Happy Mother-In-Law Day

आप सोच रहे होंगे कि ये दिन तो कभी सुना ही नही!!

आज मेरी *सास*का श्राद्ध था।सभी रीतिरिवाज करने के बाद भी ऐसा नही लग रहा था कि वो हमारे साथ नही हैं। मैँ हर पल उन्हें परिवार में महसूस करती हूँ। उनका मार्गदर्शन आज भी हमे मिलता है।

आज मैं जो कुछ भी हूँ उसमे एक बड़ा योगदान उनका भी है। उनसे इतना कुछ सीखने को मिला की लगा कि जीवन मे वो बहुत काम आ रहा है। उन्होंने सीखाया कि परिस्तिथियों से कैसे लड़कर आगे बढ़ा जाता है। किस प्रकार परिवार को जोड़कर रखा जाता है।
कर्मठ बनो क्योंकी काम करने से कोई नही मरता। मुझे निर्भीक बनाया। किसी भी कठिन परिस्थिति में वो सम्बल देती थीं। उनका छोटा सा कथन”घबराओ नही,सब ठीक हो जाएगा” सुनती थी तो लगता था वाकई सब ठीक हो जाता है।

मुझसे बहुत सारी गलतियां भी होती थी लेकिब उनमे बहुत धैर्य था वो मेरे समझने का इंतज़ार कर लेती थी। सबसे बड़ी चीज जो सीखी स्वाभिमान व संतोष , शायद इसलिये कभी घर मे “अपना पराया” व “तेरा मेरा” नही हुआ। कभी किसी से ईर्ष्या नही हुई।

भारतीय संस्कृति में एक स्त्री को 2 बार जन्म होता है । एक तो जब वह एक बेटी के रूप में किसी के घर जन्मती है और दूसरा जब वह किसी के घर मे बहु के रूप में आती है।

जन्म देने वाली माँ जीवन के आरंभिक वर्षों में उसका पालन पोषण करके उसे एक ज़िम्मेदार वयस्क बनाती है लेकिन विवाह के बाद सास रूपी माता उसे एक परिवार को संभालने की दीक्षा देती है जो अगली 2 से 3 पीढी तक उसके काम आता है। सास ही सिखाती है इतने रिश्तों के बीच कैसे तालमेल बिठा कर परिवार को एकसाथ लेकर चलते हैं।

वो हमें अपना वो बेटा सौंप देती हैं जिसे उन्होंने अपनी छाती के नीचे रखकर पाला था। और एक सास कैसा महसूस करती है वो हमें तब पता चलता है जब हम स्वयं माँ बनते हैं।

पता नही क्यों हमारे समाज मे सास शब्द को एक उपहासिक पद के रूप में समझा जाता है। ज्यादातर कहानी किस्सों में ,TV सीरियल में ,फिल्मों में सास को एक खलनायिका के रूप में प्रस्तूत किया जाता है। जबकि वो भी किसी की माँ भी होती है, वो स्वयं भी सास बहू वाले रिश्ते से निकलकर आई होती है। आपके पति को उन्होंने 9 महीने पेट मे रखा व अपना दूध पिलाकर बड़ा किया।

सारे संस्कार माँ बाप ही नही देंकर भेजते ,बहुत से संस्कार ससुराल से भी सीखे जाते हैं। जो स्त्रियाँ ससुराल रूपी गंगा में डुबकी लगा लेती हैं वो अपने वैवाहिक जीवन मे ज्यादा सफल होती है।

कोई भी रिश्ता अपने आप सफल नही हो सकता, उसे सफल बनाना पड़ता है। रिश्तों को मजबूत करने के लिये उनमे निस्वार्थ प्रेम ,आदर व उदारता की सीमेंट डालनी पड़ती हैं । जिनके घर की दीवारें मजबूत होती हैं उनमें बाहर वाले सेंध नही लगा सकते।

यदि बहु अपने को सास की जगह रखकर सोचे और सास स्वयं को बहु की जगह रखकर सोचे तो सबकुछ साफ साफ समझ आ जायेगा ।

सभी विवाहित बहने से कहूँगी
“रिश्तों को ढोईये मत ,रिश्तों को जीना सीखिये”
ससुराल *जेल*नही *जीवन* है।

Care When They Are Here

पार्किन में गाड़ी में बैठी मैं कुछ पढ़ रही थी तभी खिड़की पर आहट हुई,बाहर एक वृद्ध महिला एक कपड़ा लिए गाड़ी का शीशा पोंछ रही थी।

शक्ल से वो किसी ठीक ठाक घर की लग रही थी।मैंने कहा “अम्मा ये उम्र तुम्हारी काम करने की नही घर बैठ कर सेवा कराने की है”उन्होंने बताया की घर मे बेटा, बहु पोते सभी हैं किंतु सवेरे ही वो उसे घर से निकाल देते हैं, कि मांग कर दिनभर गुज़ारा करे,आत्मसम्मान की वजह से वो भीख नही मांग पाती तो गाड़ी के शीशे पोंछ 2-4 रु कमाने की कोशिश करती है। मैंने उन्हें सम्मान से पास वाले ठेले से चाय पिलाई व समोसा खिलाया। उस माँ के काँपते हाथों में कप देखकर मैं सोच रही थी ये वही बेटा होगा जिसे इसने हर तकलीफ से बचा कर पाला होगा और आज वो इसे एक रोटी नही दे रहा।

ये कोई एक कहानी नही,बहुत सी ऐसी घटनाओं को देखा। समाज के सम्मानित सेवा निवृत्त बुजुर्गों तक का घोर अपमान व उपेक्षा हो रही है।जो आज भी हज़ारों रु पेंशन के घर मे दे रहे हैं और उनके बच्चे उन्हें टूटी कुर्सी की तरह घर के किसी कोने में रख देते हैं।

मेरी माताजी के कुछ पुराने सहयोगियों का हाल देखा। बुजुर्ग महिलाएँ घर का साग सब्जी रिक्शाओं पर व पैदल चलकर लाती है।
जबकि उनके बेटे बहु गाड़ियों में घूमते हैं। इस उम्र में भी वो सारे घर का खाना बनाती हैं। इन बुजुर्गों ने अपनी जीवन भर की कमाई से बेटों को आलीशान कोठियां बना कर दी और अब भी पोते पोतियों की ख्वाइश पूरी करते हैं लेकिन वही बेटा बहु उन्हें 2 रोटी भी इज़्ज़त से नही देते।

एक और बुजुर्ग दंपती हैं जिन्हें उन्ही के बेटे बहु ने घर से निकालकर एक कमरे में सिमट दिया है। उनकी बहू रसोई में घुस कर चाय भी नही बनाने देती मज़बूरन उन्हें टिफ़िन सर्विस लगानी पड़ी। दिल पर पत्थर रखकर उन्होंने अदालत की शरण ली।

अन्य बुजुर्ग महिला जिनकी टांग टूटी हुई है बैसाखी पर चलती हैं आलीशान कोठी के अपने कमरे को रात बन्द के सोती हैं क्योंकी बेटा रोज़ जान से मारने की धमकी देता है, सिर्फ इसलिए,कि वो अपनी पूरी पेंशन उसे नही देती।

एक और दंपती हैं जिनमे से एक को लकवा है और वो अपनी नित्य क्रियाओं तक को भी करने में असमर्थ हैं लेकिन घर का कोई सदस्य उनके कमरे तक मे नही आता। उनका दोनों का खाना भी कमरे के बाहर ही रख दिया जाता है।

ये सब देखकर मुझे ये लिखने पर मजबूर होना पड़ा ” जीते जी जिन्होंने माता पिता को एक रोटी चैन से नही दी उनके श्राद्ध में कुत्ते और कौवे को रोटी खिलाते हैं”

आज समाज मे कुछ बुजुर्गों की स्थिति बहुत दयनीय है ना तो उन्हें वो सम्मान मिल रहा है ना ही सेवा जिसके वो हक़दार हैं। ऐसे में कैसे उनके बच्चे उनका आशीर्वाद पा सकते हैं।

कोरे रिवाज़ों को निभाने से कर्तव्यों की इति नही हो जाती। रिश्तों का कर्ज ना तो दान देने से उतरता है ना ही पंडित को खाना खिलाने से।

माता पिता की आत्मा को उनके जीते जी प्रसन्न रखिये। उन्हें आपके थोड़े से सम्मान व थोड़ी सी सेवा की अपेक्षा है। उनकी इच्छाओं को जीते जी पूरा करिये।

कोई पंडित या जानवर आपके दिए भोजन को उनतक नही पहुंचा पायेगा यदि आपने जीते जी उन्हें कष्ट दिया होगा।

जीते जी उन्हें तीर्थ कराइए ,गंगा में प्रवाहित की अस्थियों से उनकी अतृप्त इच्छा नही पूरी होगी।

जीते जी उन्हें अच्छे व साफ कपड़े दीजिये मरणोपरांत दान दिये कपड़ों से उनकी आत्मा नही प्रसन्न होगी।

जीते जी उन्हें अच्छा भोजन कराइये वरना चाहे लाखो की दावत करिये उनकी आत्मा तो भूखी है दुनिया से गई होगी।

जीते जी समय निकाल कर उनके पास कुछ देर बैठिये। अपने बच्चों को बुजुर्गों से स्नेह करना सिखाइये वरना चाहे कितने कंबल दान करिये वो मुड़कर आपको आशीर्वाद देने नही आयेंगे।

जिन्हें माता पिता ,बाबा दादी व बुजुर्गों का आशीर्वाद नही मिलता वो चाहे कितनी दौलत कमा लें दुःख उनका पीछा नही छोड़ते।

सामाजिक रूढ़ियों से ज्यादा पारिवारिक कर्तव्य निभाइये और कोशिश करिये आपके माँ बाप जीते जी अपने सारे आशीर्वाद आपके लिए छोड़ जायें।

उनके छोड़े हुए धन व जायदाद से ज्यादा उनका छोड़ा हुआ आशीर्वाद आपके काम आयेगा।

Injustice or justice

महाभारत में कर्ण ने श्री कृष्ण से पूछा ” मेरी माँ ने मुझे जन्मते ही त्याग दिया ,क्या ये मेरा अपराध था की मैंने मेरी माँ की कोख से एक अवैध बच्चे के रूप में जन्म लिया?

दोर्णाचार्य ने मुझे शिक्षा देने से इनकार कर दिया क्योंकी वो मुझे क्षत्रिय नही मानते थे, क्या ये मेरा कसूर था?

परशुराम जी ने मुझे शिक्षा दी किन्तु ये श्राप भी दिया कि मैं अपनी विद्या भूल जाऊंगा क्योंकी वो मुझे क्षत्रिय समझते थे?

भूलवश एक गौ मेरे तीर के रास्ते मे आकर मर गयी और मुझे गौ वध का श्राप मिला?

द्रोपदी के स्वयंबर में मुझे अपमानित किया गया क्योंकि मुझे किसी राजघराने का कुलीन व्यक्ति नही समझा गया?

यहाँ तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे अपना पुत्र होने का सच अपने दूसरे पुत्रों की रक्षा के लिए स्वीकारा।

मुझे जो कुछ मिला दुर्योधन की दया स्वरूप मिला!
तो क्या ये गलत है की मैं दुर्योधन के प्रति अपनी वफादारी रखता हूँ?

श्री कृष्ण मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले:
कर्ण ,मेरा जन्म जेल में हुआ था!
मेरा पैदा होने से पहले मेरी मृत्यु मेरा इंतज़ार कर रही थी!
जिस रात मेरा जन्म हुआ उसी रात मुझे मेरे माता पिता से अलग होना पड़ा!
मेरा बचपन रथों की धमक,घोड़ों की हिनहिनाहट तीर कमानों के साये में गुज़रा!

मैन गायों को चराया व उनके गोबर को उठाया!
जब मैं चल भी नही पाता था तो मेरे ऊपर प्राणघातक हमले हुए!

कोई सेना नही,कोई शिक्षा नही,कोई गुरुकुल नही,कोई महल नही, मेरे मामा ने मुझे अपना सबसे बड़ा शत्रु समझा!

जब तुम सब अपने वीरता के लिए अपने गुरु व समाज के लिए प्रशंसा पाते थे उस समय मेरे पास शिक्षा भी नही थी। 16 वर्ष की उम्र में मुझे ऋषि सांदीपनि के आश्रम में जाने का अवसर मिला!

तुम्हे अपनी पसंद के जीवनसाथी से विवाह का अवसर मिलता है और मुझे वो भी नही मिली जो मेरी आत्मा में बसती थी!
मुझे बहुत से विवाह राजनैतिक कारणों से या उन स्त्रियों से करने पड़े जिन्हें मैंने राक्षसों से छुड़ाया था!

मुझे जरासंध के प्रकोप के कारण मेरा सारा कुटुम्ब यमुना से ले जाकर दूर देश मे समुद्र के किनारे बसाना पड़ा!दुनिया ने मुझे कायर कहा!

यदि दुर्योधन युद्ध जीत जाता तो विजय का श्रेय तुम्हे भी मिलता, लेकिन धर्मराज के युद्ध जीतने का श्रेय अर्जुन को मिला! मुझे कौरवों ने अपनी हार का उत्तरदायी समझ!

हे कर्ण!किसी का भी जीवन चुनोतियों रहित नही है,सबके जीवन मे सब कुछ ठीक नही होता!कुछ कमियाँ अगर दुर्योधन में थी तो कुछ युधिष्टर में भी थी!
लेकिन सत्य क्या है और उचित क्या है ये हम अपनी आत्मा की आवाज़ द्वारा स्वयं निर्धारित करते हैं!

इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हम पर अन्याय होता है, इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारा अपमान किया जाता है,इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारे अधिकारों का हनन होता है…
फ़र्क़ सिर्फ इस बात से पड़ता है कि हम उन सबका सामना किस प्रकार करते हैं!

जीवन मे यदि हमारे साथ कुछ गलत होता है तो उससे हमे कुछ गलत करने का अधिकार नही मिल जाता,किन्ही एक परिस्थतियों के लिए हम किन्ही दूसरी परिस्थितियों को ज़िम्मेदार नही ठहरा सकते।

अन्याय की परिभाषा हम स्वयं तय करते हैं, यदि आप नक़ल करते पकड़े जाएं तो वो अन्याय नही है,यदि ड्यूटी पर रिश्वत लेते पकड़े जाएं तो वो अन्याय नही है, ये आपकी गलतियों का फल हैं हम उसका प्रतिकार नही कर सकते।

जीवन के संघर्षपूर्ण दौर ही हमारी किस्मत तय करते है।

इश्वेर ने हमे दिमाग दिया है लेकिन उसे गलत या सही रूप में इस्तेमाल करने का जिम्मा हमारा है!

इश्वेर ने हमे दो हाथ दिया उनसे सोना खोदना है या किसी की कब्र ये निर्णय हमारा है!
इश्वेर ने हमे पैर दिये लेकिन उन्हें किस रास्ते पर चलना है ये निर्णय भी हमारा है!

संघर्ष तो दोनों और है लेकिन आप उसका कृष्ण की तरह सामना करते हैं या कर्ण की तरह !!

ये निर्णय आपका है….

“डेरा झूठा सौदा”

भारत आदिकाल से गुरुओं का देश रहा है जहां बहुत से गुरु हुए जिन्होंने समाज को राह दिखायी लेकिन आज भारत पाखंडी बाबाओं से भरा पड़ा है।

आज से करीब 190 साल पहले राजा राममोहन राय ने समाज के सभी धर्मों में तथाकथित धर्मगुरुओं के बढ़ते हुए आधिपत्य के बारे में कहा था कि श्रद्धालू इश्वेर की शक्ति को ना पहचानकर समाज मे से ही उपजे हुए कुछ लोगों की महत्वकांशा का शिकार हो जाएंगे। इसी कड़ी में औरतें कुछ और आगे बढ़कर उन्हें अपना सर्वस्व तक सौंपने को तैयार हो जाएंगी। ये समाज के पतन का कारण भी हो सकता हैं। (thoughts roughly extracted from “Indias Struggle for Independence” By Bipin Chandra)

राम रहीम, रामपाल,आसाराम,राधे माँ, और ना जाने कितने ऐसे नाम जो जनता को उल्लू बनाने की फैक्ट्रियां चला रहे है और लोग बड़े चाव से उन्हें TV पर ही दंडवत करके जन्म सफल करते रहते है ।

चलिये आपको बाबा कैसे बनते हैं उसकी एक सच्ची घटना बताती हूँ।बात कुछ पुरानी है लेकिन आज देश मे हो रहे ढोंग के व्यपार को मद्देनजर रखते हुए मैं इसे आपसे साझा कर रही हूँ ।

एक यात्रा के दौरान कुछ घण्टे एक बाबाजी का सहयात्री बनने का मौका मिला। वो जमाना मोबाइल रिकॉर्डिंग का नही था सो घटना दिमाग मे ही रिकॉर्ड रही।

उन बाबाजी ने बताया के वो 5 भाई बहन में अपने माँ बाप की सबसे नालायक संतान थे,पढ़ाई में मन नही लगता था,जब तब घर से भाग जाते थे। उनकी 2 ही विशेषता थी कि वो वाकपटु थे और सुरीला कंठ पाया था।

धन के अभाव में कभी मंदिर में तो कभी दुकानों के बरामदे में सो जाते थे। उन्हें किसी भी प्रकार के काम करने में कोई रुचि नही थी सिर्फ घूमना व आवारागर्दी करना पसंद था।

एक बार वो किसी चिलम बाबा के डेरे पर रुके वहां से उन्हें चिलम की लत लग गई। वहां उन्होंने सीखा की कैसे चिलम बाबा सारा दिन जनता को उल्लू बनाते थे। ज्यादातर लोग या तो घरेलू झगड़ों के तंत्र मंत्र कराने आते थे या अधिक अधिक से अधिक धन किस प्रकार प्राप्त हो इसके लिए चरण दबाते थे।

चिलमबाबा भक्तों को चिलम की राख भभूत बता कर बांटते रहते थे। रात में गुरु चेला खूब हंसते थे की किस प्रकार वो लोगों को काठ का उल्लू बनाते थे।

सबसे आसान शिकार घरेलू महिलाएं होती थी।

वहीँ से हमारे इन महाशय को बाबा बनने का आईडिया आया। पहले उन्होंने दाड़ी व बाल इत्यादी बढ़ाये। कई प्रकार की मालाएं पहनी हुलिया बदला। फिर उन्होंने वहां से कुछ दूर एक गाँव को अपनी शिकारस्थली के रूप में चुना।

वहां एक खेत मे पीपल के नींचे चबूतरे पर एक छोटा सा मंदिर बना हुआ था वहीँ डेरा डाला।

2-4 दिन में वो गांव के एक आध लोगों को राम कथा सुनाने लगे। धीरे धीरे रोज़ शाम को मंडली जुड़ने लगी। गांव के घरों से बाबा का भोजन आने लगा। बाबा के लिए कमरा बन गया।

बाबा ने एक दिन कहा की मैं एक हफ्ते तक ध्यान में जाऊँगा व गाँव के कल्याण के लिये भगवान से मिलकर आऊँगा। बाबा कमरे में बंद हो गए उन्होंने अपने एक शातिर चेले के माध्यम से अंदर भोजन इत्यादी की व्यवस्था कर ली। बाबा को ध्यान में देखने के लिए भीड़ जुड़ने लगी। एक हफ्ते बाद बाबा ने बाहर आकर कहा की वो साक्षात भगवान से मिलकर आएं हैं और भगवान ने कहा है की इस गांव में अगर एक भव्य मंदिर का निर्माण होगा व रोज़ भगवत कथा होगी तो भगवान ये इस गांव में आकर बस जाएंगे।

फिर क्या था मंदिर निर्माण के लिए चंदा जुटना शुरू हो गया। लोग हर संभव दान देने लगे। मंदिर का प्रांगण बड़ा हो गया। जिस बिचारे गरीब की ज़मीन थी उसपर सभी तरह का दबाव पड़ने लगा की वो ज़मीन अब भगवान की हो गई और उसके परिवार पर भगवान की कृपा हो गई। स्थानीय नेता भी बाबा के पास आने लगे क्योंकी बाबा अपने भक्तों को जिसे वोट देने को कहेंगे भक्त उसे ही वोट देंगे।

फिर आस पास की जमीनें हड़पने का सिलसिला शुरू हुए क्योंकी अब मंदिर ही नही आश्रम भी बनना था। अब बड़े बड़े सेठ लोग भी उसमे सहयोग देने लगे। बाबा का दरबार लगने लगा। छोटे बड़े सब बाबा के दरबार मे मत्था टेकने आने लगे। भंडारा होने लगा। मंदिर के बाहर दुकाने बन गयी वो भी मंदिर के ट्रस्ट के अधीन थी जिसके मुखिया बाबा व उनके साहूकार चेले थे। कारोबार चल निकला।

फिर एक दिन कीर्तन में बाबा की नज़र एक सुंदर दुखियारी पर पड़ी जिसे बाबा ने एकांत में बुलाया पता लगा पति को नशे की लत थी सो वो लड़कर मॉयके आ गयी थी। बाबाजी की lovestory शुरू हो गई। धीरे धीरे वो सुंदरी, साध्वी में बदल गयी व बाबा की सेवा में आश्रम में रहने लगी। उसका काम महिला श्रद्धालुओं की भीड़ जुटाने का था। सास बहू, पति पत्नी, बांझपन, पुत्र रत्न की प्रप्ति जैसे टोनों के लिए बाबाजी की सेवाएं ली जाने लगी। बाबाजी महिलाओं के भगवान हो गए।

वो हर महिला को कहते थे की सिर्फ वो ही बाबा के लिए बनी है और हर महिला अपने को बाबाजी की चहेती समझने लगी। बाबा की महिला टीम तैयार थी। गाहे बगाहे बाबा जी अपनी चेलियों को स्थानीय पावरफुल लोगों के पास भेजने लगे। जमीनें आश्रम के नाम पर खरीदी जाने लगी। फिर वहां पैसे वाली पार्टियों से product सप्लाई पर पैसा लगवाया जाने लगा। दान व धर्म के नाम पर काला पैसा सफेद करवाने का कारोबार शुरू हो गया। राजनेता भी बाबा की शक्ति को समझने लगे। उनके पैर छूने व आशीर्वाद लेने आने लगे।

बहुत खास लोगों के लिए आश्रम में सुर, सुरा सुंदरी सभी का इंतज़ाम होता था। सबकी बिगड़ी सवारने वाले बाबा जी ने सबसे पहले अपनी बिगड़ी सुधार ली।

कुटिया की जगह बाबा के महल बन गया। एक धूर्त निठल्ला अब भगवान बन गया। लोग उनकी माला, तावीज़ पहनने लगे और उल्लू बनने का सिलसिला चलता रहा।

जब तक हम अपने लालच, लोभ व गलत वृतियों को क़ाबू नही रखेंगे ना जाने ऐसे कितने बाबा हमारी कमज़ोरियों का फायदा उठाते रहेंगे ।

Our Individual Time Zone

time

 

कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ।
कालः सर्वेषु भूतेषु चरत्यविधृतः समः ।।

क्या आप जानते हैं म्यामार (बर्मा) भारत से एक घण्टे आगे है तो क्या हम कहेंगे भारत म्यामार से धीरे है ?
भारत ब्रिटेन से 4.30 घण्टा आगे है तो क्या ब्रिटेन भारत से पीछे रह गया है?

जी नही !!दिन का जो समय भारत मे आता है वही समय म्यामार में एक घंटा पहले था और वही समय ब्रिटेन में साढ़े चार घन्टो बाद होगा।

यानी हम सब अपने समय मे चल रहे हैं!!

किसी की शादी छुटपन में हो गई कोई अभी कुंवारा है किसी के बच्चे सालों तक नही होती किसी के एक साल में ही हो जाते हैं

कोई 22 साल की उम्र में पढ़ाई खत्म कर 30 साल तक नौकरी के इंतज़ार में बैठा है और कोई 30 साल की उम्र में पढ़ाई खत्म करते ही नौकरी पा जाता है।

कुछ लोग 20 साल की उम्र में फौज में जाते हैं और 35 साल पर रिटायर भी हो जाते हैं कुछ लोग 35 साल पर नौकरी शुरू करते है और 60 साल में रिटायर होते हैं।

एक जवान इंसान एक्सीडेंट में मर जाता है और एक बीमार बुढा 90 साल की उम्र तक जीता रहता है।

क्यों????

क्योंकी हम सब अपने समय के दायरे में चलते हैं। हम अपना जीवन सिर्फ अपने समय के परिपेक्ष्य में जी सकते हैं किसी दूसरे के नही।

कभी कभी आपको लगता होगा आपके मित्र, भाई बहन आपसे आगे निकल गए और कभी आप कुछ लोगों से आगे निकल गये वो इसलिये की हममे से हर एक के समय की गति अलग है।

हम सभी को जीवन मे अपने समय मे ,अपनी गति से और अपने मार्ग से चलना होता है। इश्वेर ने हम सब के लिए एक व्यक्तिगत खाका तैयार किया है जो किसी दूसरे से अलग है

हमारी गति अलग है हमारा समय अलग है।

मोदी जी 8 साल की उम्र से RSS में थे किंतु 50 साल की उम्र में पहली बार MLA फिर CM बने ,योगी जी 26 साल की उम्र में MP बन गए और 44 साल की उम्र में CM!!

राजीव गांधी 40 साल की उम्र में प्रधान मंत्री बने और 46 साल की उम्र में मर गए मोरारजी देसाई 81 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बने और 99 साल की उम्र में मरे!!

55साल की उम्र में ओबामा रिटायर हो गये और 70 साल की उम्र में डोनाल्ड ट्रम्प ने अपना कार्यकाल शुरू किया!!

जब 20साल का एक इंसान जवान कहा जाता है तो कुते के लिए वो आखिरी समय होता है।

जब हम एक ही दिन में रात व दिन महसूस करते हैं तो उत्तरी ध्रुव पर रहने वाले एस्किमो 6 महीने तक सिर्फ रात व 6 महीने तक सिर्फ दिन में रहते हैं तो क्या एक साल उनके लिए एक दिन व एक रात हैं?

घड़ियां कितनी भी हों समय एक ही होता है किंतु आपका व हमारा समय हमें अलग अलग परिणाम देता है।

कोई हमसे आगे है पीछे इससे कोई फर्क नही पड़ता क्योंकि हमें अपने समयनुसार चलना होता है।

किसी से अपनी तुलना मत करिये अपने समय के साथ चलिये।

कुछ देर नही हुई है..!!!

ना आपकों नौकरी मिलने में
ना शादी होने में
ना बच्चा होने में
ना प्रमोशन में
ना गाड़ी खरीदने में
ना घर खरीदने में
ना इन्क्रीमेंट बढ़ने में

जिस समय आप बुरे समय को कोस रहे होते हैं समय उस वक़्त भी चल रहा होता है जिस समय आप अच्छे वक़्त में ठहाके लगा रहे होते हैं समय उस वक़्त भी चल रहा होता है।

आपको भले ही लगे देर हो रही है किंतु समय जानता है की उसे कब आना है

ना तो देर हुई हैं ना ही कोई जल्दी है ,क्योंकि आपका समय अपने समय पर ही आएगा

बस !!भरोसा रखिये!!!