गौमाता

कुछ वर्षों पहले विदेश में एक पार्टी में थी जहां बहुत से अंग्रेज़ व कुछ अन्य धर्मों के लोग भी थे।

बात चलते चलते हिन्दू धर्म व उसकी मूर्ति पूजा पर पहुंच गई।
एक अंग्रेज ने मुझसे सवाल किया की हिंदुओं में गौमांस क्यों वर्जित है?
इस सवाल का जवाब खालिस धार्मिक परिपेक्ष में नही दिया जा सकता था क्योंकी वहाँ मौजूद बहुत से लोग हिन्दू धर्म व उसकी मान्यताओं से अनभिज्ञ थे।

उन्हें सिर्फ यह कहकर की गाय कामधेनु है, या शंकर भगवान नन्दी बैल पर सवार हैं या गाय समुद्र मंथन से निकले रत्नों में से एक हैं, संतुष्ट नही किया जा सकता था।

यह बात मुझे उन्हें एक और दृष्टकोण से समझानी पड़ी की,” हज़ारों सालों से भारत कृषि प्रधान देश है और गाय हमारी कृषि के लिए बहुमूल्य है,जिसके हर अवयव से कोई ना कोई लाभ है।

खेत जोतने से लेकर खाद बनाने तक, दूध देने से लेकर चमड़ा उत्पादित करने तक हर जगह गाय बहुमूल्य थी तो कैसे हम सबसे ज्यादा लाभप्रद पशु को सिर्फ आहार के लिए मार सकते थे जबकि कृषि द्वारा उत्पादित अनगिनत पदार्थ हमारे भोजन के लिए उपलभ्ध थे।

इसके अतिरिक्त एक बच्चा ज्यादा से ज्यादा 2 वर्ष तक माँ के दूध पर पोषित हो सकता है उसके बाद जीवन भर गाय के दूध से उसे पौष्टिक तत्व मिलते हैं इस स्थिति में मां के बाद यदि कोई हमे जीवन भर अपने दूध से सिंचित करता है तो वो सिर्फ गाय है इस हिसाब से भी गाय हमारी माँ है और दुनिया का कौन सा बच्चा अपनी माँ को काट कर खायेगा?

गाय हिंदुओं की ही नही हर उस शख्स की माँ है जिसने कभी ना कभी गाय का दूध पिया है।

गाय सारे विश्व् के लिऐ माँ समान है क्योंकी गाय ना होती तो दूध जैसा अमृत ना होता। गोबर जैसी लाभकारी खाद ना होती। गौमूत्र जैसा एंटीसेप्टिक ना होता।

यदि अब भी आप लोग नही समझे कि हिन्दू धर्म कितना गहरा व गूढ़ है तो आप लोग हिन्दू धर्म को कभी नही समझ सकते क्योंकी हमारे यहां कुछ भी तथ्यविहीन नही है।”

यह सुनकर पूरी सभा मे सन्नाटा छा गया। बाद में बहुत से लोगों ने मुझसे आकर कहा कि उन्होंने कभी गौमांस भक्षण को इस नज़र से नही देखा था और उन्होंने गाय का माँस छोड़ने की प्रतिज्ञा की।

हमे यदि अपने धर्म की रक्षा करनी है, उसे मान सम्मान दिलाना है तो सबसे पहले उसे खुद समझना होगा।

ना शब्दों में उलझे ना रिवाज़ों में उलझें
सिर्फ गहरे में जाकर समझना होगा की वो क्या है, क्यों है और कैसे है।

जब कोई आपसे आपके धर्म के बारे में कुतर्क करे तो आपके अंदर इतनी काबलियत व जानकारी होनी चाहिये की आप उसके कुतर्कों को अपने तर्क से ध्वस्त कर सकें। तब ही आप अपने धर्म को सम्मान दिला पायेंगे।

Valmiki Or Hanumaan

जब वाल्मीकि जी ने अपनी रामायण पूरी की नारद जी को दिखाने के लिये ले गये। नारद जी उससे बहुत प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने कहा, ‘तुमने अच्छा तो लिखा है, लेकिन हनुमान की रामायण तुम्हारी रामायण से कहीं सुंदर है’।

‘हनुमान जी ने भी रामायण भी लिखा है!’, वाल्मीकि जी को ये जानकर चकित हो गये, और यह सोचकर कि हनुमान जी की रामायण किस प्रकार उनकी रामायण से बेहतर है,जानने हेतु वो हनुमान जी की लिखी रामायण को ढूँढ़ने लगे!

कदली-वन के एक झुरमुट में ढूँढते हुए , उन्होंने पाया कि हनुमान जी ने अपनी रामायण को केले के पेड़ के सात व्यापक पत्तों पर अंकित किया था।

उसने इसे पढ़ा और पाया की व्याकरण और शब्दावली, रचना और माधुर्य की दृष्टी से हनुमान जी द्वारा लिखित रामायण उनकी रचना से कहीं ज्यादा सुंदर थी और उसे पढ़ते पढ़ते वो रोने लगे।

‘क्या मेरी रामायण इतनी बुरी है?’ हनुमान जी ने पूछा

वाल्मीकि ने कहा, ‘नहीं, यह बहुत उत्तम है!”

‘तो आप रो क्यों रहे हैं मुनिवर ?’ हनुमान जी ने पूछा

‘क्योंकि आपकी रामायण पढ़ने के बाद कोई भी मेरी रामायण पढ़ना नहीं चाहेगा,’ वाल्मीकि जी ने उत्तर दिया।

सुनते ही हनुमान जी ने सात केले के पत्तों को तोड़ दिया, “अब कोई भी हनुमान की रामायण को नहीं पढ़ेगा।”

हनुमान जी ने कहा, ‘मुनिवर आपको अपनी रामायण की ज़रूरत मेरी लिखी रामायण से कहीं अधिक है आपने रामायण लिखी है ताकि दुनिया वाल्मीकि को याद रखे; मैंने अपना रामायण लिखा था ताकि मैं राम याद रख सकूं। ‘

ठीक उसी पल में वाल्मिकी को एहसास हुआ कि वो उन्होंने रामायण स्वयं को स्थापित करने के लिए लिखी और वो अपनी रचना के माध्यम से प्रसिद्ध होना चाहते थे।

उन्होंने रामायण की रचना अपने विचारों को सत्यापित करने के लिए की।ना कि राम के प्रति प्रेम के लिये। उन्होंने रामायण लिखी जिस्से उनका नाम अमर हो जाये ना कि राम के प्रेम व भक्ति में सरोबार होकर ।वाल्मिकी ने रामायण लिखकर अपने लेखन को सिद्ध किया

और हनुमान!! रामजी उनका जीवन थे और रामायण उनकी भक्ति थी।

वाल्मिकी की रामायण उनकी महत्वाकांक्षा का एक उत्पाद था; लेकिन हनुमान जी की रामायण उनके राम के प्रति स्नेह का एक उत्पाद था।

यही कारण है कि हनुमान जी की रामायण वाल्मिकी की रामायण से कहीं ऊपर थी । क्योकि “राम से बड़ा … राम का नाम है!”

आज भी हमारे समाज मे हनुमान जैसे लोग हैं जो प्रसिद्ध नहीं बनना चाहते हैं वो निरंतर बिना कामना के अपना कर्म करते रहते हैं और अपने उद्देश्य को पूरा करते हैं।

जीवन मे जो लोग आपकी सफलता के हिस्सेदार हैं उनके कंधों पर पैर रखकर सीढ़ी ना चढ़ें।

आज के युग मे काम से ज्यादा काम का ढिंढोरा है। हर इंसान ये सिद्ध करने में लगा है कि वो दूसरे से बेहतर है।

बहुत से ऐसे प्रोग्रामों में जाती हूँ जहां ये दिखाने की गलाकाट प्रतियोगिता चलती रहती है कि जैसे सारे आयोजन मंच पर बैठे लोगों ने ही किया है।

जो व्यक्ति भाषण लिखकर देता है उसके शब्द ही वक्ता को तालियां दिलवाते हैं।लेकिन एक बार भी बोलने वाला भरी सभा मे उस गुमनाम लेखक का नाम नही लेता।

जीवन के हर क्षेत्र में होड़ लगी है है कि किस प्रकार अपने को बेहतर सिद्ध कर सकें। उत्पाद से ज्यादा उसकी पैकेजिंग पर तमाम ज़ोर रहता है। एक संकीर्ण सी मानसिकता चहूं ओर व्यपात है।

हमे वाल्मीकि की तरह नहीं बनना जो सिर्फ ये समझते रहें कि हमारी “रामायण” ही उत्कृष्ट है।

हमारे जीवन में बहुत सारे “हनुमान” भी हैं …

बहुत से ऐसे लोग हैं जो चुपचाप अपना काम कर रहें हैं ..बिना हेडलाइंस बने। जरूरी नही किसी नेता या VIP के साथ सेल्फी या अखबार में छप जाने से आपकी अहमियत बढ़ गई है।

याद रहे प्रसिद्धि की चाह से रामायण लिखने वाले वाल्मिकी सिर्फ पन्नों पर छपते हैं ..और राम की निष्काम सेवा करने वाले हनुमान घर घर मे पूजते हैं।

Kalyug ke Lakshan

बात तबकी है जब चारों पांडव व कृष्ण आखेट को गये, उनके साथ युधिष्टिर नही थे।
संध्या समय सभी बैठे विचार व चर्चा कर रहे थे तभी नकुल ने श्री कृष्ण से पूछा

“ये कलयुग क्या हूं व कलयुग कैसा होगा?”
बाकी तीनो पांडव भी यह जानने को उत्सुक हो गये।
श्री कृष्ण मुस्कुराये और कहा कि यह जानने के लिए तुम्हे एक कार्य करना होगा। श्री कृष्ण ने धनुष व तीर उठाये व चारों दिशाओं में एक एक तीर छोड़ दिया। फिर उन्होंने चारों पांडवों से चारों दिशाओं में जाकर तीर वापस लाने को कहा।
पांडव चारों दिशाओं की ऒर निकल गये।
जब अर्जुन तीर उठाने लगे तो उन्होंने पीछे से कोयल की आवाज़ सुनी उन्होंने मुड़ कर देखा तो एक कोयल मीठे सुर में कुहुक रही थी किन्तु वह जमीन में पड़े एक घायल खरगोश का माँस भी खा रही थी।खरगोश अत्यधिक पीड़ा में था। अर्जुन आश्चर्य से भर गये की इतना मीठा गाने वाली कोयल इतना घृणित कार्य कैसे कर रही थी।वो तीर उठा कर वापिस चल दिये।

भीम जहाँ गये वहां एक कुँए को घेरे हुए चार कुँए थे। उन चारों कुओं से मीठा पानी बाहर छलक रहा था क्योंकि वो पानी से लबालब भरे हुए थे,किन्तु फिर भी उनका पानी बीच के खाली सूखे कुऐ की और नही जा रहा था। भीम ने तीर उठाया और लौट पडे।

सहदेव जैसे ही तीर उठाने लगे जो की एक पर्वत के पास पड़ा था अचानक उस पहाड़ से एक बड़ी चट्टान लुढ़कने लगी ,वह अपने रास्ते मे आने वाले पेड़ों व छोटी चट्टानों को कुचलती हुई नीचे आ रही थी अचानक वह भूमि पर उगी हुये एक छोटे से पौधे की आड़ से रुक गयी। सहदेव विस्मय से भरे हुए लौटने लगे।

नकुल ज्यों ही तीर उठा कट मुड़ने लगे उन्होंने देखा की एक गाय बछड़े को जन्म दे रही है,बच्चा जन्मने के बाद वह उसे चाटकर साफ करने लगी बछड़ा कुछ देर में साफ हो गया किन्तु फिर भी गाय उसे निरंतर चाटती रही।यहां तक की बच्चे की कोमल त्वचा छिल गई और उसमें से खून निकलने लगा। लोगों ने बड़ी मुश्किल से गाय को बछड़े से अलग किया। नकुल गाय जैसी पवित्र जानवर के इस व्यवहार से चकित थे।
चारों पांडवों ने लौट कर श्री कृष्ण को अपना अपना अनुभव बताया तथा उनसे इनका अर्थ पूछा।

श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया:

जो अर्जुन ने देखा उसका अर्थ है कलयुग में बहुत से संत अपनी वाणी से लोगों को आकर्षित करेंगे व मीठे वचन बोलकर लोगों में भ्र्म पैदा करेंगे किंतु असल मे वो अपने भक्तों का शोषण करेंगे वैसे ही जैसे कोयल खरगोश को खा रही थी।

जो भीम ने देखा उसका अर्थ है की कलयुग में कुछ लोगों के पास अथाह संपति व धन होगा जिसे वो तरह तरह के दिखावों पर ख़र्च करेंगे किन्तु उसी समाज मे रह रहे निर्धन व पीड़ितों की मदद नही करेंगे जिस प्रकार मीठे कुँए अपना पानी सूखे कुँए को नही दे रहे थे।

जो सहदेव ने देखा उसका अर्थ है कलियुग में लोगों शक्तिशाली लोगों के चरित्र का इतना पतन होगा की उस रास्ते मे वो कितनो को कुचल देंगे वो नही जानते किन्तु अंत मे सिर्फ इश्वेर ही किसी प्रकार उनके दुष्कर्मों का अंत करेगा जैसे उस छोटे से पौधे ने चट्टान को रोक दिया था।

और अंत मे नकुल ने कहा “भगवान गाय को तो हम माता मानते हैं उसने कैसे अपने बछड़े को आहत किया?”
श्री कृष्ण ने कहा -कलयुग में मातापिता अपने बच्चों को दुलार में इतना बिगाड़ देंगे की उस दुलार से उनके बच्चों का बहुत नुकसान होगा। लोग ज़रूरत से ज्यादा अपने बच्चों को मुहैया कराएंगे जिससे उनके बच्चे आत्मनिर्भर नही होने पाएंगे।
क्या आज यही सबकुछ हमारे इर्दगिर्द नही हो रहा?
गली गली में बाबाजी लोग दुकान लगाए लोगों को लूट रहे हैं। TV पर पाखंडी जन  लोगों में भय डालकर अंगूठियां,यंत्र व ताबीज़ बेच रहे हैं। पूजाओं व कष्ट निवारण के नाम पर पैसे ऐंठे जा रहे हैं।
कुछ लोगों के पास इतना धन है की वो नोटो के बिस्तर पर सोते हैं जैसे की हंमारे भृष्ट नेता अरबो खरबों रुपिया खर्च करते हैं सिर्फ अपने ऊपर ..किन्तु किसी गरीब का उद्धार उस पैसे से नही करते। पैसों से गुंडे पालते हैं किंतु गरीब को एक निवाला नही देते।
चरित्र का इतना पतन है की बलात्कार,खून ,अपहरण कुछ भी करवा देते हैं। पुलों में मिलावट से हज़ारों लोग उनके नीचे दबकर मर जाते हैं।अरबों का घपला करते हैं फिर या तो किसी लाइलाज बीमारी से मरते हैं,या जेल में सड़ते हैं नही तो उनकी संताने निक्कमी निकल आती हैं।
बच्चों को अत्यधिक दुलार का नतीजा की वो ज़िम्मेदारी से बचते हैं। माँ बाप बेटे को ऊपरी कमाई लाने पर पीठ ठोकते हैं ,चाहे रिश्वत से हाँसिल करें किन्तु बच्चोँ को महंगे मोबाइल, बाइक व कपड़े दिलाएंगे और फिर बच्चों में भी वही संस्कार आयेंगे। पैसे की ज़रूरत होने पर यही बच्चे गलत काम करने से नही हिचकेंगे।

हर बीमारी अपने लक्षणों से जानी जाती है ,लक्षण जान लेने पर उसके इलाज़ करने में सुविधा होती है यदि हम भी कलयुग के इन लक्षणों को जान गए हैं तो उसका उपचार संभव है