Are we supporters of Monarchy

We got Independence and we got our Constitution. Both were untimely and incorrect. It is my firm view that independence was given to us more because British got tired and were unable to hold on to their vast colonies.

we actually did very little to deserve and get same.

Of course our leader talk about sacrifices they made and hence they got right to rule for generations.

We are all aware whose clothes went to France and whose to UK for a wash as our dhobis were incompetent to wash their high standards clothes.

We watched and nodded our heads must be right. The very few who made up for a fight were killed untimely or were unceremoniously wiped out and their collective efforts were at the most a minor nuisance value to the British.

It is my firm view that independence was given to us more because British got tired and were unable to hold on to their vast colonies.

we actually did very little to deserve and get same.

Of course our leader talk about sacrifices they made and hence they got right to rule for generations.

We are all aware whose clothes went to France and whose to UK for a wash as our dhobis were incompetent to wash their high standards clothes.

We watched and nodded our heads must be right. The very few who made up for a fight were killed untimely or were unceremoniously wiped out and their collective efforts were at the most a minor nuisance value to the British.

British were mourning the loss of a nation where they could sell their textiles- education-and experiment their theories on economics-military-management and legal system. Of course not to mention the loss of revenue ( yes India was a profit center the claimed un realistic profits for protecting us)

So they decided to place in seats of power people sympathetic to them preferably educated in English on their own shores and people who would never break away from their eternal love.

Hence the power was given to our illustrious forefather who were neither illustrious nor my fore father.

Don't know if they were yours or any one in the nation.

Of course not to mention the loss of revenue ( yes India was a profit center the claimed un realistic profits for protecting us)

So they decided to place in seats of power people sympathetic to them preferably educated in English on their own shores and people who would never break away from their eternal love.

Hence the power was given to our illustrious forefather who were neither illustrious nor my fore father.

Don't know if they were yours or any one in the nation.

Anyway fast forward and we find congress ruling the nation with a mighty hand - we suffered loss in 1962 our army was ill clothed ill armed and we made the 'Himalayan Blunder' and Nehrus harp of "Hindi Cheeni Bhai Bhai"was broken and his Panchsheel in tatters but congress continued. Our Army was incompetent to fight a war and led by a even more incompetent and corrupt government. But we never asked a question on why we lost why we were defeated and they continued to extract their pound of flesh for their sacrifices and we continued to pay.

Nehru owed an explanation to the nation then and a big sorry - we got none and he escaped (after ruling us for 17 long years doing nothing for the nation or the party) - with his death.

India was a democracy it was ruled by a party but we never got any answers and they continued to rule.

 Our Army was incompetent to fight a war and led by a even more incompetent and corrupt government. But we never asked a question on why we lost why we were defeated and they continued to extract their pound of flesh for their sacrifices and we continued to pay.

Nehru owed an explanation to the nation then and a big sorry - we got none and he escaped (after ruling us for 17 long years doing nothing for the nation or the party) - with his death.

India was a democracy it was ruled by a party but we never got any answers and they continued to rule.

We continued to toy with the idea of democracy and till today you cant get any answers from any individual- they can be killed or blown but never any answers and after death all files are closed and we are cheated to know what happened and why?

As India matured we have had people who were dissatisfied with their portfolio or the favors they got from the government and they all parted way with congress. Some were so disillusioned that they could never become the party president or the PM they floated their own party.

Congress is 131 years old and prior Independence they elected their president almost every year - the gandhi family has held the party president post for 70 years.

Not bad at all for democracy. Or do you call it democracy

 Some were so disillusioned that they could never become the party president or the PM they floated their own party.

Congress is 131 years old and prior Independence they elected their president almost every year - the gandhi family has held the party president post for 70 years.

Not bad at all for democracy. Or do you call it democracy??

China Effect

मेरे प्रिय भारतवासियों

हम संख्या में चीन से कुछ ही पीछे हैं लेकिन दुनिया फतह करने में बहुत पीछे।

जब हम make in india , made in india , मेरा भारत महान, भारत मेरी जान में उलझे पडें है चीन अपने पंजे छोटे से छोटे देश मे फैला चुका है। कोई देश चीन से अछूता नही है। चीन की जड़ें बहुत गहरी फैल चुकी हैं।

वो भारत के गणेश लक्ष्मी और दिये भी बना रहा है, और रूस के फूलदान भी, वो अफ्रीका के ज़ेबरा भी बना रहा है और हॉलैण्ड के नकली टूलिप्स भी, वो samsung को मात करते नकली फ़ोन भी बना रहा है और Hyundai को मात करने वाली Cherry कार भी।

जब हम प्रजातंत्र, साम्यवाद, मार्क्सवाद में उलझे हैं चीन पूंजीवाद के पिछले दरवाजे से घुस कर अपना स्थान बना चुका हैं।

इतने देशों में घूम चुकी हूं लेकिन हर देश मे एक ही चीज कॉमन मिली .. चीन!!!

हम हनी सिंह से लेकर अमिताभ बच्चन ..
विराट से लेकर रजनीकांत में उलझे हुए हैं और चीन एक ऑक्टोपस की तरह दुनिया मे अपने पंजे फैला चुका है।

दिल्ली के पराठें इम्फाल में नही पहुंचते, महाराष्ट्र की सौल कढ़ी बलिया में नहीं पहुंच पाई लेकिन चाऊमीन हर जगह है।

जितना आप अपने देश के बारे में नही जानते उससे ज्यादा चीन आपके प्रदेशों के बारे में जानता है।

चीन ये भी जानता है कि दिवाली में आप गणेश लक्ष्मी खरीदते हैं और होली में पिचकारी , क्रिसमस में बिजली की लड़ और वास्तु का पिरामिड । लेकिन आप नही जानते की चीन में नया साल कब होता है?

वास्तु छोड़कर आपने फेंगशुई पकड़ लिया है और चावल छोडक़त फ्राइड राइस?

प्लीज ये bjp, कांग्रेस, बसपा, सपा से बाहर निकल कर अपनी अस्मिता के बारे में भी सोचना शुरू करिये वरना दुनिया की दूसरी बड़ी जनसंख्या होकर भी आप कद्दू बन जाएंगे ।

मैंने जो देखा समझा दिया आगे आपकी मर्जी!

Poisonus Arrows

कुछ किस्से कुछ कहानियाँ,

ज़िन्दगी भर का रोना

ज़िन्दगी भर की बेईमानियां

★ लड़की की उम्र करीब 23 वर्ष,गोद मे करीब एक साल का बच्चा। दिखने में सुंदर व भोली लेकिन आंखों में सूनापन। कुछ पूछते ही आंखों से टप टप आँसू गिरने लगे। बताया 6 बहिनों में से चौथी संतान थी। सर पर बाप का साया नही। निकट रिश्तेदारों ने उसकी शादी खानदान के ही एक लड़के से तय कर दी जो दुबई में काम करता था उम्र में 9 साल बड़ा।

घर मे सब खुश थे कि लड़की दुबई जायेगी। शादी हुई 20 दिन बाद लड़का दुबई चला गया। लड़की गर्भवती हो गई थी। लेकिन पति को खबर सुनाने पर वो भड़क गया और बच्चा गिराने को कहा । बोला “बच्चे से खूबसूरती खत्म हो जायेगी और यदि वो सुंदर ना दिखी तो वो उसे तलाक़ दे देगा।”

लेकिन लड़की ने बच्चा नही गिराया। लड़का बेटा होने पर भी ना तो आया ना ही बात की । फिर एक दिन whats app पर मैसेज आया कि मैंने तुम्हें तलाक़ दे दिया है। लड़के के माँ बाप भी ज़िम्मेदारी लेने से मुकर गये। लड़की ज्यादा पढ़ी लिखी नही थी घर मे वैसे ही किल्लत थी । भविष्य अंधकारमय था। लेकिन ना कौम का ना समाज का… एक भी व्यक्ति नही बोला कि ये गलत है!! कोई सुपर स्टार कोई मज़हबी नेता कोई कौम का ठेकेदार TV पर नही बोला कि “ये गलत हुआ। लड़के को सज़ा मिलनी चाहिये।”

अगर बोलते हैं तो दूसरे समाज के वो लोग,जो औरत का दर्द समझते हैं और जहां विवाह के साथ मान्यताएं जुड़ी हैं।

★औरत की उम्र 44 साल, पढ़ी लिखी, बड़ी कंपनी में काम करती थी 3 बच्चे थे। ज़िन्दगी बढ़िया चल रही थी। हाई क्लास लाइफ स्टाइल बच्चे अच्छे स्कूलों में सब कुछ ठीक ठाक।

फिर एक दिन शौहर विदेश के दौरे पर गया। रात को एक कॉल आया कि “बहुत दिन से बताना चाहता था कि, रिश्ते की एक बहन से संबंध चल रहा था अब नौबत ये है क़ि शादी करनी पड़ेगी इसलिये मज़बूरी में मैँ तुम्हे तलाक़ दे रहा हूँ। ”

एक फ़ोन कॉल, 3 शब्द और …!! 23 साल का रिश्ता खत्म,सारी ज़िम्मेदारियाँ खत्म, सारे जज़्बात खत्म, सब कुछ खत्म।

44 साल की उम्र 3 बच्चे ,नौकरी ,और हारा हुआ मन।

जिस दीवार पर घर खड़ा किया था अचानक वो नीचे से सरक गई। किसी ने उस आदमी को समाज से बॉयकॉट नही किया।किसी ने भर्त्सना नही की। निकट रिश्तेदारों ने भी दो चार दिन गालियां दी और फिर औरत को उसके हाल पर छोड़कर अपने अपने घर चले गये।

अब भी ना तो समाज बोला ना ही कौम,

शब्दों के पत्थर से हो गया रिश्ता खत्म!!

★महिला की उम्र 55 बरस,भीषण डिप्रेशन का शिकार तीन बड़ी बड़ी लड़कियाँ, 2 नाती, पति का व्यापार।

एक दिन रात को जब वो शौहर मियां के सर में मालिश कर रही थी तो उनके ऊपर जैसे बम गिरा। शौहर ने कहा,”अब तुम इतनी अच्छी नही लगती। मोटी तो हो ही गयी हो साथ ही झुर्रियां भी पड़ रही हैं ऐसी हालत में वो उनके साथ नही रह सकते।”

आखिर को मर्द है उसे एकदम टिप टॉप जवान दिखने वाली बीबी चाहिये

मोबाइल के whats app में बहुत सी जवान लड़कियों से रात को जब चैट करते थे तो ढलती उम्र वाली बीबी रात को अल्लाहमिया से उनके उम्रदराज़ होने की दुआ मांगकर सोती थी। 55 साल की उम्र में अचानक जवान औरतों की चाहत में खुद बुढापे के शिकार होते शौहर ने उन्हें तलाक़ का पत्थर मार कर घर से निकाल दिया।

बीबी को समझ नही आ रहा था क़ि उसका कसूर क्या है? सारी जवानी उस शौहर का घर बसाने में और बच्चे पालने में निकाल दी।

क्या उसका कसूर ये है कि उसने ब्यूटी पार्लर और ब्यूटी प्रोडक्ट्स पर पैसे नही उड़ाये और पाई पाई जोड़ती रही ये सोचकर कि शौहर की मेहनत की कमाई है। आज वो डिप्रेशन की दवाइयां खाती है और लगभग नर्वस ब्रेकडाउन के कगार पर हैं।

ये कैसी इंसानियत है? ये कैसे रिश्ते हैं? जिस्मानी रिश्ते रूहानी रिश्तों से बड़े हैं? ना जाने कब वो कंधा दगा दे जाये जिस पर सर रखकर वो बीबी सोती थी।

एक को छोड़कर दूसरे को पकड़ लेने का एक आसान सा रास्ता बना हुआ है कि सबकुछ ज़ायज़ बना दो। गलत को सही करार दे दो!! क्योंकी जो रिश्ता कागज़ के कॉन्ट्रेक्ट से शुरू होता है वो जबान के वार से खत्म भी हो जाता है।

कहीं कोई जन्म जन्म का साथ देने का वादा नही!!

कहीं सात जन्मों तक साथ रहेंगे वाला करार नही!

रिश्ते जोड़ते वक़्त ही शर्तें लिख दी जाती की रिश्ता टूटने के वक़्त किसको क्या मिलेगा। कितने पैसे से इस रिश्ते के मोल को चुकाया जायेगा।

बहुत से लोगों को इस खेल से बड़े फायदे भी हैं। जहां कुछ जायज़ ना हो इसकी आड़ ले लो। कुछ समय के लिये कागज़ पर पहचान बदल लो और एक और रिश्ता कायम कर लो।

हमारे बहुत से celebraties , बड़े बड़े लोग भी इसका लाभ उठाते है क्योंकि अगर ये ना हो तो अदालत में लुट जाएंगे। जेल होगी सो अलग। अगर पहली पत्नी को छोड़ने में यदि कानून आड़े आता हो तो कुछ पलों के लिए पहचान बदल लो, दूसरा ब्याह रचा लो और सब कुछ ज़ायज़ हो जाता है।

ये एक ही समाज के लिए अलग अलग कानून क्यों?

बहुत सारी महिला सेलिब्रटी भी हैं जिन्होंने दूसरों के घर इसी प्रथा से उजाड़कर अपने घर बसायें हैं। उनमे से कुछ तो राज्यसभा ,कुछ लोकसभा तक भी पहुंची हैं और इसी लिए इस कुप्रथा बारे में नही बोलीं क्योंकी उन्होंने इसी का इस्तेमाल करके दूसरी पत्नी का दर्जा हाँसिल किया है। हमारे बड़े बड़े सुपर स्टारों ने भी इसी का इस्तेमाल करके पहली पत्नी को त्यागकर दूसरी शादी रचाई।

इस सारे खेल में मानवीय पक्ष की कोई जगह नही।

सात फेरों के वक़्त कभी ऐसी कोई शर्त नही होती जो ये दर्शाए की यदि एक नए दूसरे को छोड़ दिया तो कौन कौन सी शर्तें मान्य होंगी। यानी उसमे छोड़ने, छुड़ाने की कोई जगह ही नही है। एक बार बंधन में बंधने का मतलब जन्म जन्मांतर का साथ। तलाक जैसे शब्द का विवरण ही नही है। यदि रिश्ता तोड़ना हो तो धर्म इसकी अनुमति नही देता सिर्फ अदालत के ज़रिए ही तोड़ा जा सकता है। धर्मानुसार पतिपत्नी जीवन पर्यन्त साथी रहते हैं।

10 बच्चों को जनने वाली स्थूलकाय औरत भी जब माँग में गर्व से सिंदुर भरती है तो वो जानती है कि उसके अर्थी चढ़ने तक उसका पति इस सिंदूर की लाज रखेगा। उसे डोली में लाया है अर्थी में विदा करेगा।

कोई डर नही, कोई insecurity नही।

अग्नि के फेरे ही हर सुरक्षा की गारंटी होते हैं।

दूसरी ओर वो औरतीं जो जितना भी चाहे पति से प्यार करे, कितना सर्वस्व न्योछावर कर दे लेकिन ताउम्र एक डर में जीती है की तीन शब्दों के पत्थर उसकी तक़दीर में कांटे बिछा देंगे।

औरत ना हुई कपड़ों पर लगी गर्द हो गयी.. झाड़ा और चल दिये।

कसूर भी अजीब तरह के,जो जीते जागते रिश्ते का क़त्ल कर देते हैं ..

पंखा क्यों बन्द किया.. हलाक़!

मनपसंद खाना क्यों नही बनाया..हलाक़ !

लिपस्टिक व नेलपॉलिश क्यो लगाई..हलाक़ !

लड़की क्यों जनी…. हलाक़ !!

जवाब क्यों दिया…हलाक़!

मेरा दिल दूसरी पर आ गया… हलाक़!

मोटी क्यों हो गई … हलाक़!

रिश्तों को जोड़ने के लिए इतने आडम्बर,इतनी रस्मों रिवाज़ , कागज़ पर लिखे करार और तोड़ने को शब्द भर काफी हो जाते हैं!!

बड़ी अजीब सी बात है जख्म मज़हब दे और उसपर मरहम लगाने का काम कानून करे!!

उसपर भी इसका विरोध किया जाता है। यानी-

जो जैसे चल रहा है चलने दो।

हमे खुदगर्ज़ी से मतलब है

कोई रोता है तो रोने दो

आज अगर मैं इस बारे में सोचती हूँ तो सिर्फ और सिर्फ एक औरत होने के नाते, इंसान होने के नाते.. बाकि कुछ भी उसके बाद में आता है।

आज 21वी सदी में यदि जनसंख्या के आधे हिस्से वाली महिला वर्ग के बारे में अगर महिलाएं भी ना सोचें तो वो खुदगर्ज़ी होगी।

कोई धर्म इस बात की पैरवी नही करता कि उसके नियमों से किसी निर्दोष को चोट पहुंचे,लेकिन उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वालों को इस बात से कोई फर्क नही पड़ता की सीमाएं क्या हैं!!

उनके हाथ मे ये एक हथियार है जिससे जब जी चाहे किसी निर्दोष को जिबह कर सकते हैं।

हलाक़! हलाक़!हलाक़

Smog

दिल्ली वालों की आँख जल्दी से नहीं खुलती। कभी डेंगू ,कभी चिकनगुनिया, और आज ये आलम है क़ि धुंए व प्रदूषण से उठने वाला कोहरा जानलेवा साबित हो रहा है।

इन सबकी वजह प्रकृति के साथ हो रहा खिलवाड़ है। सीमेंट के जंगल बनाने के चक्कर मे पेड़ों के जंगल काट दिये। ज़मीन में उगने वाले वृक्षों का स्थान गमलों में उगने वाले फूलों, व बोन्साई ने ले लिया।

दक्षिण दिल्ली के अमीर रिहायशी घरों में जहां 10 AC चलते हैं प्राकृतिक हवा की इंच भर भी गुंजाइश नही है।

दिल्ली को प्रदूषण नही लालच मार रहा है। 150वर्ग ग़ज़ के टुकड़े पर भी बहुतल्ला इमारत बन जाती है। तीन पुश्त पहले जो बड़े बड़े घर होते थे आज संतानों ने पैसे के लालच में बिल्डरों को बेच दिया और एक एक फ्लैट लेकर जमीन के टुकड़े कर दिए।

घर छोटे होते गये और गाडियाँ बड़ी होती गई। बाबुजी के घर की जगह 3BHK ने ले ली। कपड़े बालकनी की रेल में सूखने लगे और तुलसी खिड़की में। जहां बच्चे आंगन में खेलते थे वो अब बन्द कमरे में वीडियो खेलते हैं।

एक बड़ी अम्बेसेडर गाड़ी में सारा कुनबा घूम लेता था अब हर सदस्य को गाड़ी चाहिये। धूप व आसमान के दर्शन अब खिड़कियों से भी नही होते!!!

हवा बस पार्क व शहर के बाहर मिलती है। अब हंसी के लिए भी पार्क में इकट्ठा होकर बिना मतलब हां हा करना रह गया है।

ऊंची छतों वाले दफ्तरों की जगह कॉर्पोरेट बिल्डिंग में दड़बों में बन्द कबूतर जैसे लोगों ने ले ली। बस टकटकी बांध कंप्यूटर पर झुके रहते हैं।

बिल्डिंग में लिफ्ट इस्तेमाल करते हैं और gym में सीढी वाले स्टेपर पर सीढ़ी चढ़ते हैं। घर से बाहर कदम रखने के लिए गाड़ी चाहिये और gym में 3000 रु महीना देंकर साईकल चलाते हैं। सामान ट्राली में ढोते हैं और gym में 50 किलो का बेंचप्रेस करते हैं।

पीने को पानी बोतल मे लेकिन हर बिल्डिंग की छत पर स्विमिंग पूल होते हैं।

अब भाई इसकी कोई तो कीमत दिल्ली वालों को देनी पड़ेगी। सरकार कोई भी आ जाये क्या दिल्ली वाले गाडियाँ छोड़कर साईकल चलाएंगे? क्या घरों को तोड़कर बिल्डिंगे बनाना बंद करेंगे? क्या पार्किंग की जगह से गाड़ियां हटाकर पेड़ लगाएंगे? क्या मॉल्स को हटाकर शहर से बाहर करेंगे?

Odd-even is not God given .. कोई भी सरकार जादू का डंडा घुमाकर प्रदूषण दूर नही कर सकती!!प्रदूषण लोग करते है सड़कों पर गाड़ियां बढ़ाकर, छोटी जगहों में जरूरत से ज्यादा इंसान ठूँसकर!! गगनचुम्बी इमारतें बढ़ाकर!!

यूरोप के बहुत से देशों में लोग सूट टाई पहनकर साईकल से दफ्तर जाते हैँ। मेट्रो व पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं। प्लास्टिक व कचरे पर रोक रखते हैं।

खाड़ी देशों में जहां निरा रेगिस्तान है हज़ारों पेड़ रोज़ लगाये जा रहे हैं। पानी खर्च करने पर महंगा बिल देना पड़ता है। पानी भी बिजली की तरह ही महंगा है। महंगी पार्किंग हैं। drip irrigation के द्वारा sewage का सारा पानी सारे देश के में पेड़ लगाने के काम आता है और उसका पैसा भी नागरिक देते हैं।

हर समस्या को सरकार के माथे पर ठोकने वाले भारतीय खुद वातावरण को सुधारने में कितना योगदान देते हैं?

यदि समय रहते ना चेते तो दिल्ली वाली समस्या सभी बड़े शहरों में पनपेगी। हवा से बीमारी,पानी से बीमारी, कचरे से बीमारी फैलेगी।

आज पानी बोतल में बिक रहा है कल हवा थैलियों में बिकेगी।

समस्या की जड़ ज़रूरत से ज्यादा उपलब्धी है।

भारत मे गाड़ियों का पंजीकरण 10 साल पर होता है सब हर साल अनिवार्य कर देना चाहिए। यानी हर साल गाड़ी के रजिस्ट्रेशन के पहले टेस्टिंग होनी चाहिये।

बिजली की तरह पानी का भी मीटर होना चाहिये।इससे पानी की बर्बादी पर रोक लगेगी।

हर नागरिक के लिए साल में 100 घण्टे पर्यावरण व कम्युनिटी सर्विस के लिए अनिवार्य कर देने चाहिये वरना उसे दी जाने वाली सुविधाएँ बन्द कर दी जाएं।

गाड़ियों पर टैक्स बढ़ा कर टैक्सी,ट्रेन, रिकशा व मेट्रो सस्ती कर दी जानी चाहिये।

Incentive point system को बढ़ाना चाहिये। यदि कोई नागरिक सिर्फ मेट्रो व पब्लिक ट्रांसपॉर्ट का इस्तेमाल करता है तो उसे एक महीने के फ़्री पास देने चाहिये।

100 से ज्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों को कंपनी ट्रासपोर्ट से ही कर्मचारियों को यात्रा करानी चाहियें।

पार्किंग की फीस बढ़ा देनी चाहिये।

2 से ज्यादा गाड़ी रखने वालों पर luxary tax लगाना चाहिये।

बहुत से लोगों को मेरी इन बातों से बुरा लग रहा होगा किन्तु कड़े उपायों के सिवाय कोई चारा नही है। 123 करोड़ की जनसंख्या यदि अपने वातावरण का ध्यान स्वयं रखने लगे और अपनी ज़िम्मेदारियाँ समझने लगे तो हम दुनिया के बादशाह हो जायेंगे।

ये धुआँ हमारी जली हुई सोच का है और अगर सोच नही बदली तो ये सबको निगल जाएगा।

Be a true indian and true human

Article 370 and 35A

धारा 35A की जड़ें बहुत गहरी हैं..

बात शुरू होती है भारत व पाकिस्तान कर बंटवारे के साथ ही जब नेहरू जी ने कहा कि यद्यपि पाकिस्तान मुसलमानों के लिए बना है लेकिन यदि भारत के मुसलमान चाहें तो वो भारत मे जहां चाहें रह सकते हैं, क्योंकि वो भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश यानी सेक्युलर देश के रूप में देखना चाहते थे, या फिर नेहरू जी के अतीत के पन्ने शायद इस्लाम से जुड़े थे और उन्हें ये डर था कि भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की स्थिति में उनकी गद्दी डावांडोल हो सकती है।

मुसलमानों तो खुश रखने के लिए इस पर विचार होने लगा कि कश्मीर के मुस्लिम बहुल होने के कारण वहाँ मुसलमानों को कुछ खास किस्म की रियायतें व सुविधाएं दी जाये। 26 अक्टूबर 1947 को जब सभी रियासतों का विलय भारत मे हुआ तो कश्मीर के लिए भी वही शर्तें थी जी बाकी रियासतों के लिए थी। उस समय #370 जैसा कोई प्रावधान नही था,क्योंकी उस समय तक भारत का कोई संवीधान नही था।

जब 1949 में संवीधान का प्रारूप तैयार हो रहा था तो शेख अब्दुल्ला ने नेहरू से कश्मीर के लिए विशेष अधिकारों की बात की उसपर नेहरू ने उन्हें डॉ भीमराव अंबेडकर से मिलने को कहा।

डॉ आंबेडकर ने शुरू में विरोध करते हुऐ कहा की एक ही देश के नागरिकों के लिए अलग अलग अधिकार क्यों कर दिए जाएं। शेख अब्दुल्ला के अभिन्न नेहरू जी ने सरदार पटेल से कहा क्यों ना कांग्रेस की कार्य समिति में ये प्रस्ताव पास करा लिया जाए क्योंकी संवीधान सभा की कार्य समिति के अधिकांश सदस्य कांग्रेसी थे। किंतु कांग्रेस कार्य समिति ने भी इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

बाद में नेहरू जी ने सरदार पटेल पर इसके लिए अत्याधिक दबाव डाला,अंतोगत्वा नेहरू जी की ज़िद के चलते धारा 370 को एक प्रेफ़िक्स के माध्यम से संवीधान में जोड़ा गया जिसमें ये स्पष्ट किया गया कि धारा 370 एक अस्थायी या temperary धारा है जिसे बाद में बदल जायेगा।

किन्तु आजतक 370 एक temeprary धारा होते हुए भी 67 साल से संवीधान से हट नही पा रही?? 67 सालों से इतनी सरकारें आई और गई लेकिन किसी सरकार या राजनैतिक दल ने इसे हाथ लगाने की हिम्मत नही की?

और उसकी वजह ये है कि जब सारा देश व उसकी संवैधानिक शक्तियाँ संसद के दायरे में आती हैं तो धारा 370 कश्मीर को संसद के संवेधानिक अधिकारोँ से परे रखती है। संसद पंगु हो जाती है!!!! यानी जब संसद सारे देश के लिए निर्णय लेती है तो कश्मीर के मामले में वो कोई नियंत्रण नही कर सकती।

बात यहीं तक खत्म नही होती। 370 को अधिक मज़बूत बनाने के लिए एक और धारा 35A भी है जो की एक ही देश के नागरिकों के लिए अलग अलग अधिकार तय करती है ,कश्मीर के नागरिकों के अधिकार कुछ और व बाकी देश के नागरिकों के अधिकार कुछ और!!कश्मीर में 4 पीढी से रहने वाले लोगों को भी शरणार्थी समझा जाता है और उन्हें मौलिक अधिकार नही दिये जाते।

370 व 35A द्वारा ये तय किया जाता है की किसे कश्मीर का स्थायी नागरिक समझा जाये किसे नही। कौन लोकसभा के लिए तो वोट दे सकते है लेकिन विधान सभा के लिए नही!! कश्मीर के किन नागरिकों को सरकारी सुविधाएं मिल सकती हैं और किन्हें नहीं!! जब सारे देश मे minority के अधिकारों की बात होती है तो कश्मीर के पंडितों को minority का दर्जा नही दिया जाता अपितु उन्हें अपनी ही जन्मभूमि से विस्थापित होने पर विवश कर दिया जाता है!!उन्हें ना तो सरकारी नौकरी मिलती है ना ही वो सरकारी स्कूल कॉलेज में पढ़ सकते है ,ना ही सरकारी सुविधाएं ले सकते हैं

सन 1954 में भारत के संवीधान निर्माताओं ने भारतीय संसद तक से ये बात छुपाई व 35A को संवीधान की अधिकतर प्रतियों में भी नही छापा जाता। एक बड़ा धोखा संवीधान निर्माताओ ने देश के साथ किया और लाखों लोगों की जानें इसमें गई।

कानून जानने वाले भी ज्यादातर लोगों को 35A की जानकारी इसलिये नही है क्योंकी ये संवीधान के मूल भाग में ना होकर अप्पेडिक्स में है जिसे 1954 में जोड़ा गया व संसद को इसकी जानकारी नही दी गई।सारे नियमो को ताक पर रखकर सिर्फ राष्ट्रपति के आदेशों से इसे संवीधान में जोड़ दिया गया।

क्या आज भारत का नागरिक संसद व संवीधान की पारदर्शिता पर यकीन कर सकता है? क्या संवीधान बना कर छोड़ जाने वालों की पूजा कर सकता है?

जो कांटे संवीधान में हमारे लिए बोए जा चुके हैं हम उनकी कीमत कब तक चुकाएंगे?

10 वर्ष के लिए चलाये जाने वाले आरक्षण को आज 67 साल बाद निरन्तर चलाया जा रहा है और 370 और 35A जैसे अस्थाई धारा से आज देश डगमगा रहा है किंतु वोट की राजनीती से विवश हंमारे भाग्यविधाता कुछ भी करने में असमर्थ हैं?

Should we speak or should we not ?

अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब समझना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है

यदि आरक्षण का विरोध करो तो आपको दलित विरोधी समझा जाता है!

यदि पाकिस्तान का विरोध करो तो मुस्लिम विरोधी समझ जाता है!

गद्दारों का विरोध करो तो कांग्रेस विरोधी समझा जाता है!

GST व नोटबंदी पर बोल दो तो BJP विरोधी समझा जाता है!

कुरीतियों का विरोध करो तो धर्म विरोधी समझा जाता है!

पुरानी पीढ़ी का विरोध करो तो संस्कार विरोधी समझा जाता है!

नई पीढ़ी का विरोध करो तो नए युग का विरोधी समझा जाता है!

सास का पक्ष लो तो बहू विरोधी समझा जाता है!

बहू का साथ दो तो सास विरोधी समझा जाता हूं!

पत्थर मारने वालों का विरोध करो तो कश्मीर विरोधी समझा जाता है!

देश विरोधी पत्रकारों व TV एंकर का विरोध करो तो आपको सेक्युलर विरोधी समझा जाता है!

बाबाओं के विरोध करो तो अधर्मी समझा जाता है!

सफेदपोशों का विरोध करो तो समाज विरोधी समझा जाता है!

चमचों का विरोध करो तो नेता विरोधी समझा जाता है!

सिस्टम की खामियों का विरोध करो तो संविधान विरोधी समझा जाता है!

कुछ भी बोलो ,कुछ भी लिखो लोग कहीं ना कहीं आपकी गर्दन मरोड़ने को तैयार खड़े रहते हैं!

हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है!!

क्या करें ? बोलें की ना बोलें?

“डेरा झूठा सौदा”

भारत आदिकाल से गुरुओं का देश रहा है जहां बहुत से गुरु हुए जिन्होंने समाज को राह दिखायी लेकिन आज भारत पाखंडी बाबाओं से भरा पड़ा है।

आज से करीब 190 साल पहले राजा राममोहन राय ने समाज के सभी धर्मों में तथाकथित धर्मगुरुओं के बढ़ते हुए आधिपत्य के बारे में कहा था कि श्रद्धालू इश्वेर की शक्ति को ना पहचानकर समाज मे से ही उपजे हुए कुछ लोगों की महत्वकांशा का शिकार हो जाएंगे। इसी कड़ी में औरतें कुछ और आगे बढ़कर उन्हें अपना सर्वस्व तक सौंपने को तैयार हो जाएंगी। ये समाज के पतन का कारण भी हो सकता हैं। (thoughts roughly extracted from “Indias Struggle for Independence” By Bipin Chandra)

राम रहीम, रामपाल,आसाराम,राधे माँ, और ना जाने कितने ऐसे नाम जो जनता को उल्लू बनाने की फैक्ट्रियां चला रहे है और लोग बड़े चाव से उन्हें TV पर ही दंडवत करके जन्म सफल करते रहते है ।

चलिये आपको बाबा कैसे बनते हैं उसकी एक सच्ची घटना बताती हूँ।बात कुछ पुरानी है लेकिन आज देश मे हो रहे ढोंग के व्यपार को मद्देनजर रखते हुए मैं इसे आपसे साझा कर रही हूँ ।

एक यात्रा के दौरान कुछ घण्टे एक बाबाजी का सहयात्री बनने का मौका मिला। वो जमाना मोबाइल रिकॉर्डिंग का नही था सो घटना दिमाग मे ही रिकॉर्ड रही।

उन बाबाजी ने बताया के वो 5 भाई बहन में अपने माँ बाप की सबसे नालायक संतान थे,पढ़ाई में मन नही लगता था,जब तब घर से भाग जाते थे। उनकी 2 ही विशेषता थी कि वो वाकपटु थे और सुरीला कंठ पाया था।

धन के अभाव में कभी मंदिर में तो कभी दुकानों के बरामदे में सो जाते थे। उन्हें किसी भी प्रकार के काम करने में कोई रुचि नही थी सिर्फ घूमना व आवारागर्दी करना पसंद था।

एक बार वो किसी चिलम बाबा के डेरे पर रुके वहां से उन्हें चिलम की लत लग गई। वहां उन्होंने सीखा की कैसे चिलम बाबा सारा दिन जनता को उल्लू बनाते थे। ज्यादातर लोग या तो घरेलू झगड़ों के तंत्र मंत्र कराने आते थे या अधिक अधिक से अधिक धन किस प्रकार प्राप्त हो इसके लिए चरण दबाते थे।

चिलमबाबा भक्तों को चिलम की राख भभूत बता कर बांटते रहते थे। रात में गुरु चेला खूब हंसते थे की किस प्रकार वो लोगों को काठ का उल्लू बनाते थे।

सबसे आसान शिकार घरेलू महिलाएं होती थी।

वहीँ से हमारे इन महाशय को बाबा बनने का आईडिया आया। पहले उन्होंने दाड़ी व बाल इत्यादी बढ़ाये। कई प्रकार की मालाएं पहनी हुलिया बदला। फिर उन्होंने वहां से कुछ दूर एक गाँव को अपनी शिकारस्थली के रूप में चुना।

वहां एक खेत मे पीपल के नींचे चबूतरे पर एक छोटा सा मंदिर बना हुआ था वहीँ डेरा डाला।

2-4 दिन में वो गांव के एक आध लोगों को राम कथा सुनाने लगे। धीरे धीरे रोज़ शाम को मंडली जुड़ने लगी। गांव के घरों से बाबा का भोजन आने लगा। बाबा के लिए कमरा बन गया।

बाबा ने एक दिन कहा की मैं एक हफ्ते तक ध्यान में जाऊँगा व गाँव के कल्याण के लिये भगवान से मिलकर आऊँगा। बाबा कमरे में बंद हो गए उन्होंने अपने एक शातिर चेले के माध्यम से अंदर भोजन इत्यादी की व्यवस्था कर ली। बाबा को ध्यान में देखने के लिए भीड़ जुड़ने लगी। एक हफ्ते बाद बाबा ने बाहर आकर कहा की वो साक्षात भगवान से मिलकर आएं हैं और भगवान ने कहा है की इस गांव में अगर एक भव्य मंदिर का निर्माण होगा व रोज़ भगवत कथा होगी तो भगवान ये इस गांव में आकर बस जाएंगे।

फिर क्या था मंदिर निर्माण के लिए चंदा जुटना शुरू हो गया। लोग हर संभव दान देने लगे। मंदिर का प्रांगण बड़ा हो गया। जिस बिचारे गरीब की ज़मीन थी उसपर सभी तरह का दबाव पड़ने लगा की वो ज़मीन अब भगवान की हो गई और उसके परिवार पर भगवान की कृपा हो गई। स्थानीय नेता भी बाबा के पास आने लगे क्योंकी बाबा अपने भक्तों को जिसे वोट देने को कहेंगे भक्त उसे ही वोट देंगे।

फिर आस पास की जमीनें हड़पने का सिलसिला शुरू हुए क्योंकी अब मंदिर ही नही आश्रम भी बनना था। अब बड़े बड़े सेठ लोग भी उसमे सहयोग देने लगे। बाबा का दरबार लगने लगा। छोटे बड़े सब बाबा के दरबार मे मत्था टेकने आने लगे। भंडारा होने लगा। मंदिर के बाहर दुकाने बन गयी वो भी मंदिर के ट्रस्ट के अधीन थी जिसके मुखिया बाबा व उनके साहूकार चेले थे। कारोबार चल निकला।

फिर एक दिन कीर्तन में बाबा की नज़र एक सुंदर दुखियारी पर पड़ी जिसे बाबा ने एकांत में बुलाया पता लगा पति को नशे की लत थी सो वो लड़कर मॉयके आ गयी थी। बाबाजी की lovestory शुरू हो गई। धीरे धीरे वो सुंदरी, साध्वी में बदल गयी व बाबा की सेवा में आश्रम में रहने लगी। उसका काम महिला श्रद्धालुओं की भीड़ जुटाने का था। सास बहू, पति पत्नी, बांझपन, पुत्र रत्न की प्रप्ति जैसे टोनों के लिए बाबाजी की सेवाएं ली जाने लगी। बाबाजी महिलाओं के भगवान हो गए।

वो हर महिला को कहते थे की सिर्फ वो ही बाबा के लिए बनी है और हर महिला अपने को बाबाजी की चहेती समझने लगी। बाबा की महिला टीम तैयार थी। गाहे बगाहे बाबा जी अपनी चेलियों को स्थानीय पावरफुल लोगों के पास भेजने लगे। जमीनें आश्रम के नाम पर खरीदी जाने लगी। फिर वहां पैसे वाली पार्टियों से product सप्लाई पर पैसा लगवाया जाने लगा। दान व धर्म के नाम पर काला पैसा सफेद करवाने का कारोबार शुरू हो गया। राजनेता भी बाबा की शक्ति को समझने लगे। उनके पैर छूने व आशीर्वाद लेने आने लगे।

बहुत खास लोगों के लिए आश्रम में सुर, सुरा सुंदरी सभी का इंतज़ाम होता था। सबकी बिगड़ी सवारने वाले बाबा जी ने सबसे पहले अपनी बिगड़ी सुधार ली।

कुटिया की जगह बाबा के महल बन गया। एक धूर्त निठल्ला अब भगवान बन गया। लोग उनकी माला, तावीज़ पहनने लगे और उल्लू बनने का सिलसिला चलता रहा।

जब तक हम अपने लालच, लोभ व गलत वृतियों को क़ाबू नही रखेंगे ना जाने ऐसे कितने बाबा हमारी कमज़ोरियों का फायदा उठाते रहेंगे ।