Pakistani Buzkashi

buzkashi

अफगानिस्तान का एक खेल हुआ करता है जिस का नाम है “बुज़काशी” इस खेल में घोड़े पर सवार घुड़सवार एक मरी हुई भेड़ को फुटबॉल की तरह से खेलते है और जीतने वाला मरी भेड़ को जीत की निशानी के तौर पर सबको दिखाता है।

आज पाकिस्तान हमारे शहीदों के शरीर के साथ वही बुज़काशी खेल रहा है। और एक भी वामपंथी,उग्रपंथी और मानवता की बात करने वाले आगे आकर पाकिस्तान के घिनोनो कृत्यों की चर्चा नही कर रहे।

ये पाकिस्तान नही कसाइयों की मंडी है जहाँ बर्बरता की सीमा खत्म हो गई है।

पाकिस्तान के संवीधान में आदर्श और असूल नाम के शब्द नही हैं, अब तक तो आतंकवादी ही गोली मारने व बर्बरता से हत्या करने के वीडियो जारी करते थे लेकिन अब एक देश की सेना यह कर रही हैं।

एक और हमारी सेना पूरे आदर के साथ पाकिस्तानी सैनिकों के शव वापिस करती रही है लेकिन पाकिस्तान से ऐसी कोई भी उम्मीद करना सांप के मुँह से अमृत निकालने जैसा है।

1949 के जेनेवा कन्वेंशन के आर्टिकल 16 में ये साफ तौर पर लिखा है की सैन्य जरूरतों के अनुसार मारे गए लोगों के शव का सम्मान करना चाहिये व उसे सुरक्षित रखने के हरसंभव कदम उठाने चाहिये।

1977 के एडिशनल प्रोटोकॉल में भे आर्टिकल 34(1) के अनुसार संघर्ष में मारे गए बंदी या कब्ज़े में होने वाले पार्थिव शरीरों का उचित सम्मान करना चाहिए।

Crimes of War में वेन इलियट के स्पष्ट रूप से लिखा है की प्रथम जेनेवा कन्वेंशन के आर्टिकल 15 में घायलों की मदद व मृतकों के शरीर को खराब न होने देने की बात कही है।

Internationally Red Cross committee ने भी कहा है की घयलों के साथ मृतकों को भी वापिस लाया जाए जिससे मरने वाले लोगों के बारे में पता लग सके।

लेकिन पाकिस्तान इनमे से किसी नियम का पालन नही करता।

क्यो?

क्योंकि वो घाघ है ।इस तरह की घटनाएं एक सोची समझी कूटनीति है, इस प्रकार की घटनाओं के परिणाम स्वरूप दो प्रकार की प्रतिक्रियाएं होती हैं:-

■पहली देश की जनता व सेना विचलित होकर सरकार को दोष देने लगती है इससे देश की अंदरूनी व्यवस्था असंतुलित हो सकती है और ये देश के दुश्मनों की मंशा होती है। जब फौज व जनता सरकार से युद्ध के लिए दबाव बनाती है तो सरकार प्रेशर में आ जाती है।
प्रतिक्रिया ना करने की स्थिति में जनता गुस्से में अपने ही देश मे तोड़फोड़ व अस्थिरता पैदा कर सकती है उस स्थिति में बाहरी सीमा से ध्यान हटकर अंदुरूनी स्थितयों को कंट्रोल करने में लग जाता है और सीमा कमज़ोर होने की स्थिती में दुश्मन का कार्य आसान हो जाता है । यहाँ सिर्फ पाकिस्तानी ही दुश्मन नही बल्कि चीन भी उसके साथ मिला हुआ है। इस स्थिति में भारत को एक बड़े खतरे का सामना करना पड़ सकता है।

■दूसरी स्थिति ये होगी की ऐसी हरकतें करने पर भारत पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ दे। उस स्थिति में पाकिस्तान विश्व् के सामने अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार भी इस्तेमाल कर सकता है जिसमे हमारे कुछ और दुश्मन भी साथ दे सकते हैं ।

हाँलाकि राज्यों द्वारा बल के उपयोग को रिवाज़ानुसार अंतराष्ट्रीय कानून व संधि कानून दोने से नियंत्रित किया जा सकता है।

लेकिन भारत के पहले हमला करने की स्थिति में पाकिस्तान को अंतराष्ट्रीय कानून में आत्म रक्षा के अनुछेदद के तहत आत्मरक्षा में किये गए परमाणु वार को उचित करार दिया जा सकता है।

पाकिस्तान को ये युति इस्तेमाल करने के लिए ये दिखाना ज़रूरी है की हमले की पहल भारत ने की।

भारत ने सन 2003 में *परमाणु हथियार का पहला उपयोग* No First Use या NFU . करने की अपनी नीति को व्यक्त किया था
सन 1998 में परमाणु परिक्षण के बाद भारत ने यह कहा की वो सिर्फ प्रतिशोध या प्रतिक्रिया की स्थिति में ही परमाणु हथियारों का उपयोग करेगा। इस स्थिति में यदि कोई पाकिस्तान पहले परमाणु हथियार चलाये या भारत के ये पता लगे की पाकिस्तान परमाणु हथियार दागने की तैयारी कर रहा है तो ही भारत परमाणु हथियार चलाएगा।

2010 में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने बाद में इसे “गैर परमाणु हथियार राज्य के खिलाफ कोई भी पहला उपयोग ” में बदल दिया यानी यदि कोई गैर परमाणु शक्ति वाला राज्य युद्ध मे है तो भारत उसपर परमाणु हथियार नही प्रक्षेपित करेगा।

लेकिन यदि दूसरा राज्य भी परमाणु शक्ति से लैस है और वो भारत पर परमाणु हमला करने की तैयारी में है तो भारत परमाणु हथियार छोड़ सकता है।

हंमारी सेना के विशेषज्ञ कोई मूर्ख नही हैं ना ही हमारे युद्ध नीतियां। एक आम देशवासी व सेना का साधारण सिपाही इन नीतियों की गूढ़ता को नही समझ सकते।

युद्धनीति भावनाओं से या त्वरित आवेश से परे होती हैं। पाकिस्तान हमे गुस्सा दिलाने की हर सम्भव कोशिश कर रहा है उसे पता है की भारत की जनता खौल रही है।

यदि आप ध्यान दे तो पिछले कुछ समय से आतंकी आम जनता को छोड़कर सेना को और अर्धसैनिक बलों को निशांना बना रहे हैं !

क्यों???

आतंकवादी, पाकिस्तानी, उग्रवादी ,नक्सल व वामपंथी तरह तरह से सेना पर इसीलये हमला कर रहे हैं जिससे जनमानस में क्रोध जाग्रत हो ,सेना में गुस्सा भड़के।

इसी आवेश में या तो देश में तोड़फोड़ व दंगे की स्थिति पैदा हो या हंमारी सेना के अन्दर बिद्रोह की स्थिति पैदा हो जाये।

सेना को क्रोध दिलाकर बलवे की स्थिति पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

इस षड्यंत्र में बहुत बड़ी बड़ी शक्तियां शामिल है यहां तक की सत्ताच्युत हुए नेता भी। आप लोग सोच भी नही सकते किस प्रकार की शक्तियां संगठित हो भारत के विरुद्ध ये षड्यंत्र रच रही है।

दुश्मन की चाल को समझिये व उतेजित होकर सरकार व सेना को कमज़ोर मत करिये। सेना को पता है उसे क्या करना है एक गलत फैसले से 125 करोड़ लोगों को दांव पर नही लगाया जा सकता।

हंमारी सेना ना तो चुप बैठी है ना ही हमने चूड़ियां पहन रखी है जिस घड़ी पाकिस्तान ने छोटा सा भी हमला किया हम लोग उसे नेस्तनाबूद कर देंगे। हंमारी फ़ौज तैयार है लेकिन हम पहले हमला कर पाकिस्तान की चाल में नही फंसेंगे।

इस समय सारा विश्व् भारत की ओर देख रहा है।

समाज मे फूट फैलने से रोके ….युद्ध की स्थिति में यह आम नागरिक का सबसे बड़ा कर्तव्य है को वो देश की स्थिरता व एकता बनाये रखने में सहयोग दे।

परमजीतसिंहप्रेमसागर की कुर्बानी व्यर्थ ना जाने पाये।
श्रद्धांजली व नमन इन शहीदों को

 

Branded Vs Generic Medicines

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1960 के दशक के पहले तक मेडिकल साइंस व दवायें इतना दिमाग घुमाने वाली नही होती थी।

ज्यादातर दवाएं ब्रांडेड थी व गुणवत्ता पर बहुत सवाल नही होते थे।

फिर 1937 की Sulfanilamide Elixir आपदा तथा 1960 की Thalidomide त्रासदी और टीकों में प्रदूषण के बाद नए रूप से दवाओं की गुणवत्ता व कीमत के ऊपर विश्लेषण होने लगे।

फिर 1960 में USFDA यानी united states food and drug administration नामके अवतार का जन्म हुआ जिससे दवाओं का प्रयोगशाला प्रदर्शन करना अनिवार्य हो गया।

इसके बाद दवाओं के clinical trials से जुड़ी हुई EBM यानी Evidence Based Medicine का परीक्षण पास करने के बाद ही दवाओं के निर्माण की अनुमति मिलने लगी।

आज किसी भी नई दवा को विकसित करने की कीमत करोड़ों में व अरबों में होती है जब कोई बड़ी दवा कंपनी नई दवा बनाती है, तो अनुमोदन के बाद सरकार कंपनी को विशिष्ट अवधि के लिए दवा का निर्माण और बाजार के लिए एक विशेष पेटेंट देती है,जो की आमतौर पर 10-20 वर्ष के लिए होता हैं ।,स्वाभाविक है की दवा बनाने वाली कंपनी को अपने रिसर्च व डेवलपमेंट यानी R&D का खर्चा इन्ही सालों में निकालना पड़ेगा ,इसीलिए ब्रांडेड दवा महंगी होती है।ये ब्रांडेड दवाएं नये प्रकार की बीमारियों और समाज की ज़रूरत के हिसाब से बनाई जाती हैं।

जब पेटेंट की समय सीमा समाप्त हो जाती है, तो लाइसेंस प्राप्त फार्मा कंपनी दवा बना सकती है। जब दवा एक फार्मा कंपनी द्वारा पेटेंट की समाप्ति के बाद निर्मित होती है, और बहुत कम कीमत पर बेची जाती है, इसे एक सामान्य दवा कहा जाता है

आज दवाओं के निर्माण के नियम अधिकांश देशों में बने हुए हैं और EBM की दवाओं को ही मान्यता मिलती है। इन प्रयोगों को सुरक्षित करने के लिए Helsinki Declaration 1964 का पालन करना अनिवार्य हो गया किंतु इससे उन फार्मक्यूटिकल कंपनियों को दिक्कत आने लगी जिनके पास प्रयोगशाला परीक्षण के लिए पर्याप्त धन नही है। क्योंकि ये प्रयोग बहुत महंगे होते हैं।

इस परेशानी को ध्यान में रखकर 1984 में फिर से ड्रग विनियामक कानून में परिवर्तन किया गया और अब छोटी कंपनियों को जैव -समकक्षता यानी Bio-Equivalence (BE) तथा जैव उपलब्धता यानी Bio-Availability (BA) के आधार पर मूल अणु से ही बनी हुई दूसरी दवा बना सकते हैं ।इसके लिए महंगेclinical test की ज़रूरत नही। इससे वही दवा कम मूल्य पर दूसरे नाम से मिल सकेगी। यही से Generic Medicine यानी “सामान्य  दवा” का जन्म हुआ।

जेनेरिक दवा में भी वही “सक्रिय तत्व” या Active Ingredient होता है जो मूल दवा में होता है। लेकिन इसको बनाने में महंगे टेस्ट की प्रक्रिया से नही गुजरना पड़ता इसलिये ये सस्ती होती हैं ।

इससे निर्माता व उपभोक्ता दोनों ही खुश होने चाहिये किन्तु इसके पीछे भी एक बदसूरत सच्चाई है।

*भारत के परिपेक्ष्य में “जेनेरिक दवा उत्पादन और विनियमन” का एक बहुत ही भद्दा पक्ष है। विकासशील देशों में जेनेरिक दवा के माध्यम से कम मूल्य पर जनता को दवा देने का प्रयास किया जाता है पर चूंकि इसकी निर्माण प्रक्रिया सस्ती हो जाती है अतः बहुत सी कंपनियां इसकी आड़ में डुप्लीकेट दवा बनाने लगी हैं। भ्र्ष्टाचार के चलते क्वालिटी कंट्रोल व गुणवत्ता पर ध्यान ना देकर इन दवाओं को पास कर दिया जाता है परिणामस्वरूप इन दवाओं से होने वाले नुकसान बढ़ रहे हैं । जिन्हें बनाने की प्रक्रिया में या तो मूल एक्टिव तत्व की मात्रा कम कर दी जाती है या उसे मिलाया नही जाता फलस्वरूप या तो दवा असर नही करती या विरुद्ध परिणाम होते हैं ।

हाल ये है की आज दुनिया मे बिकनेवाकी नकली दवाओं का 75% खेप भारत से जाती हैं । बहुत से देशों में भारत से आई हुई दवाईं बैन हैं। भारतीय दवाओं को विदेशों में बेचकर लाभ कमाने के लालच में बड़ी बड़ी फार्मक्यूटिकल कंपनियां जैसे की Ranbaxy, GVK Biohealthcare, Dr. Reddy Laboratory इत्यादी जाली BA/BE रिपोर्ट प्रस्तुत करने के अपराध में दोषी पाई गई व करोड़ों रुपये का हर्जाना भरना पड़ा।

इस साल में 2017 में लंबे समय बाद सरकार को अपने ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन करने के लिए मज़बूर होना पड़ा। जिसके अंतर्गत दवा निर्माताओं के लिए BE/ BA रिपोर्ट जमा करना अनिवार्य कर दिया गया।

अब इसपर कितनी गंभीरता से अनुमोदन होगा वो तो समय ही बताएगा। पिछली सरकार में ऐसी किसी रिपोर्ट को जमा कराना जरूरी नही था। गाहे बगाहे तैयार दवाओं के सैंपल चेक किये जाते थे। इसकी आड़ में जेनेरिक दवा बनाने वाली कंपनियां दवा में active ingredient के अनुपात में  फेरबदल कर 1000% तक का फायदा उठती है यही दवाईं सरकारी सप्लाई में भी पैसा खिलाकर मरीजों को बंटवाई जाती हैं जहाँ मंत्री से लेकर अस्पताल इंचार्ज तक का पैसा बंधा होता है। पकड़े जाने पर ये लोग इन्ही दवाओं को छोटे गांवों व गरीब देशों में बेचने लगते हैं।

इन दवाओं के सेवन से तो लोग नही मरते किन्तु उसमे active ingredient के अनुपात में समझौते से बीमारी या तो ठीक नही होती या कुछ अन्य तरह की परेशानियां हो जाती हैं।

फिलहाल बाज़ार में तीन तरह की दवाईं हैं:

  • ब्रांडेड जो की प्रतिष्ठित दवा कंपनियों द्वारा बेची व विज्ञापित की जाती है और जिन्हें प्राइवेट डॉक्टर अपने परचे पर लिखते हैं।
  •  ब्रांडेड जेनेरिक दवाईं जो प्रतिष्ठित कंपिनियो द्वारा बनाई जाती हैं और जिन्हें केमिस्ट आपको सुझाते व बेचते हैं
  • नॉन ब्रांडेड जेनेरिक दवा जो छोटी कंपनियों द्वारा बिना क्वालिटी कंट्रोल के बनाई जाती हैं व एक्टिव इंग्रीडिएंट की मात्रा पर ध्यान नही दिया जाता।

 

हाल ही में Medical Council of India (MCI) ने निर्देश जारी किए हैं जिसमे सभी पंजीकृत चिकित्सकों को अपने पर्चे में सिर्फ रासायनिक नाम लिखना होगा दवा का ब्रांड नही, इससे जो डॉक्टर पैसा लेकर ब्रांडेड दवाओं का नाम लिखते हैं उसमें कमी होगी किन्तु कमी ये है की केमिस्ट अपनी मनमानी दवा आपको देंगे। उसमे खतरा है जो कंपनी केमिस्ट को पैसा देगी वो उसी का नाम सुझाएंगे।

ये सब जानकारी आपकी देने का मेरा उद्देश्य आपको जागरूक करना था। दवा चाहे ब्रांडेड हो या जेनेरिक उसकी गुणवत्ता पर समझौता नही होना चाहिए उसी के साथ इस चिकित्सा के गठजोड़ वाले तंत्र में ऊपर से नीचे तक कितना भृस्टाचार है आपको पता लगे। इसमें देश की सरकार से लेकर केमिस्ट तक मिले हुए हैँ। अगली बार यदि किसी प्रियजन की मृत्यु हो तो उसकी वजह बीमारी ही नही गलत दवा भी हो सकती हैं।

कोई कुछ नही करेगा हमे खुद ही जागरूक होना पड़ेगा। हमे अपने आप पास क्या हो रहा है उसकी जानकारी होनी चाहिए।

आपमे से वो सभी लोग जो फ़ोन पर अधिकतर सेल्फी या जोक्स देखते हैं,अगली बार जब किसी दवा का पर्चा लें तो उसमें लिखी दवाईं को गूगल कर लें. उस दवा से जुड़ी अधिकतर जानकारी आप को मिल जाएगी उसके अतिरिक्त India.nic.in की वेबसाइट पर जाकर आप दवाओं की कीमत व अन्य जानकारियों से जुडी App भी अपने मोबाइल पर डाउनलोड कर सकते हैं ।

जहाँ हज़ारों लोग दुश्मनों की गोलियों से मर रहे है वहीं लाखो लोग दवा की गोली से भी मर रहे हैं अगर हम जागरूक हो जाये तो अपनो का जीवन बचा सकते हैं ।

 

 

The Real Progress

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भारत उपलब्धियों का देश है इसमें कोई संदेह नही किन्तु पिछले 300 वर्ष में अगर तरक्की का मूल्यांकन किया जाये तो हम पाएंगे कि क्या वजह है जो पश्चिम हमसे आगे निकल गया।

यहॉ मैँ आध्यत्मिक या धार्मिक तरक्की की नही अपितु ,भौतिक, राष्ट्रीय व भौगोलिक तरक्की की बात कर रही हूँ

ये संदेश हिन्दू और मुसलमान दोनो के ही लिए है जब वो भारत की तरक्की में अपना अपना योगदान गिनाते हैं तो उन्हें ये सब भी जानना चाहिये।

यदि हम 250 वर्ष का इतिहास खंगाले तो पता चलता है , कि आधुनिक विश्व यानी 1800 के बाद , जो दुनिया मे तरक़्क़ी हुई , उसमें पश्चिमी मुल्को यानी यहूदी और ईसाई लोगो का बहुत बड़ा हाथ है !

हिन्दूओं और मुस्लिमो का इस विकास मे 1% का भी योगदान नही है !
हॉं !!…इतिहास में हमपर कितनी बार आक्रमण हुआ इससे किताबों के पन्ने रंगे पड़े हैं। ये गौरव की नही बल्कि शर्म की बात है की ना जाने कितनी विदेशी ताकतों ने हमे गुलाम बनाया, कुछ तो कमी रही होगी हमारे अन्दर!!

1800 से लेकर 1940 तक हिंदू और मुसलमान सिर्फ बादशाहत या गद्दी के लिये लड़ते रहे !हम आज़ादी के लिए तो लड़ते रहे लेकिन तरक्की के लिए लड़ना ज़रूरी नही समझा!

अगर आप दुनिया के 100 बड़े वैज्ञानिको के नाम लिखें , तो बस दो चार हिन्दू और मुसलमान के मिलेंगे ! बाक़ी सब पश्चिम देशों के हैं वो इसलिये की हमने अपने देश के वैज्ञानिकों को साधन व सहायता उपलब्ध कराना जरूरी नही समझा। नोबल पुरूस्कार पाने वालों में से कितने हिन्दू और मुसलमान हैं?

पूरी दुनिया मे 61 इस्लामी मुल्क है , जिनकी जनसंख्या 1.50 अरब के करीब है लेकिन कुल 435 यूनिवर्सिटी है !
दूसरी तरफ हिन्दू की जनसंख्या 1.26 अरब के क़रीब है लेकिन लगभग 385 ही यूनिवर्सिटी है !
इधर अकेले अमेरिका मे 3 हज़ार से अधिक और छोटे से देश जापान मे 900 से अधिक यूनिवर्सिटी है !

ईसाई दुनिया के 45% नौजवान यूनिवर्सिटी तक पहुंचते हैं ! वहीं मुसलमान नौजवान मुश्किल से 2% और हिन्दू नौजवान करीब 8 % से 10% उच्च शिक्षा ग्रहण करते हैं !

दुनिया के 200 बड़ी यूनिवर्सिटी मे से 54 अमेरिका में, 24 इंग्लेंड में ,17 ऑस्ट्रेलिया में ,10 चीन में, 10 जापान में ,10 हॉलॅंड में, 9 फ़्राँस में ,8 जर्मनी में , सिर्फ 2 भारत और 1 इस्लामी मुल्क में हैं !

आज़ादी से पहले हर उच्च शिक्षित भारतीय विदेश से शिक्षा ग्रहण करके आता था चाहे वो गांधी हों ,नेहरू हों या अंबेडकर। इस सभी ने कभी इस बात पर चर्चा नही की की भारत की एक मौलिक शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए जो हमारे देश,समाज, संस्कृति व ज़रूरतों को मद्देनजर रखकर हो । आज भी हम अंग्रेजों द्वारा डिज़ाइन की गई शिक्षा प्रणाली को फेर बदलकर चला रहे हैं।

आज भी हमारी शिक्षा पद्धति सिर्फ नौकरों की फ़ौज तैयार करती है, जिसे प्राप्त करके युवा सिर्फ नौकरी ढूंढ सकते हैँ उद्योग व व्यवसाय करके स्वालंबी नही हो सकते।
लाखों रुपये की बिज़नेस की डिग्री हाँसिल कर युवा कुछ हज़ार रुपये की नौकरी ढूँढते हैं अपना व्यवसाय नही लगा सकते!

चलिये अब आर्थिक रूप से देखते है………..

अमेरिका का जी. डी. पी 14.9 ट्रिलियन डॉलर है !
जबकि पूरे इस्लामिक मुल्को का कुल जी. डी. पी 3.5 ट्रिलियन डॉलर है !
वहीं भारत का 1.87 ट्रिलियन डॉलर है !
दुनिया मे इस समय 38,000 मल्टिनॅशनल कम्पनियाँ हैं ! इनमे से 32000 कम्पनियाँ सिर्फ अमेरिका और युरोप में हैं !

आधुनिक दुनिया के 15,000 बड़े अविष्कारों मे 6103 अविष्कार अकेले अमेरिका में और 8410 अविष्कार ईसाइयों या यहूदियों ने किये हैं ! वो इसलिये की अभी भी तकनीकी व साइंस डिग्रियों में चल रही है कुछ नया ईजाद करने के लिये नही।

दुनिया के 50 अमीरो में 20 अमेरिका, 5 इंग्लेंड, 3 चीन , 2 मक्सिको , 2 भारत और 1 अरब मुल्क से हैं ! हमारे यहां अमीर होने का दिखावा तो है किंतु टैक्स के डर से खातों में सब अपने को गरीब दिखाते हैं!

अब बात करते हैं हिन्दू और मुसलमान जनहित , परोपकार या समाज सेवा मे भी ईसाईयों और यहूदियों से पीछे हैं !
आज रेडक्रॉस दुनिया का सब से बड़ा मानवीय संगठन है , इस के बारे मे बताने की जरूरत नहीं है !
बिल गेट्स ने अकेले ही 10 बिलियन डॉलर जो उनकी की करीब 90% संपत्ति है से बिल- मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन की बुनियाद रखी , जो कि पूरे विश्व के 8 करोड़ बच्चो की सेहत का ख्याल रखती है ! हमारे यहाँ लोग NGO इसलिय खोलते हैं जिससे अवैध फंडिंग मिल सके…
भारत में बहुत से अरबपति हैं !
मुकेश अंबानी अपना घर बनाने मे 4000 करोड़ खर्च कर सकते हैं ,अम्बानी बहुएं 5स्टार और 7 स्टार स्कूल पूंजीपतियों के बच्चों के लिए चलाती हैं लेकिन भारत के गरीब बच्चों के नाम पर दो चार NGO को दान देकर बरी हो जाती हैं अरब का अमीर शहज़ादा अपने स्पेशल जहाज पर 500 मिलियन डॉलर खर्च कर सकते हैं !
हमारे दलित नेता लाखों रुपये की गाड़ियों में चलते हैं लेकिन अपने वर्ग के गरीबों के उत्थान का ठेका सरकार से ही उठाते हैं।
मानवीय सहायता के लिये भी पूंजीपति आगे नही आ सकते हैं !

ओलंपिक खेलों में भी अमेरिका ही सब से अधिक गोल्ड जीतता है , हम खेलो में भी आगे नहीं ! हमारे बहुत से खिलाड़ियों को अपने खेल के साधन भी खुद ही जुटाने पड़ते हैं। पिछले दिनों भारत की पहली महिला आइस हॉकी की टीम ने इंटरनेट पर चंदा इक्कठा करके अपने बूते से विश्व् कप खेलने के लिए गई!

हम अपने अतीत पर चाहे जितना गर्व करें किन्तु व्यवहार से अत्यधिक स्वार्थी ही है ! हम आपस में लड़ने पर ही अधिक विश्वास रखते हैं !मानसिक रूप में आज भी हम विदेशी व्यक्ति से अधिक प्रवाभित हैं ! अपनी संस्कृति को छोड़ कर , विदेशी संस्कृति अधिक अपनाते हैं !सिर्फ हर हर महादेव और अल्लाह हो अकबर के नारे लगाने मे , हम सबसे आगे हैं !जरा सोचिये , कि हमें किस तरफ अधिक ध्यान देने की जरुरत है ! क्यों ना हम भी दुनिया में मजबूत स्थान और भागीदारी पाने के लिए प्रयास करें , बजाय विवाद उत्पन्न करने के और हर समय जात पात में उलझने के , खुद कि और देश की ऊन्नती पे ध्यान दे !समाज की जागृती का जिम्मा कुछ व्यक्तियो का ही नही बल्कि सभी जागरूक और विवेकशील नागरिकों के लिए भी उतना ही ज़रूरी है ।

 

Need For National Character

चीनियों ने अपने राष्ट्रीय पहचान के लिए चीन की दीवार “The Great Wall of China” बनाई जो दुनिया के 7 अजूबों में से एक है ।
उसके पीछे सोच थी की शायद इतनी ऊंची दीवार फांद कर कोई आक्रमण नही कर पायेगा किन्तु दीवार बनने के पहले 100 सालों में चीन पर 3 बार आक्रमण हुआ, और ये आक्रमण दीवार तोड़ कर या फांद कर नही किये गए बल्कि प्रहरियों को रिश्वत देकर दुश्मन अंदर घुस जाते थे
और ये इसलिये की चीनीयों ने पत्थर की दीवार को तो निर्माण कर लिया किन्तु वो अपने सैनिकों का चरित्र निर्माण व राष्ट्रीय चरित्र बनना भूल गये…..
कुछ इसी प्रकार के प्रहरी भारत मे कहीं कहीं होते है जो सेना व देश की गुप्त सूचनाएं दुश्मन तक पहुंचाते हैं। मुम्बई में समुन्दर के रास्ते घुसने वाले आतंवादियों को सारी सूचना किसी अंदर वाले ने ही दी थी ।
कश्मीर में BSF की चौकियों की अन्दुरुनी सूचना भी किसी अंदर वाले ने ही दी थी।
Siri के आतंकवादी जेल से फरार होने में सफल इसीलये हुए की कोई अंदर वाला बिक गया।

चीनी में एक कहावत है :-
*यदि आप किसी देश की संस्कृति को नष्ट करना चाहते है तो उसके 3 बड़े ही माकूल तरीके हैं :
1.पारिवारिक संरचनाओं को छिन्न भिन्न कर दो
2. शिक्षा का स्तर गिरा दो
3. समाज के आदर्शों को बदल दो व गलत व्यक्तियों का गुणगान करने लगो
भारतवर्ष में परिवार की संरचना पूर्णरूप से खंडित हो रही हैं । पारिवारिक कलह व झगड़े बढ़ रहे हैं । दायित्वों में कमी आ रही है। परिवार में द्वेष व ईर्ष्या का बोलबाला है। बच्चे उपेक्षित है,बुज़ुर्ग दयनीय अवस्था मे हैं,औरतें बच्चे नही पैदा करना चाहती,पुरुष काम नही करना चाहते। भाई भाई से बहन बहन से जायदाद के लिए कोर्ट कचहरी कर रही हैं। परिवार में ही लोग काटकपट करने लगे हैं।
शिक्षा के नाम पर भी अनाचार है, शिक्षक अज्ञानी हैं,शिक्षा पैसे से खरीदी जा रही है,पैसे देकर अध्यापक बनाये जा रहे हैं, प्राइवेट स्कूल लूट रहे है, आरक्षण से होनहार बच्चों का जज़्बा टूट रहा है। बच्चों पर ज्ञान का नही बल्कि percentage लाने का भूत सवार है।
समाज के आदर्श बदल रहे हैं, अपना उल्लू सीधे करने वाले नेताओं के हज़ारों अनुयायी हैं,पाखंडी बाबा लोग हैं, नवयुवक भाईगीरी को शान समझते हैं, गैंगस्टर्स के लिए जान देने वाले लोग हैं। धार्मिक उत्पाद फैलाने वालों की रैली में हज़ारों लोग होते हैं।गुंडों पर बनी फिल्में सफल होती हैं।

क्या संस्कार खरीदे जा सकते हैं?
जरा सोच के देखिये!!!
आक्रमण तो हर ऒर से हो रहा है!!
विदेशियों के घुसे बिना भी! और जब तक चरित्र निर्माण पर ध्यान नही दिया जाता हम पर ऐसे ही आक्रमण होते रहेंगे 

Religious Venom

भारत में आज जातिगत व् धार्मिक उन्माद सामूहिक विनाश के हथियार बन गये है किसी रासायनिक या जैविक हथियार से कम नहीं हैं।

ये ऐड्स की बीमारी की तरह फैल रहे है जिसका कोई इलाज नही..कल की धार्मिक सोच आज एक खूनी कट्टरता में तब्दील हो रही हैं…इसका नतीज़ा बहुत भयावह है।

विनाश के ये वायरस कोई और नहीं बल्कि कुछ सत्तालोलुप, क्रूर व् आत्यायी किस्म के लोग फैला रहे हैं और करोड़ों लोगो को अपने स्वार्थ के कारण धर्मों की लड़ाई में झोंकने से नहीं हिचक रहे हैं।

इनके भड़काऊ भाषणों व् सभाओं पर तुरंत प्रतिबन्ध लगना चाहिये।TRP के भूखे मीडिया को अपने शोज में इन लोगों को जगह देना बंद करना चाहिये।

किसी अभद्र व् अश्लील साहित्य की तरह ये युवा मन में गहरे पैंठ रहे हैं और आज का युवा हिंसा व् धार्मिक निंदा का आदी हो रहा है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भावनाओ से खेला जा रहा है व् भड़काया जा रहा है।

हर जगह धार्मिक निंदा की उल्टी फैलाई जा रही है।

स्थिति बद से बदतर होती जा रही हूं ,समय रहते इनपर लगाम लगानी होगी……