने वालों को उन्ही का कोई विश्वासपात्र चन्द रुपयों के लिए धोखा देता है?

भीष्म पितामह को भी गलत पक्ष का साथ देने की सज़ा तीरों की शैया पर लेटकर भुगतनी पड़ी।

सदाचारी युधिष्टर की एक गलती ने उनकी पत्नी व भाइयों को अपमान की स्थिति में पहुंचा दिया!

जो कमाई जीवन के पहले हिस्से में जोड़ेंगे वही बाद के हिस्से में खर्च करने को मिलेगी।

ना अकूत पैसा ना बेशुमार ताक़त आपके अच्छे जीवन की गारंटी दे सकती है।

कोई गलत रास्ता आपको सही मंज़िल तक नही पहुंचा सकता।

ज़रा सोच के जोड़ना!!

क्योंकि जो जोड़ रहे हो बाद में उसी से काम चलाना पड़ेगा

Smog

दिल्ली वालों की आँख जल्दी से नहीं खुलती। कभी डेंगू ,कभी चिकनगुनिया, और आज ये आलम है क़ि धुंए व प्रदूषण से उठने वाला कोहरा जानलेवा साबित हो रहा है।

इन सबकी वजह प्रकृति के साथ हो रहा खिलवाड़ है। सीमेंट के जंगल बनाने के चक्कर मे पेड़ों के जंगल काट दिये। ज़मीन में उगने वाले वृक्षों का स्थान गमलों में उगने वाले फूलों, व बोन्साई ने ले लिया।

दक्षिण दिल्ली के अमीर रिहायशी घरों में जहां 10 AC चलते हैं प्राकृतिक हवा की इंच भर भी गुंजाइश नही है।

दिल्ली को प्रदूषण नही लालच मार रहा है। 150वर्ग ग़ज़ के टुकड़े पर भी बहुतल्ला इमारत बन जाती है। तीन पुश्त पहले जो बड़े बड़े घर होते थे आज संतानों ने पैसे के लालच में बिल्डरों को बेच दिया और एक एक फ्लैट लेकर जमीन के टुकड़े कर दिए।

घर छोटे होते गये और गाडियाँ बड़ी होती गई। बाबुजी के घर की जगह 3BHK ने ले ली। कपड़े बालकनी की रेल में सूखने लगे और तुलसी खिड़की में। जहां बच्चे आंगन में खेलते थे वो अब बन्द कमरे में वीडियो खेलते हैं।

एक बड़ी अम्बेसेडर गाड़ी में सारा कुनबा घूम लेता था अब हर सदस्य को गाड़ी चाहिये। धूप व आसमान के दर्शन अब खिड़कियों से भी नही होते!!!

हवा बस पार्क व शहर के बाहर मिलती है। अब हंसी के लिए भी पार्क में इकट्ठा होकर बिना मतलब हां हा करना रह गया है।

ऊंची छतों वाले दफ्तरों की जगह कॉर्पोरेट बिल्डिंग में दड़बों में बन्द कबूतर जैसे लोगों ने ले ली। बस टकटकी बांध कंप्यूटर पर झुके रहते हैं।

बिल्डिंग में लिफ्ट इस्तेमाल करते हैं और gym में सीढी वाले स्टेपर पर सीढ़ी चढ़ते हैं। घर से बाहर कदम रखने के लिए गाड़ी चाहिये और gym में 3000 रु महीना देंकर साईकल चलाते हैं। सामान ट्राली में ढोते हैं और gym में 50 किलो का बेंचप्रेस करते हैं।

पीने को पानी बोतल मे लेकिन हर बिल्डिंग की छत पर स्विमिंग पूल होते हैं।

अब भाई इसकी कोई तो कीमत दिल्ली वालों को देनी पड़ेगी। सरकार कोई भी आ जाये क्या दिल्ली वाले गाडियाँ छोड़कर साईकल चलाएंगे? क्या घरों को तोड़कर बिल्डिंगे बनाना बंद करेंगे? क्या पार्किंग की जगह से गाड़ियां हटाकर पेड़ लगाएंगे? क्या मॉल्स को हटाकर शहर से बाहर करेंगे?

Odd-even is not God given .. कोई भी सरकार जादू का डंडा घुमाकर प्रदूषण दूर नही कर सकती!!प्रदूषण लोग करते है सड़कों पर गाड़ियां बढ़ाकर, छोटी जगहों में जरूरत से ज्यादा इंसान ठूँसकर!! गगनचुम्बी इमारतें बढ़ाकर!!

यूरोप के बहुत से देशों में लोग सूट टाई पहनकर साईकल से दफ्तर जाते हैँ। मेट्रो व पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं। प्लास्टिक व कचरे पर रोक रखते हैं।

खाड़ी देशों में जहां निरा रेगिस्तान है हज़ारों पेड़ रोज़ लगाये जा रहे हैं। पानी खर्च करने पर महंगा बिल देना पड़ता है। पानी भी बिजली की तरह ही महंगा है। महंगी पार्किंग हैं। drip irrigation के द्वारा sewage का सारा पानी सारे देश के में पेड़ लगाने के काम आता है और उसका पैसा भी नागरिक देते हैं।

हर समस्या को सरकार के माथे पर ठोकने वाले भारतीय खुद वातावरण को सुधारने में कितना योगदान देते हैं?

यदि समय रहते ना चेते तो दिल्ली वाली समस्या सभी बड़े शहरों में पनपेगी। हवा से बीमारी,पानी से बीमारी, कचरे से बीमारी फैलेगी।

आज पानी बोतल में बिक रहा है कल हवा थैलियों में बिकेगी।

समस्या की जड़ ज़रूरत से ज्यादा उपलब्धी है।

भारत मे गाड़ियों का पंजीकरण 10 साल पर होता है सब हर साल अनिवार्य कर देना चाहिए। यानी हर साल गाड़ी के रजिस्ट्रेशन के पहले टेस्टिंग होनी चाहिये।

बिजली की तरह पानी का भी मीटर होना चाहिये।इससे पानी की बर्बादी पर रोक लगेगी।

हर नागरिक के लिए साल में 100 घण्टे पर्यावरण व कम्युनिटी सर्विस के लिए अनिवार्य कर देने चाहिये वरना उसे दी जाने वाली सुविधाएँ बन्द कर दी जाएं।

गाड़ियों पर टैक्स बढ़ा कर टैक्सी,ट्रेन, रिकशा व मेट्रो सस्ती कर दी जानी चाहिये।

Incentive point system को बढ़ाना चाहिये। यदि कोई नागरिक सिर्फ मेट्रो व पब्लिक ट्रांसपॉर्ट का इस्तेमाल करता है तो उसे एक महीने के फ़्री पास देने चाहिये।

100 से ज्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों को कंपनी ट्रासपोर्ट से ही कर्मचारियों को यात्रा करानी चाहियें।

पार्किंग की फीस बढ़ा देनी चाहिये।

2 से ज्यादा गाड़ी रखने वालों पर luxary tax लगाना चाहिये।

बहुत से लोगों को मेरी इन बातों से बुरा लग रहा होगा किन्तु कड़े उपायों के सिवाय कोई चारा नही है। 123 करोड़ की जनसंख्या यदि अपने वातावरण का ध्यान स्वयं रखने लगे और अपनी ज़िम्मेदारियाँ समझने लगे तो हम दुनिया के बादशाह हो जायेंगे।

ये धुआँ हमारी जली हुई सोच का है और अगर सोच नही बदली तो ये सबको निगल जाएगा।

Be a true indian and true human

Valmiki Or Hanumaan

जब वाल्मीकि जी ने अपनी रामायण पूरी की नारद जी को दिखाने के लिये ले गये। नारद जी उससे बहुत प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने कहा, ‘तुमने अच्छा तो लिखा है, लेकिन हनुमान की रामायण तुम्हारी रामायण से कहीं सुंदर है’।

‘हनुमान जी ने भी रामायण भी लिखा है!’, वाल्मीकि जी को ये जानकर चकित हो गये, और यह सोचकर कि हनुमान जी की रामायण किस प्रकार उनकी रामायण से बेहतर है,जानने हेतु वो हनुमान जी की लिखी रामायण को ढूँढ़ने लगे!

कदली-वन के एक झुरमुट में ढूँढते हुए , उन्होंने पाया कि हनुमान जी ने अपनी रामायण को केले के पेड़ के सात व्यापक पत्तों पर अंकित किया था।

उसने इसे पढ़ा और पाया की व्याकरण और शब्दावली, रचना और माधुर्य की दृष्टी से हनुमान जी द्वारा लिखित रामायण उनकी रचना से कहीं ज्यादा सुंदर थी और उसे पढ़ते पढ़ते वो रोने लगे।

‘क्या मेरी रामायण इतनी बुरी है?’ हनुमान जी ने पूछा

वाल्मीकि ने कहा, ‘नहीं, यह बहुत उत्तम है!”

‘तो आप रो क्यों रहे हैं मुनिवर ?’ हनुमान जी ने पूछा

‘क्योंकि आपकी रामायण पढ़ने के बाद कोई भी मेरी रामायण पढ़ना नहीं चाहेगा,’ वाल्मीकि जी ने उत्तर दिया।

सुनते ही हनुमान जी ने सात केले के पत्तों को तोड़ दिया, “अब कोई भी हनुमान की रामायण को नहीं पढ़ेगा।”

हनुमान जी ने कहा, ‘मुनिवर आपको अपनी रामायण की ज़रूरत मेरी लिखी रामायण से कहीं अधिक है आपने रामायण लिखी है ताकि दुनिया वाल्मीकि को याद रखे; मैंने अपना रामायण लिखा था ताकि मैं राम याद रख सकूं। ‘

ठीक उसी पल में वाल्मिकी को एहसास हुआ कि वो उन्होंने रामायण स्वयं को स्थापित करने के लिए लिखी और वो अपनी रचना के माध्यम से प्रसिद्ध होना चाहते थे।

उन्होंने रामायण की रचना अपने विचारों को सत्यापित करने के लिए की।ना कि राम के प्रति प्रेम के लिये। उन्होंने रामायण लिखी जिस्से उनका नाम अमर हो जाये ना कि राम के प्रेम व भक्ति में सरोबार होकर ।वाल्मिकी ने रामायण लिखकर अपने लेखन को सिद्ध किया

और हनुमान!! रामजी उनका जीवन थे और रामायण उनकी भक्ति थी।

वाल्मिकी की रामायण उनकी महत्वाकांक्षा का एक उत्पाद था; लेकिन हनुमान जी की रामायण उनके राम के प्रति स्नेह का एक उत्पाद था।

यही कारण है कि हनुमान जी की रामायण वाल्मिकी की रामायण से कहीं ऊपर थी । क्योकि “राम से बड़ा … राम का नाम है!”

आज भी हमारे समाज मे हनुमान जैसे लोग हैं जो प्रसिद्ध नहीं बनना चाहते हैं वो निरंतर बिना कामना के अपना कर्म करते रहते हैं और अपने उद्देश्य को पूरा करते हैं।

जीवन मे जो लोग आपकी सफलता के हिस्सेदार हैं उनके कंधों पर पैर रखकर सीढ़ी ना चढ़ें।

आज के युग मे काम से ज्यादा काम का ढिंढोरा है। हर इंसान ये सिद्ध करने में लगा है कि वो दूसरे से बेहतर है।

बहुत से ऐसे प्रोग्रामों में जाती हूँ जहां ये दिखाने की गलाकाट प्रतियोगिता चलती रहती है कि जैसे सारे आयोजन मंच पर बैठे लोगों ने ही किया है।

जो व्यक्ति भाषण लिखकर देता है उसके शब्द ही वक्ता को तालियां दिलवाते हैं।लेकिन एक बार भी बोलने वाला भरी सभा मे उस गुमनाम लेखक का नाम नही लेता।

जीवन के हर क्षेत्र में होड़ लगी है है कि किस प्रकार अपने को बेहतर सिद्ध कर सकें। उत्पाद से ज्यादा उसकी पैकेजिंग पर तमाम ज़ोर रहता है। एक संकीर्ण सी मानसिकता चहूं ओर व्यपात है।

हमे वाल्मीकि की तरह नहीं बनना जो सिर्फ ये समझते रहें कि हमारी “रामायण” ही उत्कृष्ट है।

हमारे जीवन में बहुत सारे “हनुमान” भी हैं …

बहुत से ऐसे लोग हैं जो चुपचाप अपना काम कर रहें हैं ..बिना हेडलाइंस बने। जरूरी नही किसी नेता या VIP के साथ सेल्फी या अखबार में छप जाने से आपकी अहमियत बढ़ गई है।

याद रहे प्रसिद्धि की चाह से रामायण लिखने वाले वाल्मिकी सिर्फ पन्नों पर छपते हैं ..और राम की निष्काम सेवा करने वाले हनुमान घर घर मे पूजते हैं।

Babawaad

पिछले कुछ दिनों से एक के बाद एक बाबाओं का खुलासा हो रहा है। कभी आशाराम,कभी रामरहीम ,कभी फलाहारी और ना जाने कौन कौन !!

लेकिन यहां मैँ इन बाबाओं के कुत्सित कर्मों के बारे में बात नही कर रही। बाबाओं के काले किस्सों से अखबार व TV चँनेल्स रंगे पड़े हैं लेकिन सवाल ये उठता है की ये किस्से बनते कैसे हैं।

यदि विश्लेषण किया जाये तो हर बाबा के किस्से में कोई भी केस ब्लात्कार व शोषण की घटना के तुरंत बाद दर्ज नही हुआ। तकरीबन सारे ही केस हादसों के कुछ समय बाद सामने आये।

आज जब छेड़छाड़ व बलात्कार के शोषित तुरंत कानून की सहायता लेते हैं ब कानून भी अब पूरी तरह से शोषितों की मदद करता है तो इन मामलों में पुलिस में रिपोर्ट बाद में क्यों की जाती है।ज़ाहिर है ये बाबा बहुत ऊपर तक पहुंच रखते है ,नेता से लेकर मंत्री और पूंजीपति से लेकर कानून के रखवाले तक इनके दरबार मे हाजिरी भरते हैं।

अगर ये मान लिया जाए की बाबाओं की पहुंच ऊपर तक है और पीड़ित उनके भय से कानून की शरण लेने से डरते हैं तो फिर किस मोड़ पर वो ये निर्णय करते हैं की अब ये मामला खुले में आना है?

सभी बाबाओं के किस्सों में एक समानता तो है कि :

¶हर पीड़िता अपनी मर्ज़ी से उनके आश्रम में गई।
¶हर एक पीड़िता बाबा को पहले से जानती थी।
¶ हर पीड़िता का परिवार बाबा का भक्त होता है।
¶हर पीड़िता व उसके परिवार को बाबा पर अन्धभरोसा होता है।
¶हर पीड़िता हादसे से पहले भी बाबा के निकट संपर्क में रही हैं।
¶करीब सभी मामलों में पीड़ित के साथ मारपीट, प्रताड़ना या अन्य तरह का शारीरिक उत्पीड़न नही हुए।
¶सभी मामलों में पीड़ित के परिवार वालों ने इस मामलों को शुरू में ही report करने की ज़रूरत नही समझी?

यहाँ सभी को एक बात पर गहराई से ध्यान देना होगा कि महिलाओं को इश्वेर ने कुदरती रूप से ये समझने की ताक़त दी है कि वो जान जाती हैं की किसकी नज़र खराब है,कौनसी हरकत गलत है , गलत तरह से छुआ जाना,या कोई अश्लील इशारे करना।ये सब आभास महिलाएं छोटी उम्र से ही समझ जाती हैं।

एक औरत होने के नाते मैं जानती हूँ की महिलाओं में गलत नीयत को जानने की शक्ति पुरुषों से कहीं ज्यादा होती है।

लेकिन इन सभी किस्सों में ये महिलाएं शुरू में ही इन इशारों को समझ कर सतर्क क्यों नही होती?

इन बलात्कारों में आरोपी बाबा उन्हें सड़क से उठा कर किसी सुनसान जगह में ले जाकर बलात्कार नही करता अपितु ये महिलाएं ये जानते हुए भी की किसी भी पुरुष के पास इस प्रकार से एकांत में रहने पर खतरा हो सकता है फिर भी जाती हैं? क्यों?

जो घरवाले उन्हें किसी लड़के के साथ बात करते देखकर भड़क जाते है क्यो अपने परिवार की स्त्रियो को पराये पुरुष के पास इस प्रकार भेजते हैं?

जो जवान लड़कियाँ इन बाबाओं का शिकार होती हैं क्या उनकी माएँ इसे आभास नही कर पाती की किस प्रकार किसी पुरुष के पास अपनी जवान बेटी को भेजने में खतरा हो सकता है?

क्यों ऐसे समयों में परिवार की कोई अन्य स्त्री या पुरुष पीड़ित के साथ नही होती?

जहाँ बाबा गलत है वहाँ भक्त भी कुछ कम गलत नहीं!

ये वो भक्त हैं जो असलियत जानकर भी अनदेखा करते हैं कुछ पाने की लालसा में कुछ खोना भी पड़ेग ये उस बात को क्यों नही समझते ?

दरअसल इन मामलों की पीड़िता कहीं ना कहीं बाबा से प्रभावित होती हैं या फिर बाबा के पास अपनी किसी इच्छा की पूर्ती या निज स्वार्थ से जाती हैं।

यदि पीड़ित को बाबा कोई नौकरी दिलाता है ,या बाबा उनहे रुपिया पैसा देता है,व्यपार में पैसा देता है,जमीन जायदाद दिलवाता है,कार्य सिद्दी के लिए influential लोगों से जिनमे धनाढ्य व्यपारी से लेकर आला दर्जे के अधिकारी व राजनैतिक व्यक्ति होते हैं, उनसे पीड़ित का संपर्क कराता है, तो फिर पीड़ित को ये बात जान लेनी चाहिये की प्रतिफल में कुछ माँगा जायेगा।

बाबाओं की पावर इतनी होती है कि हनीप्रीत जैसी लड़की अपने पति को छोड़कर अधेड़ उम्र के थुलथुल भांड जैसे बाबा की सरपरस्ती में चली जाती है? वो इन बाबाओं के साथ क्यों संपर्क बनाती हैं? मतलब साफ है पैसा व पावर!!

लोग समझते हैं कि वो बाबा की शरण से सबकुछ फ्री में पा लेंगे।
Nothing is free in life, Everything has a price

बाबा अपनी कृपा की कीमत वसूलते हैं। यदि बाबा किसी जवान औरत पर उपकार करता है तो जानता है की उसे बदले में क्या चाहिये!! जानती ये औरतें भी हैं कि बाबा की उनपर नज़र है किंतु वो सोचती हैं काम निकल जाए फिर देखेँगे।

वो पहली बार शायद बाबा का विरोध नही करती लेकिन बाद में नही चाहती कि उसकी पुनरावृति हो इस डर से या मानसिक यातना से टूट कर वो कानून की शरण लेती हैं।

यदि कोई महिला किसी काम को निकलवाने किसी पुरुष के पास जाती है तो उसे इस बात का अहसास ज़रूर होता है कि सामने बैठा पुरुष बदले में क्या चाहता है लेकिन चाहे वो पारिवारिक मजबूरी हो या आर्थिक मज़बूरी हो या महत्वकांशा कहीं ना कहीं वो महिला झुकती ज़रूर है ,इस प्रकार के बने संबंधों में पुरुष अपने द्वारा दी गई सहायता या उपकार का बदला वसूलते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या महिला स्वयं अपने को इन स्थितियों में ले जाने के लिए किस हद तक तैयार होती है?

वो परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने के लिए तो मजबूरी वश इन संबंधों के लिए तैयार हो जाती है लेकिन वो मानसिक रूप से अपने आप को इसके लिए तैयार नही कर पाती। बाद में अंतर्द्वंद के चलते वो इन घटनाओं को उजागर करने को तैयार हो जाती है।

कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में एक प्रसिद्ध धर्मगुरु की शिष्या को ज्यों ही इस बात का अहसास हुआ की स्पेशल सेवा का मतलब क्या होता है और क्यों बाबाजी स्त्रियों को कमरे में बुलाते है उसने तुरंत पुलिस को सूचित कर दिया,लेकिन सवाल ये है उससे पहले जिन महिलाओं के साथ वो सबकुछ हुआ उसे वो जानकर भी अन्य महिलाओं को सतर्क क्यों नही करती। क्यों एक महिला दूसरी महिला की रक्षा के लिए आगे नही आती?

यौन शोषण भी एक प्रकार की रिश्वत ही है, यदि कोई फ़ेवर पुरुष को दिया जाए यो कीमत रुपये में वसूली जाती है और यही फ़ेवर महिला को दिया जाये तो कीमत शारीरिक संबंध के रूप में भी मांगी जा सकती है।

रिश्वत इसलिये ली जाती है क्योंकी हम अपना काम निकालने के लिए वो कीमत देने को तैयार हैं, यौन शोषण तब होता है जब आपका उद्देश्य, होने वाले शोषण से आपके लिए कहीं ज्यादा कीमत रखता है।

आज स्थिति इतनी खराब है महिलाओं को चरित्र हनन के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है ।यदि राजनीती में प्रतिद्वंदी को रास्ते से हटाना हो तो किसी महिला को छदम रूप में विरोधी के यहां भेज दो, वो महिला बाद में किसी प्रकार के आपतिजनक फ़ोटो व वीडियो बना कर मीडिया व सोशल मीडिया में उसे छपवा देगी। scandal बनेगा और विरोधी खत्म!!

सवाल ये है कि हम महिलाएँ कहीं ना कहीं स्वयं ही ऐसी स्थितियां पैदा कर रही है जिससे यौन शोषण जैसी घटनाएं कम होने की जगह बढ़ रही हैं ।कुछ महिलाएं थोड़े में सब्र करने को तैयार नही। महत्वकांशाएँ निरंतर बढ़ रही है।

यदि महिलाएँ इन situational compromises को छोड़कर यौग्यता बढाने पर ध्यान दें एक मजबूत चरित्र को लेकर चलें तो महिलाओं की स्थिति सम्मानजनक बनेगी। महिलाएं अपने को टूल बनने से रोकें।

यदि इच्छापूर्ती या महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए आप किसी बाबा,नेता,अधिकारी या महत्वपूर्ण व्यक्ति से सम्बंध बनाने को तैयार हैं तो आप समाज मे महिलाओं के सम्मान को गिराने की ज़िम्मेदार है जिसका नुकसान सभी स्त्रीजाति को होगा।

I request all my women fellow citizens to live life with dignity and do not use short cuts.

Happy Mother-In-Law Day

आप सोच रहे होंगे कि ये दिन तो कभी सुना ही नही!!

आज मेरी *सास*का श्राद्ध था।सभी रीतिरिवाज करने के बाद भी ऐसा नही लग रहा था कि वो हमारे साथ नही हैं। मैँ हर पल उन्हें परिवार में महसूस करती हूँ। उनका मार्गदर्शन आज भी हमे मिलता है।

आज मैं जो कुछ भी हूँ उसमे एक बड़ा योगदान उनका भी है। उनसे इतना कुछ सीखने को मिला की लगा कि जीवन मे वो बहुत काम आ रहा है। उन्होंने सीखाया कि परिस्तिथियों से कैसे लड़कर आगे बढ़ा जाता है। किस प्रकार परिवार को जोड़कर रखा जाता है।
कर्मठ बनो क्योंकी काम करने से कोई नही मरता। मुझे निर्भीक बनाया। किसी भी कठिन परिस्थिति में वो सम्बल देती थीं। उनका छोटा सा कथन”घबराओ नही,सब ठीक हो जाएगा” सुनती थी तो लगता था वाकई सब ठीक हो जाता है।

मुझसे बहुत सारी गलतियां भी होती थी लेकिब उनमे बहुत धैर्य था वो मेरे समझने का इंतज़ार कर लेती थी। सबसे बड़ी चीज जो सीखी स्वाभिमान व संतोष , शायद इसलिये कभी घर मे “अपना पराया” व “तेरा मेरा” नही हुआ। कभी किसी से ईर्ष्या नही हुई।

भारतीय संस्कृति में एक स्त्री को 2 बार जन्म होता है । एक तो जब वह एक बेटी के रूप में किसी के घर जन्मती है और दूसरा जब वह किसी के घर मे बहु के रूप में आती है।

जन्म देने वाली माँ जीवन के आरंभिक वर्षों में उसका पालन पोषण करके उसे एक ज़िम्मेदार वयस्क बनाती है लेकिन विवाह के बाद सास रूपी माता उसे एक परिवार को संभालने की दीक्षा देती है जो अगली 2 से 3 पीढी तक उसके काम आता है। सास ही सिखाती है इतने रिश्तों के बीच कैसे तालमेल बिठा कर परिवार को एकसाथ लेकर चलते हैं।

वो हमें अपना वो बेटा सौंप देती हैं जिसे उन्होंने अपनी छाती के नीचे रखकर पाला था। और एक सास कैसा महसूस करती है वो हमें तब पता चलता है जब हम स्वयं माँ बनते हैं।

पता नही क्यों हमारे समाज मे सास शब्द को एक उपहासिक पद के रूप में समझा जाता है। ज्यादातर कहानी किस्सों में ,TV सीरियल में ,फिल्मों में सास को एक खलनायिका के रूप में प्रस्तूत किया जाता है। जबकि वो भी किसी की माँ भी होती है, वो स्वयं भी सास बहू वाले रिश्ते से निकलकर आई होती है। आपके पति को उन्होंने 9 महीने पेट मे रखा व अपना दूध पिलाकर बड़ा किया।

सारे संस्कार माँ बाप ही नही देंकर भेजते ,बहुत से संस्कार ससुराल से भी सीखे जाते हैं। जो स्त्रियाँ ससुराल रूपी गंगा में डुबकी लगा लेती हैं वो अपने वैवाहिक जीवन मे ज्यादा सफल होती है।

कोई भी रिश्ता अपने आप सफल नही हो सकता, उसे सफल बनाना पड़ता है। रिश्तों को मजबूत करने के लिये उनमे निस्वार्थ प्रेम ,आदर व उदारता की सीमेंट डालनी पड़ती हैं । जिनके घर की दीवारें मजबूत होती हैं उनमें बाहर वाले सेंध नही लगा सकते।

यदि बहु अपने को सास की जगह रखकर सोचे और सास स्वयं को बहु की जगह रखकर सोचे तो सबकुछ साफ साफ समझ आ जायेगा ।

सभी विवाहित बहने से कहूँगी
“रिश्तों को ढोईये मत ,रिश्तों को जीना सीखिये”
ससुराल *जेल*नही *जीवन* है।