China Effect

मेरे प्रिय भारतवासियों

हम संख्या में चीन से कुछ ही पीछे हैं लेकिन दुनिया फतह करने में बहुत पीछे।

जब हम make in india , made in india , मेरा भारत महान, भारत मेरी जान में उलझे पडें है चीन अपने पंजे छोटे से छोटे देश मे फैला चुका है। कोई देश चीन से अछूता नही है। चीन की जड़ें बहुत गहरी फैल चुकी हैं।

वो भारत के गणेश लक्ष्मी और दिये भी बना रहा है, और रूस के फूलदान भी, वो अफ्रीका के ज़ेबरा भी बना रहा है और हॉलैण्ड के नकली टूलिप्स भी, वो samsung को मात करते नकली फ़ोन भी बना रहा है और Hyundai को मात करने वाली Cherry कार भी।

जब हम प्रजातंत्र, साम्यवाद, मार्क्सवाद में उलझे हैं चीन पूंजीवाद के पिछले दरवाजे से घुस कर अपना स्थान बना चुका हैं।

इतने देशों में घूम चुकी हूं लेकिन हर देश मे एक ही चीज कॉमन मिली .. चीन!!!

हम हनी सिंह से लेकर अमिताभ बच्चन ..
विराट से लेकर रजनीकांत में उलझे हुए हैं और चीन एक ऑक्टोपस की तरह दुनिया मे अपने पंजे फैला चुका है।

दिल्ली के पराठें इम्फाल में नही पहुंचते, महाराष्ट्र की सौल कढ़ी बलिया में नहीं पहुंच पाई लेकिन चाऊमीन हर जगह है।

जितना आप अपने देश के बारे में नही जानते उससे ज्यादा चीन आपके प्रदेशों के बारे में जानता है।

चीन ये भी जानता है कि दिवाली में आप गणेश लक्ष्मी खरीदते हैं और होली में पिचकारी , क्रिसमस में बिजली की लड़ और वास्तु का पिरामिड । लेकिन आप नही जानते की चीन में नया साल कब होता है?

वास्तु छोड़कर आपने फेंगशुई पकड़ लिया है और चावल छोडक़त फ्राइड राइस?

प्लीज ये bjp, कांग्रेस, बसपा, सपा से बाहर निकल कर अपनी अस्मिता के बारे में भी सोचना शुरू करिये वरना दुनिया की दूसरी बड़ी जनसंख्या होकर भी आप कद्दू बन जाएंगे ।

मैंने जो देखा समझा दिया आगे आपकी मर्जी!

Children of Lesser Gods

जिस प्रकार हमारे गौ रक्षक भाई ढूँढ ढूँढ कर गौ तस्करों को पकड़ते हैं और गौ माता की रक्षा करते हैं उसी प्रकार का एक प्रयास यदि अबोध व मासूम बच्चों की तस्करी को रोकने के लिए करें तो बहुत से मासूम नर्क जैसा जीवन भोगने से बच जायेंगे

भारत मे करीब 2लाख लोगहर साल मानव तस्करी काशिकार होते हैं, जिसमे से तकरीबन 10% ही विदेशों में भेजे जाते हैं बाकी लोग अपने ही देश मे अपने ही लोगों के द्वारा खरीदे बेचे जाते हैं।

हर 8 मिनट पर एक बच्चा अगवा होता है ,40000 से भी ज्यादा बच्चे हर साल मानव तस्करी का शिकार हो जाते हैं। 3लाख से ज्यादा बच्चे सड़कों पर भीख मांगने पर मज़बूर कर दिये जाते हैं।मानव तस्करी एक ऐसा क्षेत्र है जिससे दुनिया जूझ रही है किन्तु भारत मे इसकी वजहें बहुत ही विस्तृत हैं।

गरीबी इनमे से एक प्रमुख कारण हैं, धिक्कार है हम भारत की जनता पर जहां भूख की वजह से मासूम बच्चे बिक जाते हैं। कैसा दुर्भाग्य है कि भूख माँ बापों को अपना बच्चा बेचने पर मजबूर कर देती है।

मानव तस्करी में 50% से भी ज्यादा बच्चे होते हैं और उनमे से तकरीबन 80% लड़कियाँ होती हैं।

आज भी हमारे देश मे सब्जी की तरह इंसान बिकते हैँ और हम समृद्धि व तकनीकी विकास की बातें करते रहते हैं!

75 से 80 प्रतिशत मानव तस्करी सेक्स व्यापार के लिए होती है जहां छोटी बच्चियों को वो अमानवीय प्रताड़ना दी जाती जिसके बारे में आप सोच भी नही सकते। देश के कुछ हिस्सों में छोटी बच्चियों को देवदासी जैसी घिनोनी प्रथा का शिकार बन आजीवन वैश्यावृति के लिए झोंक दिया जाता है।ये वही देश है जहां छोटी छोटी बच्चियों में देवी माँ का रूप देखा जाता है।

बहुत से बच्चे मजदूरी व घरेलू नौकर का काम करने के लिए बेचे जाते हैं। एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर 9 साल का एक मासूम बच्चा नौकर का काम करता देखा, पूछने पर उसने बताया कि उसकी तनख्वाह से घर पर उसकी माँ उसके 6 साल व 3 साल के भाइयों को पालती है। अगले साल उसका भाई भी उसके साथ आकर काम करने लगेगा। ये हाल है गरीबों के हितों के बारे में राजनीति करने वालों का। बड़े बडे सरकारी अफसर भी छोटे बच्चों को घरेलू नौकर बनाकर रखने से नही चूकते।

सबसे ज्यादा खौफनाक व्यापार है बच्चों के अंगों के व्यापार का। ये धंधा इतने ऊंचे पैमाने पर चलता है कि कल्पना नही की जा सकती। सोने की खान है ये धंधा!! जहाँ एक मासूम शरीर के अंगों को इसी प्रकार बेचा जाता है जैसे बकरे के शरीर के अंगों को।

हम गौ माता के लिए, पक्षियों के लिए, वृक्षों के लिए, पर्यायवरण के लिए इतनी लड़ाई लड़ रहे हैं किंतु जीते जागते इंसानों को बिकने से नही रोक पा रहे?

जिस प्रकार हमारे भाइयों की सतर्क आंखे गौ माता का व्यापार करने वाले निकृष्ट लोगों को भांप लेती हैं यदि उसी प्रकार मासूम बच्चों का व्यापार करने वाले राक्षसों को भी वो पकड़ने लगें तो शायद सारी मानवता उनकी ऋणी हो जायेगी।

यदि हम गौ माता की सुरक्षा के लिए गौ रक्षकों की टीम बना सकते हैं तो हमारे ही देश के मासूम बच्चों की रक्षा के लिए बाल रक्षकों की टीम क्यों नही बना सकते?

ये एक ऐसा क्षेत्र है जहां कानून पूर्णतया कारगर नही हो पाया क्योंकी ऐसे केसों की जानकारी नही हो पाती। जब तब सामाजिक रूप से चेतना नही आएगी तब तक समस्या से निबटना मुश्किल हैं।

सबसे पहले हमें भीख देने की वृत्ति से मुक्ति पानी होगी। जब लोग भीख देना बंद कर देंगे तो इन बच्चों को भीख मांगने के लिए इस्तेमाल होना बंद हो जाएगा।

यदि अपने आस पास किसी बच्चे को घर या दुकान में काम करता देखें तो संबंधित विभाग में गुमनाम शिकायत भेजें।

यदि कहीं कोई डरा सहमा बच्चा संदिग्ध अवस्था मे दिखे तो तुरंत पुलिस को खबर करें।

देवदासी जैसी प्रथा भी सती प्रथा व बाल विवाह जैसी अमानवीय है इसका सामाजिक बहिष्कार करना होगा

ये वही भारत है जहां लोग कहते हैं कि

* बच्चों में भगवान बसता है*

लेकिन इन्ही बच्चों में जिनके अंदर भी भगवान बसता है उनसे हम घरों में झाड़ू पोछा कराते हैं, होटलों में झूठे बर्तन मंजवाते हैं, उनसे भीख मंगवातें हैं, उनसे वेश्या वृति कराते हैं, उन्हें अपराधी बनाते हैं, आतंकवादी बनाते हैं, उनके शरीर के अंग बेचते हैं ,उनपर अत्याचार करते हैं।

और सोचते हैं हम पाप के भागी नही!!

भगवान सिर्फ मंदिरों में ही नही इंसानों में भी बसते हैं इंसानो में बैठे भगवान को भी पूजिये,उससे प्यार करिये।

जिस देश मे बच्चे सुरक्षित हों उस ही देश का भविष्य भी सुरक्षित होता है।

Padmavati “The Black Chapter”


संजय लीला भंसाली की अगली फिल्म की स्क्रिप्ट होनी चाहिये #अल्लाउदीन खिलजी की नाज़ायज़ बेटी की प्रेम कहानी!

अल्लाउदीन की बेटी #फ़िरोज़ा जालौर के युवराज #बीरमदेव की बहादुरी देख कर लट्टू हो गई और बीरम देव से शादी की ज़िद ठान ली।

अल्लाउदीन की धमकियों के बावजूद वीरमदेव ने फ़िरोज़ा से शादी करने से इनकार कर दिया क्योंकी अल्लाउदीन ने उससे धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव रखा था।

यहां तक की वीरमदेव ने अल्लाउदीन के सिपालसलाहर #उलुग खान से सोमनाथ के मंदिर से लूटा हुआ शिवलिंग भी छीन लिया।

खिसियाये हुए अल्लाउदीन ने अपने ख़ास सेनानायक *कमालुद्दीन गुरग को जालौर पर आक्रमण करने भेजा व वीरम देव की सेना ने 2 वर्ष तक युद्ध करने पर भी हार नही मानी व शहीद हुए, सैंकड़ों वीरांगनाओं ने जौहर किया।

#संजयलीलाभंसाली जी अब एक फ़िल्म लुटेरों की अवैध बेटी के इस प्रेमप्रसंग पर हो जाये!!

और उसके बाद भी यदि आगे फ़िल्म बनानी हों तो भारत को लूटने वालों आक्रमणकारियों पर आपको बहुत सी कहानियां मिल जाएंगी।

मुहब्बत की इंतिहा के प्रतीक #शाहजहां को अपने बाप #जहांगीर से हज़ारों रखैलें विरासत में मिली थी, उनपर फ़िल्म बनाइये

शाहजहां के दरबार मे हिन्दू स्त्रियों को सरेआम बेचने के लिए मीनाबाजार लगता था।!उसी परम्परा के चलते दिल्ली में GB रोड जैसा red light area बना।

इसपर भी एक फ़िल्म बनाइये!!

एक और बड़ी दिलचस्प प्रेमकहानी है आपके लिए। प्रेम के पुजारी शाहजहां ने “मुमताज महल” उर्फ “अर्जुमंद-बानो-बेगम” के पति “शेर अफगान खान”जो कि शाहजहां की सेना में सूबेदार था उसकी हत्या करके उससे अपनी बेगम बनाया ।और मुमताज़ उसकी पहली या आखरी बीबी नही थी।उसने मुमताज़ के मरते ही कुछ ही दिनों में उसकी बहन फरज़ाना से निकाह कर लिया था।

इसी शाहजहां पर उसकी अपनी बेटी “जहाँआरा” के साथ भी संबंध रखने के आरोप लगते रहे थे।यहां तक की उसने जहाँआरा की शादी तक नही होने दी। इस बाप बेटी के रिश्ते के ऊपर प्रेम कहानी पर एक फ़िल्म बनाइये क्योंकी हम इसी *शाहजहां* के #ताजमहल पर, मुहब्बत के कसीदे पढ़ते हैं!

लीजिये एक और महानता की कहानी है जब महान
अकबर ने हज़ारों हिंदुओं के सर काटकर नरमुंडों से मीनारें बनाई थी!!(अकबरनामा पढ़िए) इसी अकबर ने कभी अपनी बेटियों का ब्याह नही होने दिया!!
यही अकवर शिकार के लिए जिंदा गुलामों को दौड़ा दौड़ाकर उनका शिकार करता था।
#चित्तौड़ की पराजय के बाद महारानी #जयमाल ने अपनी 12000वीर क्षत्राणीयों के साथ जौहर किया क्योंकी उन्हें अकबर की गुलामी मंज़ूर नही थी।

इसी महान अकबर की कुदृष्टि वीर विधवा रानी #दुर्गावती पर भी थी किन्तु रानी ने अकबर के हरम में जाने के स्थान पर अपनी जान देना गौरवपूर्ण समझा।

ये वही अकबर महान है जिसे लोगों ने #जोधाबाई से प्रेम करते देखने के लिए 200 रु के टिकिट खरीदकर #जोधाअकबर देखी।

बात निकलेगी तो फिर दूर तक जाएगी।

बडी हैरानी की बात है आपको #लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना पर फ़िल्म बनाने की प्रेरणा नही मिलती?

#पन्नाधाय पर फ़िल्म नही बनाते?

आप महारानी #तपस्विनी जो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की भतीजी और बेलूर के जमींदार नारायण राव की बेटी थी व उनकी वीरता की प्रसिद्धि भी दूर-दूर तक थी। उनपर फ़िल्म बनाने का विचार नही आया?

आप रानी दौपडीबाई पर फ़िल्म नही बनाते?

आप फिल्मकारों की creativity इतिहास की काली कथाओं को प्रेमकहनियों में तब्दील करने में ही क्यों खर्च होती है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हमें पराधीन रखने वालों को आप हीरो बना देते हैं!

फिर चाहे वो #मुगलेआज़म हो या फिर #रज़ियासुल्तान की प्रेमकथा!! फिर वो जोधा-अकबर की राजनैतिक शादी को प्रेमकथा बनाना हो या #पद्मावती को घूमर कराना!

आप लोग अपनी crativity के जनून में इतिहास के काले पन्नों की सुनहरी फिल्मे बनाते रहते है

आपकी जैसी सोच ही है जिसने देश मे घुसने वाले लूटेरों व आक्रमणकारियों को हीरो बन दिया।

ऐसी कहानियां कलाकार की कल्पना नही बल्कि उनका फितूर होती हैं।

यदि करोड़ों भारतवासी आपकी बनाई “ब्लैक” जैसी उम्दा फ़िल्म की सराहना करते हैं, तो उन्हें पद्मावती मत परोसिये। बॉक्स आफिस से ऊपर उठकर ,कुछ बेहतर दीजिये।

हमारा इतिहास गौरव गाथाओं से भरा पड़ा है एक आध फ़िल्म उसपर भी बनाइये संजय लीला भंसाली जी !

Living life the right way

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एक बार एक राजा ने अपने तीन ख़ास मंत्रियों को बुला एक एक थैला दिया और उन्हें वन में से फलों को भर कर लाने को कहा।

पहले मंत्री ने सोचा कि राजा को अच्छे व ताज़े फल पाकर खुशी होगी सो उसने चुन चुनकर ताज़े व बढ़िया फलों से थैला भर लिया।

दूसरे मंत्री ने सोचा राजा को इतनी व्यस्तता में कहां इतनी फुरसत होगी कि वो थैले के फलों को एक एक कर देखेगा। सो उसने अच्छा ,बुरा जो फल पाया थैले में भर लिया।

तीसरे मंत्री ने सोचा कि राजा सिर्फ यही तो देखेगा कि किसका थैला बड़ा है, इसलिये उसने अपने थैले में कूड़ा करकट व पत्थर भर लिए।

तीनो दरबार मे पहुंचे।

लेकिन ये क्या??

राजा ने बिना कुछ देखे तीनों को कारागार में डालने की आज्ञा दे दी और कहा अगले एक महीने तक जो कुछ उन्होंने अपने थैले में जमा किया है उससे अपना पेट भरें।

पहले मंत्री ने आराम से महीना गुजार लिया।
दूसरे मंत्री ने कुछ दिन अच्छे फल खाये फिर सडे फल खाकर किसी तरह जीवन बचाया।
तीसरे मंत्री के पास जीवन बचाने के लिए कुछ नही था। कूड़ा व पत्थर खाने से जीवन कैसे बचता?

जीवन के आखरी चरणों मे जो शुरुआती समय में जमा करते हैं वही काम आता है।

प्रत्यक्ष में जब हम दूसरों के जीवन,सफलता व सम्पन्नता से रश्क करते है तो ये नही जानते कि उनके अंत से ही उनके जीवन मे किये गए कर्मों का अंदाज़ा हो जाता है….

वरना कोई महात्मा क्यों किसीकी गोली से मरता?

क्यों दुनिया पर राज करनेवाले अपने ही अंगरक्षकों की गोली से छलनी होते?

क्यों दूसरों के मुँह से निवाला छीनने वाले आखरी क्षणों में नलियों के सहारे जीने की कोशिश करते हैं ?

क्यों दूसरों के बेटों के हाथों में बंदूम देनेवालों के बेटे उनके ही घरों को आग लगा देते हैं?

क्यों नारी जाति को वस्तु की तरह इस्तेमाल करने वाले किसी औरत की ही वजह से जेल की सलाखों के पीछे सड़ते हैं?

क्यों नोटों के बिस्तर पर सोने वाले मृत्यु को उन्ही नोटों से नही खरीद पाते?

क्यों ईमान बेचने वालों को उन्ही का कोई विश्वासपात्र चन्द रुपयों के लिए धोखा देता है?

भीष्म पितामह को भी गलत पक्ष का साथ देने की सज़ा तीरों की शैया पर लेटकर भुगतनी पड़ी।

सदाचारी युधिष्टर की एक गलती ने उनकी पत्नी व भाइयों को अपमान की स्थिति में पहुंचा दिया!

जो कमाई जीवन के पहले हिस्से में जोड़ेंगे वही बाद के हिस्से में खर्च करने को मिलेगी।

ना अकूत पैसा ना बेशुमार ताक़त आपके अच्छे जीवन की गारंटी दे सकती है।

कोई गलत रास्ता आपको सही मंज़िल तक नही पहुंचा सकता।

ज़रा सोच के जोड़ना!!

क्योंकि जो जोड़ रहे हो बाद में उसी से काम चलाना पड़ेगा

Smog

दिल्ली वालों की आँख जल्दी से नहीं खुलती। कभी डेंगू ,कभी चिकनगुनिया, और आज ये आलम है क़ि धुंए व प्रदूषण से उठने वाला कोहरा जानलेवा साबित हो रहा है।

इन सबकी वजह प्रकृति के साथ हो रहा खिलवाड़ है। सीमेंट के जंगल बनाने के चक्कर मे पेड़ों के जंगल काट दिये। ज़मीन में उगने वाले वृक्षों का स्थान गमलों में उगने वाले फूलों, व बोन्साई ने ले लिया।

दक्षिण दिल्ली के अमीर रिहायशी घरों में जहां 10 AC चलते हैं प्राकृतिक हवा की इंच भर भी गुंजाइश नही है।

दिल्ली को प्रदूषण नही लालच मार रहा है। 150वर्ग ग़ज़ के टुकड़े पर भी बहुतल्ला इमारत बन जाती है। तीन पुश्त पहले जो बड़े बड़े घर होते थे आज संतानों ने पैसे के लालच में बिल्डरों को बेच दिया और एक एक फ्लैट लेकर जमीन के टुकड़े कर दिए।

घर छोटे होते गये और गाडियाँ बड़ी होती गई। बाबुजी के घर की जगह 3BHK ने ले ली। कपड़े बालकनी की रेल में सूखने लगे और तुलसी खिड़की में। जहां बच्चे आंगन में खेलते थे वो अब बन्द कमरे में वीडियो खेलते हैं।

एक बड़ी अम्बेसेडर गाड़ी में सारा कुनबा घूम लेता था अब हर सदस्य को गाड़ी चाहिये। धूप व आसमान के दर्शन अब खिड़कियों से भी नही होते!!!

हवा बस पार्क व शहर के बाहर मिलती है। अब हंसी के लिए भी पार्क में इकट्ठा होकर बिना मतलब हां हा करना रह गया है।

ऊंची छतों वाले दफ्तरों की जगह कॉर्पोरेट बिल्डिंग में दड़बों में बन्द कबूतर जैसे लोगों ने ले ली। बस टकटकी बांध कंप्यूटर पर झुके रहते हैं।

बिल्डिंग में लिफ्ट इस्तेमाल करते हैं और gym में सीढी वाले स्टेपर पर सीढ़ी चढ़ते हैं। घर से बाहर कदम रखने के लिए गाड़ी चाहिये और gym में 3000 रु महीना देंकर साईकल चलाते हैं। सामान ट्राली में ढोते हैं और gym में 50 किलो का बेंचप्रेस करते हैं।

पीने को पानी बोतल मे लेकिन हर बिल्डिंग की छत पर स्विमिंग पूल होते हैं।

अब भाई इसकी कोई तो कीमत दिल्ली वालों को देनी पड़ेगी। सरकार कोई भी आ जाये क्या दिल्ली वाले गाडियाँ छोड़कर साईकल चलाएंगे? क्या घरों को तोड़कर बिल्डिंगे बनाना बंद करेंगे? क्या पार्किंग की जगह से गाड़ियां हटाकर पेड़ लगाएंगे? क्या मॉल्स को हटाकर शहर से बाहर करेंगे?

Odd-even is not God given .. कोई भी सरकार जादू का डंडा घुमाकर प्रदूषण दूर नही कर सकती!!प्रदूषण लोग करते है सड़कों पर गाड़ियां बढ़ाकर, छोटी जगहों में जरूरत से ज्यादा इंसान ठूँसकर!! गगनचुम्बी इमारतें बढ़ाकर!!

यूरोप के बहुत से देशों में लोग सूट टाई पहनकर साईकल से दफ्तर जाते हैँ। मेट्रो व पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं। प्लास्टिक व कचरे पर रोक रखते हैं।

खाड़ी देशों में जहां निरा रेगिस्तान है हज़ारों पेड़ रोज़ लगाये जा रहे हैं। पानी खर्च करने पर महंगा बिल देना पड़ता है। पानी भी बिजली की तरह ही महंगा है। महंगी पार्किंग हैं। drip irrigation के द्वारा sewage का सारा पानी सारे देश के में पेड़ लगाने के काम आता है और उसका पैसा भी नागरिक देते हैं।

हर समस्या को सरकार के माथे पर ठोकने वाले भारतीय खुद वातावरण को सुधारने में कितना योगदान देते हैं?

यदि समय रहते ना चेते तो दिल्ली वाली समस्या सभी बड़े शहरों में पनपेगी। हवा से बीमारी,पानी से बीमारी, कचरे से बीमारी फैलेगी।

आज पानी बोतल में बिक रहा है कल हवा थैलियों में बिकेगी।

समस्या की जड़ ज़रूरत से ज्यादा उपलब्धी है।

भारत मे गाड़ियों का पंजीकरण 10 साल पर होता है सब हर साल अनिवार्य कर देना चाहिए। यानी हर साल गाड़ी के रजिस्ट्रेशन के पहले टेस्टिंग होनी चाहिये।

बिजली की तरह पानी का भी मीटर होना चाहिये।इससे पानी की बर्बादी पर रोक लगेगी।

हर नागरिक के लिए साल में 100 घण्टे पर्यावरण व कम्युनिटी सर्विस के लिए अनिवार्य कर देने चाहिये वरना उसे दी जाने वाली सुविधाएँ बन्द कर दी जाएं।

गाड़ियों पर टैक्स बढ़ा कर टैक्सी,ट्रेन, रिकशा व मेट्रो सस्ती कर दी जानी चाहिये।

Incentive point system को बढ़ाना चाहिये। यदि कोई नागरिक सिर्फ मेट्रो व पब्लिक ट्रांसपॉर्ट का इस्तेमाल करता है तो उसे एक महीने के फ़्री पास देने चाहिये।

100 से ज्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों को कंपनी ट्रासपोर्ट से ही कर्मचारियों को यात्रा करानी चाहियें।

पार्किंग की फीस बढ़ा देनी चाहिये।

2 से ज्यादा गाड़ी रखने वालों पर luxary tax लगाना चाहिये।

बहुत से लोगों को मेरी इन बातों से बुरा लग रहा होगा किन्तु कड़े उपायों के सिवाय कोई चारा नही है। 123 करोड़ की जनसंख्या यदि अपने वातावरण का ध्यान स्वयं रखने लगे और अपनी ज़िम्मेदारियाँ समझने लगे तो हम दुनिया के बादशाह हो जायेंगे।

ये धुआँ हमारी जली हुई सोच का है और अगर सोच नही बदली तो ये सबको निगल जाएगा।

Be a true indian and true human

Should we speak or should we not ?

अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब समझना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है

यदि आरक्षण का विरोध करो तो आपको दलित विरोधी समझा जाता है!

यदि पाकिस्तान का विरोध करो तो मुस्लिम विरोधी समझ जाता है!

गद्दारों का विरोध करो तो कांग्रेस विरोधी समझा जाता है!

GST व नोटबंदी पर बोल दो तो BJP विरोधी समझा जाता है!

कुरीतियों का विरोध करो तो धर्म विरोधी समझा जाता है!

पुरानी पीढ़ी का विरोध करो तो संस्कार विरोधी समझा जाता है!

नई पीढ़ी का विरोध करो तो नए युग का विरोधी समझा जाता है!

सास का पक्ष लो तो बहू विरोधी समझा जाता है!

बहू का साथ दो तो सास विरोधी समझा जाता हूं!

पत्थर मारने वालों का विरोध करो तो कश्मीर विरोधी समझा जाता है!

देश विरोधी पत्रकारों व TV एंकर का विरोध करो तो आपको सेक्युलर विरोधी समझा जाता है!

बाबाओं के विरोध करो तो अधर्मी समझा जाता है!

सफेदपोशों का विरोध करो तो समाज विरोधी समझा जाता है!

चमचों का विरोध करो तो नेता विरोधी समझा जाता है!

सिस्टम की खामियों का विरोध करो तो संविधान विरोधी समझा जाता है!

कुछ भी बोलो ,कुछ भी लिखो लोग कहीं ना कहीं आपकी गर्दन मरोड़ने को तैयार खड़े रहते हैं!

हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है!!

क्या करें ? बोलें की ना बोलें?

Valmiki Or Hanumaan

जब वाल्मीकि जी ने अपनी रामायण पूरी की नारद जी को दिखाने के लिये ले गये। नारद जी उससे बहुत प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने कहा, ‘तुमने अच्छा तो लिखा है, लेकिन हनुमान की रामायण तुम्हारी रामायण से कहीं सुंदर है’।

‘हनुमान जी ने भी रामायण भी लिखा है!’, वाल्मीकि जी को ये जानकर चकित हो गये, और यह सोचकर कि हनुमान जी की रामायण किस प्रकार उनकी रामायण से बेहतर है,जानने हेतु वो हनुमान जी की लिखी रामायण को ढूँढ़ने लगे!

कदली-वन के एक झुरमुट में ढूँढते हुए , उन्होंने पाया कि हनुमान जी ने अपनी रामायण को केले के पेड़ के सात व्यापक पत्तों पर अंकित किया था।

उसने इसे पढ़ा और पाया की व्याकरण और शब्दावली, रचना और माधुर्य की दृष्टी से हनुमान जी द्वारा लिखित रामायण उनकी रचना से कहीं ज्यादा सुंदर थी और उसे पढ़ते पढ़ते वो रोने लगे।

‘क्या मेरी रामायण इतनी बुरी है?’ हनुमान जी ने पूछा

वाल्मीकि ने कहा, ‘नहीं, यह बहुत उत्तम है!”

‘तो आप रो क्यों रहे हैं मुनिवर ?’ हनुमान जी ने पूछा

‘क्योंकि आपकी रामायण पढ़ने के बाद कोई भी मेरी रामायण पढ़ना नहीं चाहेगा,’ वाल्मीकि जी ने उत्तर दिया।

सुनते ही हनुमान जी ने सात केले के पत्तों को तोड़ दिया, “अब कोई भी हनुमान की रामायण को नहीं पढ़ेगा।”

हनुमान जी ने कहा, ‘मुनिवर आपको अपनी रामायण की ज़रूरत मेरी लिखी रामायण से कहीं अधिक है आपने रामायण लिखी है ताकि दुनिया वाल्मीकि को याद रखे; मैंने अपना रामायण लिखा था ताकि मैं राम याद रख सकूं। ‘

ठीक उसी पल में वाल्मिकी को एहसास हुआ कि वो उन्होंने रामायण स्वयं को स्थापित करने के लिए लिखी और वो अपनी रचना के माध्यम से प्रसिद्ध होना चाहते थे।

उन्होंने रामायण की रचना अपने विचारों को सत्यापित करने के लिए की।ना कि राम के प्रति प्रेम के लिये। उन्होंने रामायण लिखी जिस्से उनका नाम अमर हो जाये ना कि राम के प्रेम व भक्ति में सरोबार होकर ।वाल्मिकी ने रामायण लिखकर अपने लेखन को सिद्ध किया

और हनुमान!! रामजी उनका जीवन थे और रामायण उनकी भक्ति थी।

वाल्मिकी की रामायण उनकी महत्वाकांक्षा का एक उत्पाद था; लेकिन हनुमान जी की रामायण उनके राम के प्रति स्नेह का एक उत्पाद था।

यही कारण है कि हनुमान जी की रामायण वाल्मिकी की रामायण से कहीं ऊपर थी । क्योकि “राम से बड़ा … राम का नाम है!”

आज भी हमारे समाज मे हनुमान जैसे लोग हैं जो प्रसिद्ध नहीं बनना चाहते हैं वो निरंतर बिना कामना के अपना कर्म करते रहते हैं और अपने उद्देश्य को पूरा करते हैं।

जीवन मे जो लोग आपकी सफलता के हिस्सेदार हैं उनके कंधों पर पैर रखकर सीढ़ी ना चढ़ें।

आज के युग मे काम से ज्यादा काम का ढिंढोरा है। हर इंसान ये सिद्ध करने में लगा है कि वो दूसरे से बेहतर है।

बहुत से ऐसे प्रोग्रामों में जाती हूँ जहां ये दिखाने की गलाकाट प्रतियोगिता चलती रहती है कि जैसे सारे आयोजन मंच पर बैठे लोगों ने ही किया है।

जो व्यक्ति भाषण लिखकर देता है उसके शब्द ही वक्ता को तालियां दिलवाते हैं।लेकिन एक बार भी बोलने वाला भरी सभा मे उस गुमनाम लेखक का नाम नही लेता।

जीवन के हर क्षेत्र में होड़ लगी है है कि किस प्रकार अपने को बेहतर सिद्ध कर सकें। उत्पाद से ज्यादा उसकी पैकेजिंग पर तमाम ज़ोर रहता है। एक संकीर्ण सी मानसिकता चहूं ओर व्यपात है।

हमे वाल्मीकि की तरह नहीं बनना जो सिर्फ ये समझते रहें कि हमारी “रामायण” ही उत्कृष्ट है।

हमारे जीवन में बहुत सारे “हनुमान” भी हैं …

बहुत से ऐसे लोग हैं जो चुपचाप अपना काम कर रहें हैं ..बिना हेडलाइंस बने। जरूरी नही किसी नेता या VIP के साथ सेल्फी या अखबार में छप जाने से आपकी अहमियत बढ़ गई है।

याद रहे प्रसिद्धि की चाह से रामायण लिखने वाले वाल्मिकी सिर्फ पन्नों पर छपते हैं ..और राम की निष्काम सेवा करने वाले हनुमान घर घर मे पूजते हैं।