गौमाता

कुछ वर्षों पहले विदेश में एक पार्टी में थी जहां बहुत से अंग्रेज़ व कुछ अन्य धर्मों के लोग भी थे।

बात चलते चलते हिन्दू धर्म व उसकी मूर्ति पूजा पर पहुंच गई।
एक अंग्रेज ने मुझसे सवाल किया की हिंदुओं में गौमांस क्यों वर्जित है?
इस सवाल का जवाब खालिस धार्मिक परिपेक्ष में नही दिया जा सकता था क्योंकी वहाँ मौजूद बहुत से लोग हिन्दू धर्म व उसकी मान्यताओं से अनभिज्ञ थे।

उन्हें सिर्फ यह कहकर की गाय कामधेनु है, या शंकर भगवान नन्दी बैल पर सवार हैं या गाय समुद्र मंथन से निकले रत्नों में से एक हैं, संतुष्ट नही किया जा सकता था।

यह बात मुझे उन्हें एक और दृष्टकोण से समझानी पड़ी की,” हज़ारों सालों से भारत कृषि प्रधान देश है और गाय हमारी कृषि के लिए बहुमूल्य है,जिसके हर अवयव से कोई ना कोई लाभ है।

खेत जोतने से लेकर खाद बनाने तक, दूध देने से लेकर चमड़ा उत्पादित करने तक हर जगह गाय बहुमूल्य थी तो कैसे हम सबसे ज्यादा लाभप्रद पशु को सिर्फ आहार के लिए मार सकते थे जबकि कृषि द्वारा उत्पादित अनगिनत पदार्थ हमारे भोजन के लिए उपलभ्ध थे।

इसके अतिरिक्त एक बच्चा ज्यादा से ज्यादा 2 वर्ष तक माँ के दूध पर पोषित हो सकता है उसके बाद जीवन भर गाय के दूध से उसे पौष्टिक तत्व मिलते हैं इस स्थिति में मां के बाद यदि कोई हमे जीवन भर अपने दूध से सिंचित करता है तो वो सिर्फ गाय है इस हिसाब से भी गाय हमारी माँ है और दुनिया का कौन सा बच्चा अपनी माँ को काट कर खायेगा?

गाय हिंदुओं की ही नही हर उस शख्स की माँ है जिसने कभी ना कभी गाय का दूध पिया है।

गाय सारे विश्व् के लिऐ माँ समान है क्योंकी गाय ना होती तो दूध जैसा अमृत ना होता। गोबर जैसी लाभकारी खाद ना होती। गौमूत्र जैसा एंटीसेप्टिक ना होता।

यदि अब भी आप लोग नही समझे कि हिन्दू धर्म कितना गहरा व गूढ़ है तो आप लोग हिन्दू धर्म को कभी नही समझ सकते क्योंकी हमारे यहां कुछ भी तथ्यविहीन नही है।”

यह सुनकर पूरी सभा मे सन्नाटा छा गया। बाद में बहुत से लोगों ने मुझसे आकर कहा कि उन्होंने कभी गौमांस भक्षण को इस नज़र से नही देखा था और उन्होंने गाय का माँस छोड़ने की प्रतिज्ञा की।

हमे यदि अपने धर्म की रक्षा करनी है, उसे मान सम्मान दिलाना है तो सबसे पहले उसे खुद समझना होगा।

ना शब्दों में उलझे ना रिवाज़ों में उलझें
सिर्फ गहरे में जाकर समझना होगा की वो क्या है, क्यों है और कैसे है।

जब कोई आपसे आपके धर्म के बारे में कुतर्क करे तो आपके अंदर इतनी काबलियत व जानकारी होनी चाहिये की आप उसके कुतर्कों को अपने तर्क से ध्वस्त कर सकें। तब ही आप अपने धर्म को सम्मान दिला पायेंगे।

Poisonus Arrows

कुछ किस्से कुछ कहानियाँ,

ज़िन्दगी भर का रोना

ज़िन्दगी भर की बेईमानियां

★ लड़की की उम्र करीब 23 वर्ष,गोद मे करीब एक साल का बच्चा। दिखने में सुंदर व भोली लेकिन आंखों में सूनापन। कुछ पूछते ही आंखों से टप टप आँसू गिरने लगे। बताया 6 बहिनों में से चौथी संतान थी। सर पर बाप का साया नही। निकट रिश्तेदारों ने उसकी शादी खानदान के ही एक लड़के से तय कर दी जो दुबई में काम करता था उम्र में 9 साल बड़ा।

घर मे सब खुश थे कि लड़की दुबई जायेगी। शादी हुई 20 दिन बाद लड़का दुबई चला गया। लड़की गर्भवती हो गई थी। लेकिन पति को खबर सुनाने पर वो भड़क गया और बच्चा गिराने को कहा । बोला “बच्चे से खूबसूरती खत्म हो जायेगी और यदि वो सुंदर ना दिखी तो वो उसे तलाक़ दे देगा।”

लेकिन लड़की ने बच्चा नही गिराया। लड़का बेटा होने पर भी ना तो आया ना ही बात की । फिर एक दिन whats app पर मैसेज आया कि मैंने तुम्हें तलाक़ दे दिया है। लड़के के माँ बाप भी ज़िम्मेदारी लेने से मुकर गये। लड़की ज्यादा पढ़ी लिखी नही थी घर मे वैसे ही किल्लत थी । भविष्य अंधकारमय था। लेकिन ना कौम का ना समाज का… एक भी व्यक्ति नही बोला कि ये गलत है!! कोई सुपर स्टार कोई मज़हबी नेता कोई कौम का ठेकेदार TV पर नही बोला कि “ये गलत हुआ। लड़के को सज़ा मिलनी चाहिये।”

अगर बोलते हैं तो दूसरे समाज के वो लोग,जो औरत का दर्द समझते हैं और जहां विवाह के साथ मान्यताएं जुड़ी हैं।

★औरत की उम्र 44 साल, पढ़ी लिखी, बड़ी कंपनी में काम करती थी 3 बच्चे थे। ज़िन्दगी बढ़िया चल रही थी। हाई क्लास लाइफ स्टाइल बच्चे अच्छे स्कूलों में सब कुछ ठीक ठाक।

फिर एक दिन शौहर विदेश के दौरे पर गया। रात को एक कॉल आया कि “बहुत दिन से बताना चाहता था कि, रिश्ते की एक बहन से संबंध चल रहा था अब नौबत ये है क़ि शादी करनी पड़ेगी इसलिये मज़बूरी में मैँ तुम्हे तलाक़ दे रहा हूँ। ”

एक फ़ोन कॉल, 3 शब्द और …!! 23 साल का रिश्ता खत्म,सारी ज़िम्मेदारियाँ खत्म, सारे जज़्बात खत्म, सब कुछ खत्म।

44 साल की उम्र 3 बच्चे ,नौकरी ,और हारा हुआ मन।

जिस दीवार पर घर खड़ा किया था अचानक वो नीचे से सरक गई। किसी ने उस आदमी को समाज से बॉयकॉट नही किया।किसी ने भर्त्सना नही की। निकट रिश्तेदारों ने भी दो चार दिन गालियां दी और फिर औरत को उसके हाल पर छोड़कर अपने अपने घर चले गये।

अब भी ना तो समाज बोला ना ही कौम,

शब्दों के पत्थर से हो गया रिश्ता खत्म!!

★महिला की उम्र 55 बरस,भीषण डिप्रेशन का शिकार तीन बड़ी बड़ी लड़कियाँ, 2 नाती, पति का व्यापार।

एक दिन रात को जब वो शौहर मियां के सर में मालिश कर रही थी तो उनके ऊपर जैसे बम गिरा। शौहर ने कहा,”अब तुम इतनी अच्छी नही लगती। मोटी तो हो ही गयी हो साथ ही झुर्रियां भी पड़ रही हैं ऐसी हालत में वो उनके साथ नही रह सकते।”

आखिर को मर्द है उसे एकदम टिप टॉप जवान दिखने वाली बीबी चाहिये

मोबाइल के whats app में बहुत सी जवान लड़कियों से रात को जब चैट करते थे तो ढलती उम्र वाली बीबी रात को अल्लाहमिया से उनके उम्रदराज़ होने की दुआ मांगकर सोती थी। 55 साल की उम्र में अचानक जवान औरतों की चाहत में खुद बुढापे के शिकार होते शौहर ने उन्हें तलाक़ का पत्थर मार कर घर से निकाल दिया।

बीबी को समझ नही आ रहा था क़ि उसका कसूर क्या है? सारी जवानी उस शौहर का घर बसाने में और बच्चे पालने में निकाल दी।

क्या उसका कसूर ये है कि उसने ब्यूटी पार्लर और ब्यूटी प्रोडक्ट्स पर पैसे नही उड़ाये और पाई पाई जोड़ती रही ये सोचकर कि शौहर की मेहनत की कमाई है। आज वो डिप्रेशन की दवाइयां खाती है और लगभग नर्वस ब्रेकडाउन के कगार पर हैं।

ये कैसी इंसानियत है? ये कैसे रिश्ते हैं? जिस्मानी रिश्ते रूहानी रिश्तों से बड़े हैं? ना जाने कब वो कंधा दगा दे जाये जिस पर सर रखकर वो बीबी सोती थी।

एक को छोड़कर दूसरे को पकड़ लेने का एक आसान सा रास्ता बना हुआ है कि सबकुछ ज़ायज़ बना दो। गलत को सही करार दे दो!! क्योंकी जो रिश्ता कागज़ के कॉन्ट्रेक्ट से शुरू होता है वो जबान के वार से खत्म भी हो जाता है।

कहीं कोई जन्म जन्म का साथ देने का वादा नही!!

कहीं सात जन्मों तक साथ रहेंगे वाला करार नही!

रिश्ते जोड़ते वक़्त ही शर्तें लिख दी जाती की रिश्ता टूटने के वक़्त किसको क्या मिलेगा। कितने पैसे से इस रिश्ते के मोल को चुकाया जायेगा।

बहुत से लोगों को इस खेल से बड़े फायदे भी हैं। जहां कुछ जायज़ ना हो इसकी आड़ ले लो। कुछ समय के लिये कागज़ पर पहचान बदल लो और एक और रिश्ता कायम कर लो।

हमारे बहुत से celebraties , बड़े बड़े लोग भी इसका लाभ उठाते है क्योंकि अगर ये ना हो तो अदालत में लुट जाएंगे। जेल होगी सो अलग। अगर पहली पत्नी को छोड़ने में यदि कानून आड़े आता हो तो कुछ पलों के लिए पहचान बदल लो, दूसरा ब्याह रचा लो और सब कुछ ज़ायज़ हो जाता है।

ये एक ही समाज के लिए अलग अलग कानून क्यों?

बहुत सारी महिला सेलिब्रटी भी हैं जिन्होंने दूसरों के घर इसी प्रथा से उजाड़कर अपने घर बसायें हैं। उनमे से कुछ तो राज्यसभा ,कुछ लोकसभा तक भी पहुंची हैं और इसी लिए इस कुप्रथा बारे में नही बोलीं क्योंकी उन्होंने इसी का इस्तेमाल करके दूसरी पत्नी का दर्जा हाँसिल किया है। हमारे बड़े बड़े सुपर स्टारों ने भी इसी का इस्तेमाल करके पहली पत्नी को त्यागकर दूसरी शादी रचाई।

इस सारे खेल में मानवीय पक्ष की कोई जगह नही।

सात फेरों के वक़्त कभी ऐसी कोई शर्त नही होती जो ये दर्शाए की यदि एक नए दूसरे को छोड़ दिया तो कौन कौन सी शर्तें मान्य होंगी। यानी उसमे छोड़ने, छुड़ाने की कोई जगह ही नही है। एक बार बंधन में बंधने का मतलब जन्म जन्मांतर का साथ। तलाक जैसे शब्द का विवरण ही नही है। यदि रिश्ता तोड़ना हो तो धर्म इसकी अनुमति नही देता सिर्फ अदालत के ज़रिए ही तोड़ा जा सकता है। धर्मानुसार पतिपत्नी जीवन पर्यन्त साथी रहते हैं।

10 बच्चों को जनने वाली स्थूलकाय औरत भी जब माँग में गर्व से सिंदुर भरती है तो वो जानती है कि उसके अर्थी चढ़ने तक उसका पति इस सिंदूर की लाज रखेगा। उसे डोली में लाया है अर्थी में विदा करेगा।

कोई डर नही, कोई insecurity नही।

अग्नि के फेरे ही हर सुरक्षा की गारंटी होते हैं।

दूसरी ओर वो औरतीं जो जितना भी चाहे पति से प्यार करे, कितना सर्वस्व न्योछावर कर दे लेकिन ताउम्र एक डर में जीती है की तीन शब्दों के पत्थर उसकी तक़दीर में कांटे बिछा देंगे।

औरत ना हुई कपड़ों पर लगी गर्द हो गयी.. झाड़ा और चल दिये।

कसूर भी अजीब तरह के,जो जीते जागते रिश्ते का क़त्ल कर देते हैं ..

पंखा क्यों बन्द किया.. हलाक़!

मनपसंद खाना क्यों नही बनाया..हलाक़ !

लिपस्टिक व नेलपॉलिश क्यो लगाई..हलाक़ !

लड़की क्यों जनी…. हलाक़ !!

जवाब क्यों दिया…हलाक़!

मेरा दिल दूसरी पर आ गया… हलाक़!

मोटी क्यों हो गई … हलाक़!

रिश्तों को जोड़ने के लिए इतने आडम्बर,इतनी रस्मों रिवाज़ , कागज़ पर लिखे करार और तोड़ने को शब्द भर काफी हो जाते हैं!!

बड़ी अजीब सी बात है जख्म मज़हब दे और उसपर मरहम लगाने का काम कानून करे!!

उसपर भी इसका विरोध किया जाता है। यानी-

जो जैसे चल रहा है चलने दो।

हमे खुदगर्ज़ी से मतलब है

कोई रोता है तो रोने दो

आज अगर मैं इस बारे में सोचती हूँ तो सिर्फ और सिर्फ एक औरत होने के नाते, इंसान होने के नाते.. बाकि कुछ भी उसके बाद में आता है।

आज 21वी सदी में यदि जनसंख्या के आधे हिस्से वाली महिला वर्ग के बारे में अगर महिलाएं भी ना सोचें तो वो खुदगर्ज़ी होगी।

कोई धर्म इस बात की पैरवी नही करता कि उसके नियमों से किसी निर्दोष को चोट पहुंचे,लेकिन उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वालों को इस बात से कोई फर्क नही पड़ता की सीमाएं क्या हैं!!

उनके हाथ मे ये एक हथियार है जिससे जब जी चाहे किसी निर्दोष को जिबह कर सकते हैं।

हलाक़! हलाक़!हलाक़

Living life the right way

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एक बार एक राजा ने अपने तीन ख़ास मंत्रियों को बुला एक एक थैला दिया और उन्हें वन में से फलों को भर कर लाने को कहा।

पहले मंत्री ने सोचा कि राजा को अच्छे व ताज़े फल पाकर खुशी होगी सो उसने चुन चुनकर ताज़े व बढ़िया फलों से थैला भर लिया।

दूसरे मंत्री ने सोचा राजा को इतनी व्यस्तता में कहां इतनी फुरसत होगी कि वो थैले के फलों को एक एक कर देखेगा। सो उसने अच्छा ,बुरा जो फल पाया थैले में भर लिया।

तीसरे मंत्री ने सोचा कि राजा सिर्फ यही तो देखेगा कि किसका थैला बड़ा है, इसलिये उसने अपने थैले में कूड़ा करकट व पत्थर भर लिए।

तीनो दरबार मे पहुंचे।

लेकिन ये क्या??

राजा ने बिना कुछ देखे तीनों को कारागार में डालने की आज्ञा दे दी और कहा अगले एक महीने तक जो कुछ उन्होंने अपने थैले में जमा किया है उससे अपना पेट भरें।

पहले मंत्री ने आराम से महीना गुजार लिया।
दूसरे मंत्री ने कुछ दिन अच्छे फल खाये फिर सडे फल खाकर किसी तरह जीवन बचाया।
तीसरे मंत्री के पास जीवन बचाने के लिए कुछ नही था। कूड़ा व पत्थर खाने से जीवन कैसे बचता?

जीवन के आखरी चरणों मे जो शुरुआती समय में जमा करते हैं वही काम आता है।

प्रत्यक्ष में जब हम दूसरों के जीवन,सफलता व सम्पन्नता से रश्क करते है तो ये नही जानते कि उनके अंत से ही उनके जीवन मे किये गए कर्मों का अंदाज़ा हो जाता है….

वरना कोई महात्मा क्यों किसीकी गोली से मरता?

क्यों दुनिया पर राज करनेवाले अपने ही अंगरक्षकों की गोली से छलनी होते?

क्यों दूसरों के मुँह से निवाला छीनने वाले आखरी क्षणों में नलियों के सहारे जीने की कोशिश करते हैं ?

क्यों दूसरों के बेटों के हाथों में बंदूम देनेवालों के बेटे उनके ही घरों को आग लगा देते हैं?

क्यों नारी जाति को वस्तु की तरह इस्तेमाल करने वाले किसी औरत की ही वजह से जेल की सलाखों के पीछे सड़ते हैं?

क्यों नोटों के बिस्तर पर सोने वाले मृत्यु को उन्ही नोटों से नही खरीद पाते?

क्यों ईमान बेचने वालों को उन्ही का कोई विश्वासपात्र चन्द रुपयों के लिए धोखा देता है?

भीष्म पितामह को भी गलत पक्ष का साथ देने की सज़ा तीरों की शैया पर लेटकर भुगतनी पड़ी।

सदाचारी युधिष्टर की एक गलती ने उनकी पत्नी व भाइयों को अपमान की स्थिति में पहुंचा दिया!

जो कमाई जीवन के पहले हिस्से में जोड़ेंगे वही बाद के हिस्से में खर्च करने को मिलेगी।

ना अकूत पैसा ना बेशुमार ताक़त आपके अच्छे जीवन की गारंटी दे सकती है।

कोई गलत रास्ता आपको सही मंज़िल तक नही पहुंचा सकता।

ज़रा सोच के जोड़ना!!

क्योंकि जो जोड़ रहे हो बाद में उसी से काम चलाना पड़ेगा

Should we speak or should we not ?

अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब समझना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है

यदि आरक्षण का विरोध करो तो आपको दलित विरोधी समझा जाता है!

यदि पाकिस्तान का विरोध करो तो मुस्लिम विरोधी समझ जाता है!

गद्दारों का विरोध करो तो कांग्रेस विरोधी समझा जाता है!

GST व नोटबंदी पर बोल दो तो BJP विरोधी समझा जाता है!

कुरीतियों का विरोध करो तो धर्म विरोधी समझा जाता है!

पुरानी पीढ़ी का विरोध करो तो संस्कार विरोधी समझा जाता है!

नई पीढ़ी का विरोध करो तो नए युग का विरोधी समझा जाता है!

सास का पक्ष लो तो बहू विरोधी समझा जाता है!

बहू का साथ दो तो सास विरोधी समझा जाता हूं!

पत्थर मारने वालों का विरोध करो तो कश्मीर विरोधी समझा जाता है!

देश विरोधी पत्रकारों व TV एंकर का विरोध करो तो आपको सेक्युलर विरोधी समझा जाता है!

बाबाओं के विरोध करो तो अधर्मी समझा जाता है!

सफेदपोशों का विरोध करो तो समाज विरोधी समझा जाता है!

चमचों का विरोध करो तो नेता विरोधी समझा जाता है!

सिस्टम की खामियों का विरोध करो तो संविधान विरोधी समझा जाता है!

कुछ भी बोलो ,कुछ भी लिखो लोग कहीं ना कहीं आपकी गर्दन मरोड़ने को तैयार खड़े रहते हैं!

हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है!!

क्या करें ? बोलें की ना बोलें?

Valmiki Or Hanumaan

जब वाल्मीकि जी ने अपनी रामायण पूरी की नारद जी को दिखाने के लिये ले गये। नारद जी उससे बहुत प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने कहा, ‘तुमने अच्छा तो लिखा है, लेकिन हनुमान की रामायण तुम्हारी रामायण से कहीं सुंदर है’।

‘हनुमान जी ने भी रामायण भी लिखा है!’, वाल्मीकि जी को ये जानकर चकित हो गये, और यह सोचकर कि हनुमान जी की रामायण किस प्रकार उनकी रामायण से बेहतर है,जानने हेतु वो हनुमान जी की लिखी रामायण को ढूँढ़ने लगे!

कदली-वन के एक झुरमुट में ढूँढते हुए , उन्होंने पाया कि हनुमान जी ने अपनी रामायण को केले के पेड़ के सात व्यापक पत्तों पर अंकित किया था।

उसने इसे पढ़ा और पाया की व्याकरण और शब्दावली, रचना और माधुर्य की दृष्टी से हनुमान जी द्वारा लिखित रामायण उनकी रचना से कहीं ज्यादा सुंदर थी और उसे पढ़ते पढ़ते वो रोने लगे।

‘क्या मेरी रामायण इतनी बुरी है?’ हनुमान जी ने पूछा

वाल्मीकि ने कहा, ‘नहीं, यह बहुत उत्तम है!”

‘तो आप रो क्यों रहे हैं मुनिवर ?’ हनुमान जी ने पूछा

‘क्योंकि आपकी रामायण पढ़ने के बाद कोई भी मेरी रामायण पढ़ना नहीं चाहेगा,’ वाल्मीकि जी ने उत्तर दिया।

सुनते ही हनुमान जी ने सात केले के पत्तों को तोड़ दिया, “अब कोई भी हनुमान की रामायण को नहीं पढ़ेगा।”

हनुमान जी ने कहा, ‘मुनिवर आपको अपनी रामायण की ज़रूरत मेरी लिखी रामायण से कहीं अधिक है आपने रामायण लिखी है ताकि दुनिया वाल्मीकि को याद रखे; मैंने अपना रामायण लिखा था ताकि मैं राम याद रख सकूं। ‘

ठीक उसी पल में वाल्मिकी को एहसास हुआ कि वो उन्होंने रामायण स्वयं को स्थापित करने के लिए लिखी और वो अपनी रचना के माध्यम से प्रसिद्ध होना चाहते थे।

उन्होंने रामायण की रचना अपने विचारों को सत्यापित करने के लिए की।ना कि राम के प्रति प्रेम के लिये। उन्होंने रामायण लिखी जिस्से उनका नाम अमर हो जाये ना कि राम के प्रेम व भक्ति में सरोबार होकर ।वाल्मिकी ने रामायण लिखकर अपने लेखन को सिद्ध किया

और हनुमान!! रामजी उनका जीवन थे और रामायण उनकी भक्ति थी।

वाल्मिकी की रामायण उनकी महत्वाकांक्षा का एक उत्पाद था; लेकिन हनुमान जी की रामायण उनके राम के प्रति स्नेह का एक उत्पाद था।

यही कारण है कि हनुमान जी की रामायण वाल्मिकी की रामायण से कहीं ऊपर थी । क्योकि “राम से बड़ा … राम का नाम है!”

आज भी हमारे समाज मे हनुमान जैसे लोग हैं जो प्रसिद्ध नहीं बनना चाहते हैं वो निरंतर बिना कामना के अपना कर्म करते रहते हैं और अपने उद्देश्य को पूरा करते हैं।

जीवन मे जो लोग आपकी सफलता के हिस्सेदार हैं उनके कंधों पर पैर रखकर सीढ़ी ना चढ़ें।

आज के युग मे काम से ज्यादा काम का ढिंढोरा है। हर इंसान ये सिद्ध करने में लगा है कि वो दूसरे से बेहतर है।

बहुत से ऐसे प्रोग्रामों में जाती हूँ जहां ये दिखाने की गलाकाट प्रतियोगिता चलती रहती है कि जैसे सारे आयोजन मंच पर बैठे लोगों ने ही किया है।

जो व्यक्ति भाषण लिखकर देता है उसके शब्द ही वक्ता को तालियां दिलवाते हैं।लेकिन एक बार भी बोलने वाला भरी सभा मे उस गुमनाम लेखक का नाम नही लेता।

जीवन के हर क्षेत्र में होड़ लगी है है कि किस प्रकार अपने को बेहतर सिद्ध कर सकें। उत्पाद से ज्यादा उसकी पैकेजिंग पर तमाम ज़ोर रहता है। एक संकीर्ण सी मानसिकता चहूं ओर व्यपात है।

हमे वाल्मीकि की तरह नहीं बनना जो सिर्फ ये समझते रहें कि हमारी “रामायण” ही उत्कृष्ट है।

हमारे जीवन में बहुत सारे “हनुमान” भी हैं …

बहुत से ऐसे लोग हैं जो चुपचाप अपना काम कर रहें हैं ..बिना हेडलाइंस बने। जरूरी नही किसी नेता या VIP के साथ सेल्फी या अखबार में छप जाने से आपकी अहमियत बढ़ गई है।

याद रहे प्रसिद्धि की चाह से रामायण लिखने वाले वाल्मिकी सिर्फ पन्नों पर छपते हैं ..और राम की निष्काम सेवा करने वाले हनुमान घर घर मे पूजते हैं।

Babawaad

पिछले कुछ दिनों से एक के बाद एक बाबाओं का खुलासा हो रहा है। कभी आशाराम,कभी रामरहीम ,कभी फलाहारी और ना जाने कौन कौन !!

लेकिन यहां मैँ इन बाबाओं के कुत्सित कर्मों के बारे में बात नही कर रही। बाबाओं के काले किस्सों से अखबार व TV चँनेल्स रंगे पड़े हैं लेकिन सवाल ये उठता है की ये किस्से बनते कैसे हैं।

यदि विश्लेषण किया जाये तो हर बाबा के किस्से में कोई भी केस ब्लात्कार व शोषण की घटना के तुरंत बाद दर्ज नही हुआ। तकरीबन सारे ही केस हादसों के कुछ समय बाद सामने आये।

आज जब छेड़छाड़ व बलात्कार के शोषित तुरंत कानून की सहायता लेते हैं ब कानून भी अब पूरी तरह से शोषितों की मदद करता है तो इन मामलों में पुलिस में रिपोर्ट बाद में क्यों की जाती है।ज़ाहिर है ये बाबा बहुत ऊपर तक पहुंच रखते है ,नेता से लेकर मंत्री और पूंजीपति से लेकर कानून के रखवाले तक इनके दरबार मे हाजिरी भरते हैं।

अगर ये मान लिया जाए की बाबाओं की पहुंच ऊपर तक है और पीड़ित उनके भय से कानून की शरण लेने से डरते हैं तो फिर किस मोड़ पर वो ये निर्णय करते हैं की अब ये मामला खुले में आना है?

सभी बाबाओं के किस्सों में एक समानता तो है कि :

¶हर पीड़िता अपनी मर्ज़ी से उनके आश्रम में गई।
¶हर एक पीड़िता बाबा को पहले से जानती थी।
¶ हर पीड़िता का परिवार बाबा का भक्त होता है।
¶हर पीड़िता व उसके परिवार को बाबा पर अन्धभरोसा होता है।
¶हर पीड़िता हादसे से पहले भी बाबा के निकट संपर्क में रही हैं।
¶करीब सभी मामलों में पीड़ित के साथ मारपीट, प्रताड़ना या अन्य तरह का शारीरिक उत्पीड़न नही हुए।
¶सभी मामलों में पीड़ित के परिवार वालों ने इस मामलों को शुरू में ही report करने की ज़रूरत नही समझी?

यहाँ सभी को एक बात पर गहराई से ध्यान देना होगा कि महिलाओं को इश्वेर ने कुदरती रूप से ये समझने की ताक़त दी है कि वो जान जाती हैं की किसकी नज़र खराब है,कौनसी हरकत गलत है , गलत तरह से छुआ जाना,या कोई अश्लील इशारे करना।ये सब आभास महिलाएं छोटी उम्र से ही समझ जाती हैं।

एक औरत होने के नाते मैं जानती हूँ की महिलाओं में गलत नीयत को जानने की शक्ति पुरुषों से कहीं ज्यादा होती है।

लेकिन इन सभी किस्सों में ये महिलाएं शुरू में ही इन इशारों को समझ कर सतर्क क्यों नही होती?

इन बलात्कारों में आरोपी बाबा उन्हें सड़क से उठा कर किसी सुनसान जगह में ले जाकर बलात्कार नही करता अपितु ये महिलाएं ये जानते हुए भी की किसी भी पुरुष के पास इस प्रकार से एकांत में रहने पर खतरा हो सकता है फिर भी जाती हैं? क्यों?

जो घरवाले उन्हें किसी लड़के के साथ बात करते देखकर भड़क जाते है क्यो अपने परिवार की स्त्रियो को पराये पुरुष के पास इस प्रकार भेजते हैं?

जो जवान लड़कियाँ इन बाबाओं का शिकार होती हैं क्या उनकी माएँ इसे आभास नही कर पाती की किस प्रकार किसी पुरुष के पास अपनी जवान बेटी को भेजने में खतरा हो सकता है?

क्यों ऐसे समयों में परिवार की कोई अन्य स्त्री या पुरुष पीड़ित के साथ नही होती?

जहाँ बाबा गलत है वहाँ भक्त भी कुछ कम गलत नहीं!

ये वो भक्त हैं जो असलियत जानकर भी अनदेखा करते हैं कुछ पाने की लालसा में कुछ खोना भी पड़ेग ये उस बात को क्यों नही समझते ?

दरअसल इन मामलों की पीड़िता कहीं ना कहीं बाबा से प्रभावित होती हैं या फिर बाबा के पास अपनी किसी इच्छा की पूर्ती या निज स्वार्थ से जाती हैं।

यदि पीड़ित को बाबा कोई नौकरी दिलाता है ,या बाबा उनहे रुपिया पैसा देता है,व्यपार में पैसा देता है,जमीन जायदाद दिलवाता है,कार्य सिद्दी के लिए influential लोगों से जिनमे धनाढ्य व्यपारी से लेकर आला दर्जे के अधिकारी व राजनैतिक व्यक्ति होते हैं, उनसे पीड़ित का संपर्क कराता है, तो फिर पीड़ित को ये बात जान लेनी चाहिये की प्रतिफल में कुछ माँगा जायेगा।

बाबाओं की पावर इतनी होती है कि हनीप्रीत जैसी लड़की अपने पति को छोड़कर अधेड़ उम्र के थुलथुल भांड जैसे बाबा की सरपरस्ती में चली जाती है? वो इन बाबाओं के साथ क्यों संपर्क बनाती हैं? मतलब साफ है पैसा व पावर!!

लोग समझते हैं कि वो बाबा की शरण से सबकुछ फ्री में पा लेंगे।
Nothing is free in life, Everything has a price

बाबा अपनी कृपा की कीमत वसूलते हैं। यदि बाबा किसी जवान औरत पर उपकार करता है तो जानता है की उसे बदले में क्या चाहिये!! जानती ये औरतें भी हैं कि बाबा की उनपर नज़र है किंतु वो सोचती हैं काम निकल जाए फिर देखेँगे।

वो पहली बार शायद बाबा का विरोध नही करती लेकिन बाद में नही चाहती कि उसकी पुनरावृति हो इस डर से या मानसिक यातना से टूट कर वो कानून की शरण लेती हैं।

यदि कोई महिला किसी काम को निकलवाने किसी पुरुष के पास जाती है तो उसे इस बात का अहसास ज़रूर होता है कि सामने बैठा पुरुष बदले में क्या चाहता है लेकिन चाहे वो पारिवारिक मजबूरी हो या आर्थिक मज़बूरी हो या महत्वकांशा कहीं ना कहीं वो महिला झुकती ज़रूर है ,इस प्रकार के बने संबंधों में पुरुष अपने द्वारा दी गई सहायता या उपकार का बदला वसूलते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या महिला स्वयं अपने को इन स्थितियों में ले जाने के लिए किस हद तक तैयार होती है?

वो परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने के लिए तो मजबूरी वश इन संबंधों के लिए तैयार हो जाती है लेकिन वो मानसिक रूप से अपने आप को इसके लिए तैयार नही कर पाती। बाद में अंतर्द्वंद के चलते वो इन घटनाओं को उजागर करने को तैयार हो जाती है।

कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में एक प्रसिद्ध धर्मगुरु की शिष्या को ज्यों ही इस बात का अहसास हुआ की स्पेशल सेवा का मतलब क्या होता है और क्यों बाबाजी स्त्रियों को कमरे में बुलाते है उसने तुरंत पुलिस को सूचित कर दिया,लेकिन सवाल ये है उससे पहले जिन महिलाओं के साथ वो सबकुछ हुआ उसे वो जानकर भी अन्य महिलाओं को सतर्क क्यों नही करती। क्यों एक महिला दूसरी महिला की रक्षा के लिए आगे नही आती?

यौन शोषण भी एक प्रकार की रिश्वत ही है, यदि कोई फ़ेवर पुरुष को दिया जाए यो कीमत रुपये में वसूली जाती है और यही फ़ेवर महिला को दिया जाये तो कीमत शारीरिक संबंध के रूप में भी मांगी जा सकती है।

रिश्वत इसलिये ली जाती है क्योंकी हम अपना काम निकालने के लिए वो कीमत देने को तैयार हैं, यौन शोषण तब होता है जब आपका उद्देश्य, होने वाले शोषण से आपके लिए कहीं ज्यादा कीमत रखता है।

आज स्थिति इतनी खराब है महिलाओं को चरित्र हनन के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है ।यदि राजनीती में प्रतिद्वंदी को रास्ते से हटाना हो तो किसी महिला को छदम रूप में विरोधी के यहां भेज दो, वो महिला बाद में किसी प्रकार के आपतिजनक फ़ोटो व वीडियो बना कर मीडिया व सोशल मीडिया में उसे छपवा देगी। scandal बनेगा और विरोधी खत्म!!

सवाल ये है कि हम महिलाएँ कहीं ना कहीं स्वयं ही ऐसी स्थितियां पैदा कर रही है जिससे यौन शोषण जैसी घटनाएं कम होने की जगह बढ़ रही हैं ।कुछ महिलाएं थोड़े में सब्र करने को तैयार नही। महत्वकांशाएँ निरंतर बढ़ रही है।

यदि महिलाएँ इन situational compromises को छोड़कर यौग्यता बढाने पर ध्यान दें एक मजबूत चरित्र को लेकर चलें तो महिलाओं की स्थिति सम्मानजनक बनेगी। महिलाएं अपने को टूल बनने से रोकें।

यदि इच्छापूर्ती या महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए आप किसी बाबा,नेता,अधिकारी या महत्वपूर्ण व्यक्ति से सम्बंध बनाने को तैयार हैं तो आप समाज मे महिलाओं के सम्मान को गिराने की ज़िम्मेदार है जिसका नुकसान सभी स्त्रीजाति को होगा।

I request all my women fellow citizens to live life with dignity and do not use short cuts.

Happy Mother-In-Law Day

आप सोच रहे होंगे कि ये दिन तो कभी सुना ही नही!!

आज मेरी *सास*का श्राद्ध था।सभी रीतिरिवाज करने के बाद भी ऐसा नही लग रहा था कि वो हमारे साथ नही हैं। मैँ हर पल उन्हें परिवार में महसूस करती हूँ। उनका मार्गदर्शन आज भी हमे मिलता है।

आज मैं जो कुछ भी हूँ उसमे एक बड़ा योगदान उनका भी है। उनसे इतना कुछ सीखने को मिला की लगा कि जीवन मे वो बहुत काम आ रहा है। उन्होंने सीखाया कि परिस्तिथियों से कैसे लड़कर आगे बढ़ा जाता है। किस प्रकार परिवार को जोड़कर रखा जाता है।
कर्मठ बनो क्योंकी काम करने से कोई नही मरता। मुझे निर्भीक बनाया। किसी भी कठिन परिस्थिति में वो सम्बल देती थीं। उनका छोटा सा कथन”घबराओ नही,सब ठीक हो जाएगा” सुनती थी तो लगता था वाकई सब ठीक हो जाता है।

मुझसे बहुत सारी गलतियां भी होती थी लेकिब उनमे बहुत धैर्य था वो मेरे समझने का इंतज़ार कर लेती थी। सबसे बड़ी चीज जो सीखी स्वाभिमान व संतोष , शायद इसलिये कभी घर मे “अपना पराया” व “तेरा मेरा” नही हुआ। कभी किसी से ईर्ष्या नही हुई।

भारतीय संस्कृति में एक स्त्री को 2 बार जन्म होता है । एक तो जब वह एक बेटी के रूप में किसी के घर जन्मती है और दूसरा जब वह किसी के घर मे बहु के रूप में आती है।

जन्म देने वाली माँ जीवन के आरंभिक वर्षों में उसका पालन पोषण करके उसे एक ज़िम्मेदार वयस्क बनाती है लेकिन विवाह के बाद सास रूपी माता उसे एक परिवार को संभालने की दीक्षा देती है जो अगली 2 से 3 पीढी तक उसके काम आता है। सास ही सिखाती है इतने रिश्तों के बीच कैसे तालमेल बिठा कर परिवार को एकसाथ लेकर चलते हैं।

वो हमें अपना वो बेटा सौंप देती हैं जिसे उन्होंने अपनी छाती के नीचे रखकर पाला था। और एक सास कैसा महसूस करती है वो हमें तब पता चलता है जब हम स्वयं माँ बनते हैं।

पता नही क्यों हमारे समाज मे सास शब्द को एक उपहासिक पद के रूप में समझा जाता है। ज्यादातर कहानी किस्सों में ,TV सीरियल में ,फिल्मों में सास को एक खलनायिका के रूप में प्रस्तूत किया जाता है। जबकि वो भी किसी की माँ भी होती है, वो स्वयं भी सास बहू वाले रिश्ते से निकलकर आई होती है। आपके पति को उन्होंने 9 महीने पेट मे रखा व अपना दूध पिलाकर बड़ा किया।

सारे संस्कार माँ बाप ही नही देंकर भेजते ,बहुत से संस्कार ससुराल से भी सीखे जाते हैं। जो स्त्रियाँ ससुराल रूपी गंगा में डुबकी लगा लेती हैं वो अपने वैवाहिक जीवन मे ज्यादा सफल होती है।

कोई भी रिश्ता अपने आप सफल नही हो सकता, उसे सफल बनाना पड़ता है। रिश्तों को मजबूत करने के लिये उनमे निस्वार्थ प्रेम ,आदर व उदारता की सीमेंट डालनी पड़ती हैं । जिनके घर की दीवारें मजबूत होती हैं उनमें बाहर वाले सेंध नही लगा सकते।

यदि बहु अपने को सास की जगह रखकर सोचे और सास स्वयं को बहु की जगह रखकर सोचे तो सबकुछ साफ साफ समझ आ जायेगा ।

सभी विवाहित बहने से कहूँगी
“रिश्तों को ढोईये मत ,रिश्तों को जीना सीखिये”
ससुराल *जेल*नही *जीवन* है।