Poisonus Arrows

कुछ किस्से कुछ कहानियाँ,

ज़िन्दगी भर का रोना

ज़िन्दगी भर की बेईमानियां

★ लड़की की उम्र करीब 23 वर्ष,गोद मे करीब एक साल का बच्चा। दिखने में सुंदर व भोली लेकिन आंखों में सूनापन। कुछ पूछते ही आंखों से टप टप आँसू गिरने लगे। बताया 6 बहिनों में से चौथी संतान थी। सर पर बाप का साया नही। निकट रिश्तेदारों ने उसकी शादी खानदान के ही एक लड़के से तय कर दी जो दुबई में काम करता था उम्र में 9 साल बड़ा।

घर मे सब खुश थे कि लड़की दुबई जायेगी। शादी हुई 20 दिन बाद लड़का दुबई चला गया। लड़की गर्भवती हो गई थी। लेकिन पति को खबर सुनाने पर वो भड़क गया और बच्चा गिराने को कहा । बोला “बच्चे से खूबसूरती खत्म हो जायेगी और यदि वो सुंदर ना दिखी तो वो उसे तलाक़ दे देगा।”

लेकिन लड़की ने बच्चा नही गिराया। लड़का बेटा होने पर भी ना तो आया ना ही बात की । फिर एक दिन whats app पर मैसेज आया कि मैंने तुम्हें तलाक़ दे दिया है। लड़के के माँ बाप भी ज़िम्मेदारी लेने से मुकर गये। लड़की ज्यादा पढ़ी लिखी नही थी घर मे वैसे ही किल्लत थी । भविष्य अंधकारमय था। लेकिन ना कौम का ना समाज का… एक भी व्यक्ति नही बोला कि ये गलत है!! कोई सुपर स्टार कोई मज़हबी नेता कोई कौम का ठेकेदार TV पर नही बोला कि “ये गलत हुआ। लड़के को सज़ा मिलनी चाहिये।”

अगर बोलते हैं तो दूसरे समाज के वो लोग,जो औरत का दर्द समझते हैं और जहां विवाह के साथ मान्यताएं जुड़ी हैं।

★औरत की उम्र 44 साल, पढ़ी लिखी, बड़ी कंपनी में काम करती थी 3 बच्चे थे। ज़िन्दगी बढ़िया चल रही थी। हाई क्लास लाइफ स्टाइल बच्चे अच्छे स्कूलों में सब कुछ ठीक ठाक।

फिर एक दिन शौहर विदेश के दौरे पर गया। रात को एक कॉल आया कि “बहुत दिन से बताना चाहता था कि, रिश्ते की एक बहन से संबंध चल रहा था अब नौबत ये है क़ि शादी करनी पड़ेगी इसलिये मज़बूरी में मैँ तुम्हे तलाक़ दे रहा हूँ। ”

एक फ़ोन कॉल, 3 शब्द और …!! 23 साल का रिश्ता खत्म,सारी ज़िम्मेदारियाँ खत्म, सारे जज़्बात खत्म, सब कुछ खत्म।

44 साल की उम्र 3 बच्चे ,नौकरी ,और हारा हुआ मन।

जिस दीवार पर घर खड़ा किया था अचानक वो नीचे से सरक गई। किसी ने उस आदमी को समाज से बॉयकॉट नही किया।किसी ने भर्त्सना नही की। निकट रिश्तेदारों ने भी दो चार दिन गालियां दी और फिर औरत को उसके हाल पर छोड़कर अपने अपने घर चले गये।

अब भी ना तो समाज बोला ना ही कौम,

शब्दों के पत्थर से हो गया रिश्ता खत्म!!

★महिला की उम्र 55 बरस,भीषण डिप्रेशन का शिकार तीन बड़ी बड़ी लड़कियाँ, 2 नाती, पति का व्यापार।

एक दिन रात को जब वो शौहर मियां के सर में मालिश कर रही थी तो उनके ऊपर जैसे बम गिरा। शौहर ने कहा,”अब तुम इतनी अच्छी नही लगती। मोटी तो हो ही गयी हो साथ ही झुर्रियां भी पड़ रही हैं ऐसी हालत में वो उनके साथ नही रह सकते।”

आखिर को मर्द है उसे एकदम टिप टॉप जवान दिखने वाली बीबी चाहिये

मोबाइल के whats app में बहुत सी जवान लड़कियों से रात को जब चैट करते थे तो ढलती उम्र वाली बीबी रात को अल्लाहमिया से उनके उम्रदराज़ होने की दुआ मांगकर सोती थी। 55 साल की उम्र में अचानक जवान औरतों की चाहत में खुद बुढापे के शिकार होते शौहर ने उन्हें तलाक़ का पत्थर मार कर घर से निकाल दिया।

बीबी को समझ नही आ रहा था क़ि उसका कसूर क्या है? सारी जवानी उस शौहर का घर बसाने में और बच्चे पालने में निकाल दी।

क्या उसका कसूर ये है कि उसने ब्यूटी पार्लर और ब्यूटी प्रोडक्ट्स पर पैसे नही उड़ाये और पाई पाई जोड़ती रही ये सोचकर कि शौहर की मेहनत की कमाई है। आज वो डिप्रेशन की दवाइयां खाती है और लगभग नर्वस ब्रेकडाउन के कगार पर हैं।

ये कैसी इंसानियत है? ये कैसे रिश्ते हैं? जिस्मानी रिश्ते रूहानी रिश्तों से बड़े हैं? ना जाने कब वो कंधा दगा दे जाये जिस पर सर रखकर वो बीबी सोती थी।

एक को छोड़कर दूसरे को पकड़ लेने का एक आसान सा रास्ता बना हुआ है कि सबकुछ ज़ायज़ बना दो। गलत को सही करार दे दो!! क्योंकी जो रिश्ता कागज़ के कॉन्ट्रेक्ट से शुरू होता है वो जबान के वार से खत्म भी हो जाता है।

कहीं कोई जन्म जन्म का साथ देने का वादा नही!!

कहीं सात जन्मों तक साथ रहेंगे वाला करार नही!

रिश्ते जोड़ते वक़्त ही शर्तें लिख दी जाती की रिश्ता टूटने के वक़्त किसको क्या मिलेगा। कितने पैसे से इस रिश्ते के मोल को चुकाया जायेगा।

बहुत से लोगों को इस खेल से बड़े फायदे भी हैं। जहां कुछ जायज़ ना हो इसकी आड़ ले लो। कुछ समय के लिये कागज़ पर पहचान बदल लो और एक और रिश्ता कायम कर लो।

हमारे बहुत से celebraties , बड़े बड़े लोग भी इसका लाभ उठाते है क्योंकि अगर ये ना हो तो अदालत में लुट जाएंगे। जेल होगी सो अलग। अगर पहली पत्नी को छोड़ने में यदि कानून आड़े आता हो तो कुछ पलों के लिए पहचान बदल लो, दूसरा ब्याह रचा लो और सब कुछ ज़ायज़ हो जाता है।

ये एक ही समाज के लिए अलग अलग कानून क्यों?

बहुत सारी महिला सेलिब्रटी भी हैं जिन्होंने दूसरों के घर इसी प्रथा से उजाड़कर अपने घर बसायें हैं। उनमे से कुछ तो राज्यसभा ,कुछ लोकसभा तक भी पहुंची हैं और इसी लिए इस कुप्रथा बारे में नही बोलीं क्योंकी उन्होंने इसी का इस्तेमाल करके दूसरी पत्नी का दर्जा हाँसिल किया है। हमारे बड़े बड़े सुपर स्टारों ने भी इसी का इस्तेमाल करके पहली पत्नी को त्यागकर दूसरी शादी रचाई।

इस सारे खेल में मानवीय पक्ष की कोई जगह नही।

सात फेरों के वक़्त कभी ऐसी कोई शर्त नही होती जो ये दर्शाए की यदि एक नए दूसरे को छोड़ दिया तो कौन कौन सी शर्तें मान्य होंगी। यानी उसमे छोड़ने, छुड़ाने की कोई जगह ही नही है। एक बार बंधन में बंधने का मतलब जन्म जन्मांतर का साथ। तलाक जैसे शब्द का विवरण ही नही है। यदि रिश्ता तोड़ना हो तो धर्म इसकी अनुमति नही देता सिर्फ अदालत के ज़रिए ही तोड़ा जा सकता है। धर्मानुसार पतिपत्नी जीवन पर्यन्त साथी रहते हैं।

10 बच्चों को जनने वाली स्थूलकाय औरत भी जब माँग में गर्व से सिंदुर भरती है तो वो जानती है कि उसके अर्थी चढ़ने तक उसका पति इस सिंदूर की लाज रखेगा। उसे डोली में लाया है अर्थी में विदा करेगा।

कोई डर नही, कोई insecurity नही।

अग्नि के फेरे ही हर सुरक्षा की गारंटी होते हैं।

दूसरी ओर वो औरतीं जो जितना भी चाहे पति से प्यार करे, कितना सर्वस्व न्योछावर कर दे लेकिन ताउम्र एक डर में जीती है की तीन शब्दों के पत्थर उसकी तक़दीर में कांटे बिछा देंगे।

औरत ना हुई कपड़ों पर लगी गर्द हो गयी.. झाड़ा और चल दिये।

कसूर भी अजीब तरह के,जो जीते जागते रिश्ते का क़त्ल कर देते हैं ..

पंखा क्यों बन्द किया.. हलाक़!

मनपसंद खाना क्यों नही बनाया..हलाक़ !

लिपस्टिक व नेलपॉलिश क्यो लगाई..हलाक़ !

लड़की क्यों जनी…. हलाक़ !!

जवाब क्यों दिया…हलाक़!

मेरा दिल दूसरी पर आ गया… हलाक़!

मोटी क्यों हो गई … हलाक़!

रिश्तों को जोड़ने के लिए इतने आडम्बर,इतनी रस्मों रिवाज़ , कागज़ पर लिखे करार और तोड़ने को शब्द भर काफी हो जाते हैं!!

बड़ी अजीब सी बात है जख्म मज़हब दे और उसपर मरहम लगाने का काम कानून करे!!

उसपर भी इसका विरोध किया जाता है। यानी-

जो जैसे चल रहा है चलने दो।

हमे खुदगर्ज़ी से मतलब है

कोई रोता है तो रोने दो

आज अगर मैं इस बारे में सोचती हूँ तो सिर्फ और सिर्फ एक औरत होने के नाते, इंसान होने के नाते.. बाकि कुछ भी उसके बाद में आता है।

आज 21वी सदी में यदि जनसंख्या के आधे हिस्से वाली महिला वर्ग के बारे में अगर महिलाएं भी ना सोचें तो वो खुदगर्ज़ी होगी।

कोई धर्म इस बात की पैरवी नही करता कि उसके नियमों से किसी निर्दोष को चोट पहुंचे,लेकिन उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वालों को इस बात से कोई फर्क नही पड़ता की सीमाएं क्या हैं!!

उनके हाथ मे ये एक हथियार है जिससे जब जी चाहे किसी निर्दोष को जिबह कर सकते हैं।

हलाक़! हलाक़!हलाक़

Padmavati “The Black Chapter”


संजय लीला भंसाली की अगली फिल्म की स्क्रिप्ट होनी चाहिये #अल्लाउदीन खिलजी की नाज़ायज़ बेटी की प्रेम कहानी!

अल्लाउदीन की बेटी #फ़िरोज़ा जालौर के युवराज #बीरमदेव की बहादुरी देख कर लट्टू हो गई और बीरम देव से शादी की ज़िद ठान ली।

अल्लाउदीन की धमकियों के बावजूद वीरमदेव ने फ़िरोज़ा से शादी करने से इनकार कर दिया क्योंकी अल्लाउदीन ने उससे धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव रखा था।

यहां तक की वीरमदेव ने अल्लाउदीन के सिपालसलाहर #उलुग खान से सोमनाथ के मंदिर से लूटा हुआ शिवलिंग भी छीन लिया।

खिसियाये हुए अल्लाउदीन ने अपने ख़ास सेनानायक *कमालुद्दीन गुरग को जालौर पर आक्रमण करने भेजा व वीरम देव की सेना ने 2 वर्ष तक युद्ध करने पर भी हार नही मानी व शहीद हुए, सैंकड़ों वीरांगनाओं ने जौहर किया।

#संजयलीलाभंसाली जी अब एक फ़िल्म लुटेरों की अवैध बेटी के इस प्रेमप्रसंग पर हो जाये!!

और उसके बाद भी यदि आगे फ़िल्म बनानी हों तो भारत को लूटने वालों आक्रमणकारियों पर आपको बहुत सी कहानियां मिल जाएंगी।

मुहब्बत की इंतिहा के प्रतीक #शाहजहां को अपने बाप #जहांगीर से हज़ारों रखैलें विरासत में मिली थी, उनपर फ़िल्म बनाइये

शाहजहां के दरबार मे हिन्दू स्त्रियों को सरेआम बेचने के लिए मीनाबाजार लगता था।!उसी परम्परा के चलते दिल्ली में GB रोड जैसा red light area बना।

इसपर भी एक फ़िल्म बनाइये!!

एक और बड़ी दिलचस्प प्रेमकहानी है आपके लिए। प्रेम के पुजारी शाहजहां ने “मुमताज महल” उर्फ “अर्जुमंद-बानो-बेगम” के पति “शेर अफगान खान”जो कि शाहजहां की सेना में सूबेदार था उसकी हत्या करके उससे अपनी बेगम बनाया ।और मुमताज़ उसकी पहली या आखरी बीबी नही थी।उसने मुमताज़ के मरते ही कुछ ही दिनों में उसकी बहन फरज़ाना से निकाह कर लिया था।

इसी शाहजहां पर उसकी अपनी बेटी “जहाँआरा” के साथ भी संबंध रखने के आरोप लगते रहे थे।यहां तक की उसने जहाँआरा की शादी तक नही होने दी। इस बाप बेटी के रिश्ते के ऊपर प्रेम कहानी पर एक फ़िल्म बनाइये क्योंकी हम इसी *शाहजहां* के #ताजमहल पर, मुहब्बत के कसीदे पढ़ते हैं!

लीजिये एक और महानता की कहानी है जब महान
अकबर ने हज़ारों हिंदुओं के सर काटकर नरमुंडों से मीनारें बनाई थी!!(अकबरनामा पढ़िए) इसी अकबर ने कभी अपनी बेटियों का ब्याह नही होने दिया!!
यही अकवर शिकार के लिए जिंदा गुलामों को दौड़ा दौड़ाकर उनका शिकार करता था।
#चित्तौड़ की पराजय के बाद महारानी #जयमाल ने अपनी 12000वीर क्षत्राणीयों के साथ जौहर किया क्योंकी उन्हें अकबर की गुलामी मंज़ूर नही थी।

इसी महान अकबर की कुदृष्टि वीर विधवा रानी #दुर्गावती पर भी थी किन्तु रानी ने अकबर के हरम में जाने के स्थान पर अपनी जान देना गौरवपूर्ण समझा।

ये वही अकबर महान है जिसे लोगों ने #जोधाबाई से प्रेम करते देखने के लिए 200 रु के टिकिट खरीदकर #जोधाअकबर देखी।

बात निकलेगी तो फिर दूर तक जाएगी।

बडी हैरानी की बात है आपको #लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना पर फ़िल्म बनाने की प्रेरणा नही मिलती?

#पन्नाधाय पर फ़िल्म नही बनाते?

आप महारानी #तपस्विनी जो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की भतीजी और बेलूर के जमींदार नारायण राव की बेटी थी व उनकी वीरता की प्रसिद्धि भी दूर-दूर तक थी। उनपर फ़िल्म बनाने का विचार नही आया?

आप रानी दौपडीबाई पर फ़िल्म नही बनाते?

आप फिल्मकारों की creativity इतिहास की काली कथाओं को प्रेमकहनियों में तब्दील करने में ही क्यों खर्च होती है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हमें पराधीन रखने वालों को आप हीरो बना देते हैं!

फिर चाहे वो #मुगलेआज़म हो या फिर #रज़ियासुल्तान की प्रेमकथा!! फिर वो जोधा-अकबर की राजनैतिक शादी को प्रेमकथा बनाना हो या #पद्मावती को घूमर कराना!

आप लोग अपनी crativity के जनून में इतिहास के काले पन्नों की सुनहरी फिल्मे बनाते रहते है

आपकी जैसी सोच ही है जिसने देश मे घुसने वाले लूटेरों व आक्रमणकारियों को हीरो बन दिया।

ऐसी कहानियां कलाकार की कल्पना नही बल्कि उनका फितूर होती हैं।

यदि करोड़ों भारतवासी आपकी बनाई “ब्लैक” जैसी उम्दा फ़िल्म की सराहना करते हैं, तो उन्हें पद्मावती मत परोसिये। बॉक्स आफिस से ऊपर उठकर ,कुछ बेहतर दीजिये।

हमारा इतिहास गौरव गाथाओं से भरा पड़ा है एक आध फ़िल्म उसपर भी बनाइये संजय लीला भंसाली जी !

Living life the right way

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एक बार एक राजा ने अपने तीन ख़ास मंत्रियों को बुला एक एक थैला दिया और उन्हें वन में से फलों को भर कर लाने को कहा।

पहले मंत्री ने सोचा कि राजा को अच्छे व ताज़े फल पाकर खुशी होगी सो उसने चुन चुनकर ताज़े व बढ़िया फलों से थैला भर लिया।

दूसरे मंत्री ने सोचा राजा को इतनी व्यस्तता में कहां इतनी फुरसत होगी कि वो थैले के फलों को एक एक कर देखेगा। सो उसने अच्छा ,बुरा जो फल पाया थैले में भर लिया।

तीसरे मंत्री ने सोचा कि राजा सिर्फ यही तो देखेगा कि किसका थैला बड़ा है, इसलिये उसने अपने थैले में कूड़ा करकट व पत्थर भर लिए।

तीनो दरबार मे पहुंचे।

लेकिन ये क्या??

राजा ने बिना कुछ देखे तीनों को कारागार में डालने की आज्ञा दे दी और कहा अगले एक महीने तक जो कुछ उन्होंने अपने थैले में जमा किया है उससे अपना पेट भरें।

पहले मंत्री ने आराम से महीना गुजार लिया।
दूसरे मंत्री ने कुछ दिन अच्छे फल खाये फिर सडे फल खाकर किसी तरह जीवन बचाया।
तीसरे मंत्री के पास जीवन बचाने के लिए कुछ नही था। कूड़ा व पत्थर खाने से जीवन कैसे बचता?

जीवन के आखरी चरणों मे जो शुरुआती समय में जमा करते हैं वही काम आता है।

प्रत्यक्ष में जब हम दूसरों के जीवन,सफलता व सम्पन्नता से रश्क करते है तो ये नही जानते कि उनके अंत से ही उनके जीवन मे किये गए कर्मों का अंदाज़ा हो जाता है….

वरना कोई महात्मा क्यों किसीकी गोली से मरता?

क्यों दुनिया पर राज करनेवाले अपने ही अंगरक्षकों की गोली से छलनी होते?

क्यों दूसरों के मुँह से निवाला छीनने वाले आखरी क्षणों में नलियों के सहारे जीने की कोशिश करते हैं ?

क्यों दूसरों के बेटों के हाथों में बंदूम देनेवालों के बेटे उनके ही घरों को आग लगा देते हैं?

क्यों नारी जाति को वस्तु की तरह इस्तेमाल करने वाले किसी औरत की ही वजह से जेल की सलाखों के पीछे सड़ते हैं?

क्यों नोटों के बिस्तर पर सोने वाले मृत्यु को उन्ही नोटों से नही खरीद पाते?

क्यों ईमान बेचने वालों को उन्ही का कोई विश्वासपात्र चन्द रुपयों के लिए धोखा देता है?

भीष्म पितामह को भी गलत पक्ष का साथ देने की सज़ा तीरों की शैया पर लेटकर भुगतनी पड़ी।

सदाचारी युधिष्टर की एक गलती ने उनकी पत्नी व भाइयों को अपमान की स्थिति में पहुंचा दिया!

जो कमाई जीवन के पहले हिस्से में जोड़ेंगे वही बाद के हिस्से में खर्च करने को मिलेगी।

ना अकूत पैसा ना बेशुमार ताक़त आपके अच्छे जीवन की गारंटी दे सकती है।

कोई गलत रास्ता आपको सही मंज़िल तक नही पहुंचा सकता।

ज़रा सोच के जोड़ना!!

क्योंकि जो जोड़ रहे हो बाद में उसी से काम चलाना पड़ेगा

Smog

दिल्ली वालों की आँख जल्दी से नहीं खुलती। कभी डेंगू ,कभी चिकनगुनिया, और आज ये आलम है क़ि धुंए व प्रदूषण से उठने वाला कोहरा जानलेवा साबित हो रहा है।

इन सबकी वजह प्रकृति के साथ हो रहा खिलवाड़ है। सीमेंट के जंगल बनाने के चक्कर मे पेड़ों के जंगल काट दिये। ज़मीन में उगने वाले वृक्षों का स्थान गमलों में उगने वाले फूलों, व बोन्साई ने ले लिया।

दक्षिण दिल्ली के अमीर रिहायशी घरों में जहां 10 AC चलते हैं प्राकृतिक हवा की इंच भर भी गुंजाइश नही है।

दिल्ली को प्रदूषण नही लालच मार रहा है। 150वर्ग ग़ज़ के टुकड़े पर भी बहुतल्ला इमारत बन जाती है। तीन पुश्त पहले जो बड़े बड़े घर होते थे आज संतानों ने पैसे के लालच में बिल्डरों को बेच दिया और एक एक फ्लैट लेकर जमीन के टुकड़े कर दिए।

घर छोटे होते गये और गाडियाँ बड़ी होती गई। बाबुजी के घर की जगह 3BHK ने ले ली। कपड़े बालकनी की रेल में सूखने लगे और तुलसी खिड़की में। जहां बच्चे आंगन में खेलते थे वो अब बन्द कमरे में वीडियो खेलते हैं।

एक बड़ी अम्बेसेडर गाड़ी में सारा कुनबा घूम लेता था अब हर सदस्य को गाड़ी चाहिये। धूप व आसमान के दर्शन अब खिड़कियों से भी नही होते!!!

हवा बस पार्क व शहर के बाहर मिलती है। अब हंसी के लिए भी पार्क में इकट्ठा होकर बिना मतलब हां हा करना रह गया है।

ऊंची छतों वाले दफ्तरों की जगह कॉर्पोरेट बिल्डिंग में दड़बों में बन्द कबूतर जैसे लोगों ने ले ली। बस टकटकी बांध कंप्यूटर पर झुके रहते हैं।

बिल्डिंग में लिफ्ट इस्तेमाल करते हैं और gym में सीढी वाले स्टेपर पर सीढ़ी चढ़ते हैं। घर से बाहर कदम रखने के लिए गाड़ी चाहिये और gym में 3000 रु महीना देंकर साईकल चलाते हैं। सामान ट्राली में ढोते हैं और gym में 50 किलो का बेंचप्रेस करते हैं।

पीने को पानी बोतल मे लेकिन हर बिल्डिंग की छत पर स्विमिंग पूल होते हैं।

अब भाई इसकी कोई तो कीमत दिल्ली वालों को देनी पड़ेगी। सरकार कोई भी आ जाये क्या दिल्ली वाले गाडियाँ छोड़कर साईकल चलाएंगे? क्या घरों को तोड़कर बिल्डिंगे बनाना बंद करेंगे? क्या पार्किंग की जगह से गाड़ियां हटाकर पेड़ लगाएंगे? क्या मॉल्स को हटाकर शहर से बाहर करेंगे?

Odd-even is not God given .. कोई भी सरकार जादू का डंडा घुमाकर प्रदूषण दूर नही कर सकती!!प्रदूषण लोग करते है सड़कों पर गाड़ियां बढ़ाकर, छोटी जगहों में जरूरत से ज्यादा इंसान ठूँसकर!! गगनचुम्बी इमारतें बढ़ाकर!!

यूरोप के बहुत से देशों में लोग सूट टाई पहनकर साईकल से दफ्तर जाते हैँ। मेट्रो व पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं। प्लास्टिक व कचरे पर रोक रखते हैं।

खाड़ी देशों में जहां निरा रेगिस्तान है हज़ारों पेड़ रोज़ लगाये जा रहे हैं। पानी खर्च करने पर महंगा बिल देना पड़ता है। पानी भी बिजली की तरह ही महंगा है। महंगी पार्किंग हैं। drip irrigation के द्वारा sewage का सारा पानी सारे देश के में पेड़ लगाने के काम आता है और उसका पैसा भी नागरिक देते हैं।

हर समस्या को सरकार के माथे पर ठोकने वाले भारतीय खुद वातावरण को सुधारने में कितना योगदान देते हैं?

यदि समय रहते ना चेते तो दिल्ली वाली समस्या सभी बड़े शहरों में पनपेगी। हवा से बीमारी,पानी से बीमारी, कचरे से बीमारी फैलेगी।

आज पानी बोतल में बिक रहा है कल हवा थैलियों में बिकेगी।

समस्या की जड़ ज़रूरत से ज्यादा उपलब्धी है।

भारत मे गाड़ियों का पंजीकरण 10 साल पर होता है सब हर साल अनिवार्य कर देना चाहिए। यानी हर साल गाड़ी के रजिस्ट्रेशन के पहले टेस्टिंग होनी चाहिये।

बिजली की तरह पानी का भी मीटर होना चाहिये।इससे पानी की बर्बादी पर रोक लगेगी।

हर नागरिक के लिए साल में 100 घण्टे पर्यावरण व कम्युनिटी सर्विस के लिए अनिवार्य कर देने चाहिये वरना उसे दी जाने वाली सुविधाएँ बन्द कर दी जाएं।

गाड़ियों पर टैक्स बढ़ा कर टैक्सी,ट्रेन, रिकशा व मेट्रो सस्ती कर दी जानी चाहिये।

Incentive point system को बढ़ाना चाहिये। यदि कोई नागरिक सिर्फ मेट्रो व पब्लिक ट्रांसपॉर्ट का इस्तेमाल करता है तो उसे एक महीने के फ़्री पास देने चाहिये।

100 से ज्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों को कंपनी ट्रासपोर्ट से ही कर्मचारियों को यात्रा करानी चाहियें।

पार्किंग की फीस बढ़ा देनी चाहिये।

2 से ज्यादा गाड़ी रखने वालों पर luxary tax लगाना चाहिये।

बहुत से लोगों को मेरी इन बातों से बुरा लग रहा होगा किन्तु कड़े उपायों के सिवाय कोई चारा नही है। 123 करोड़ की जनसंख्या यदि अपने वातावरण का ध्यान स्वयं रखने लगे और अपनी ज़िम्मेदारियाँ समझने लगे तो हम दुनिया के बादशाह हो जायेंगे।

ये धुआँ हमारी जली हुई सोच का है और अगर सोच नही बदली तो ये सबको निगल जाएगा।

Be a true indian and true human

Article 370 and 35A

धारा 35A की जड़ें बहुत गहरी हैं..

बात शुरू होती है भारत व पाकिस्तान कर बंटवारे के साथ ही जब नेहरू जी ने कहा कि यद्यपि पाकिस्तान मुसलमानों के लिए बना है लेकिन यदि भारत के मुसलमान चाहें तो वो भारत मे जहां चाहें रह सकते हैं, क्योंकि वो भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश यानी सेक्युलर देश के रूप में देखना चाहते थे, या फिर नेहरू जी के अतीत के पन्ने शायद इस्लाम से जुड़े थे और उन्हें ये डर था कि भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की स्थिति में उनकी गद्दी डावांडोल हो सकती है।

मुसलमानों तो खुश रखने के लिए इस पर विचार होने लगा कि कश्मीर के मुस्लिम बहुल होने के कारण वहाँ मुसलमानों को कुछ खास किस्म की रियायतें व सुविधाएं दी जाये। 26 अक्टूबर 1947 को जब सभी रियासतों का विलय भारत मे हुआ तो कश्मीर के लिए भी वही शर्तें थी जी बाकी रियासतों के लिए थी। उस समय #370 जैसा कोई प्रावधान नही था,क्योंकी उस समय तक भारत का कोई संवीधान नही था।

जब 1949 में संवीधान का प्रारूप तैयार हो रहा था तो शेख अब्दुल्ला ने नेहरू से कश्मीर के लिए विशेष अधिकारों की बात की उसपर नेहरू ने उन्हें डॉ भीमराव अंबेडकर से मिलने को कहा।

डॉ आंबेडकर ने शुरू में विरोध करते हुऐ कहा की एक ही देश के नागरिकों के लिए अलग अलग अधिकार क्यों कर दिए जाएं। शेख अब्दुल्ला के अभिन्न नेहरू जी ने सरदार पटेल से कहा क्यों ना कांग्रेस की कार्य समिति में ये प्रस्ताव पास करा लिया जाए क्योंकी संवीधान सभा की कार्य समिति के अधिकांश सदस्य कांग्रेसी थे। किंतु कांग्रेस कार्य समिति ने भी इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

बाद में नेहरू जी ने सरदार पटेल पर इसके लिए अत्याधिक दबाव डाला,अंतोगत्वा नेहरू जी की ज़िद के चलते धारा 370 को एक प्रेफ़िक्स के माध्यम से संवीधान में जोड़ा गया जिसमें ये स्पष्ट किया गया कि धारा 370 एक अस्थायी या temperary धारा है जिसे बाद में बदल जायेगा।

किन्तु आजतक 370 एक temeprary धारा होते हुए भी 67 साल से संवीधान से हट नही पा रही?? 67 सालों से इतनी सरकारें आई और गई लेकिन किसी सरकार या राजनैतिक दल ने इसे हाथ लगाने की हिम्मत नही की?

और उसकी वजह ये है कि जब सारा देश व उसकी संवैधानिक शक्तियाँ संसद के दायरे में आती हैं तो धारा 370 कश्मीर को संसद के संवेधानिक अधिकारोँ से परे रखती है। संसद पंगु हो जाती है!!!! यानी जब संसद सारे देश के लिए निर्णय लेती है तो कश्मीर के मामले में वो कोई नियंत्रण नही कर सकती।

बात यहीं तक खत्म नही होती। 370 को अधिक मज़बूत बनाने के लिए एक और धारा 35A भी है जो की एक ही देश के नागरिकों के लिए अलग अलग अधिकार तय करती है ,कश्मीर के नागरिकों के अधिकार कुछ और व बाकी देश के नागरिकों के अधिकार कुछ और!!कश्मीर में 4 पीढी से रहने वाले लोगों को भी शरणार्थी समझा जाता है और उन्हें मौलिक अधिकार नही दिये जाते।

370 व 35A द्वारा ये तय किया जाता है की किसे कश्मीर का स्थायी नागरिक समझा जाये किसे नही। कौन लोकसभा के लिए तो वोट दे सकते है लेकिन विधान सभा के लिए नही!! कश्मीर के किन नागरिकों को सरकारी सुविधाएं मिल सकती हैं और किन्हें नहीं!! जब सारे देश मे minority के अधिकारों की बात होती है तो कश्मीर के पंडितों को minority का दर्जा नही दिया जाता अपितु उन्हें अपनी ही जन्मभूमि से विस्थापित होने पर विवश कर दिया जाता है!!उन्हें ना तो सरकारी नौकरी मिलती है ना ही वो सरकारी स्कूल कॉलेज में पढ़ सकते है ,ना ही सरकारी सुविधाएं ले सकते हैं

सन 1954 में भारत के संवीधान निर्माताओं ने भारतीय संसद तक से ये बात छुपाई व 35A को संवीधान की अधिकतर प्रतियों में भी नही छापा जाता। एक बड़ा धोखा संवीधान निर्माताओ ने देश के साथ किया और लाखों लोगों की जानें इसमें गई।

कानून जानने वाले भी ज्यादातर लोगों को 35A की जानकारी इसलिये नही है क्योंकी ये संवीधान के मूल भाग में ना होकर अप्पेडिक्स में है जिसे 1954 में जोड़ा गया व संसद को इसकी जानकारी नही दी गई।सारे नियमो को ताक पर रखकर सिर्फ राष्ट्रपति के आदेशों से इसे संवीधान में जोड़ दिया गया।

क्या आज भारत का नागरिक संसद व संवीधान की पारदर्शिता पर यकीन कर सकता है? क्या संवीधान बना कर छोड़ जाने वालों की पूजा कर सकता है?

जो कांटे संवीधान में हमारे लिए बोए जा चुके हैं हम उनकी कीमत कब तक चुकाएंगे?

10 वर्ष के लिए चलाये जाने वाले आरक्षण को आज 67 साल बाद निरन्तर चलाया जा रहा है और 370 और 35A जैसे अस्थाई धारा से आज देश डगमगा रहा है किंतु वोट की राजनीती से विवश हंमारे भाग्यविधाता कुछ भी करने में असमर्थ हैं?

Should we speak or should we not ?

अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब समझना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है

यदि आरक्षण का विरोध करो तो आपको दलित विरोधी समझा जाता है!

यदि पाकिस्तान का विरोध करो तो मुस्लिम विरोधी समझ जाता है!

गद्दारों का विरोध करो तो कांग्रेस विरोधी समझा जाता है!

GST व नोटबंदी पर बोल दो तो BJP विरोधी समझा जाता है!

कुरीतियों का विरोध करो तो धर्म विरोधी समझा जाता है!

पुरानी पीढ़ी का विरोध करो तो संस्कार विरोधी समझा जाता है!

नई पीढ़ी का विरोध करो तो नए युग का विरोधी समझा जाता है!

सास का पक्ष लो तो बहू विरोधी समझा जाता है!

बहू का साथ दो तो सास विरोधी समझा जाता हूं!

पत्थर मारने वालों का विरोध करो तो कश्मीर विरोधी समझा जाता है!

देश विरोधी पत्रकारों व TV एंकर का विरोध करो तो आपको सेक्युलर विरोधी समझा जाता है!

बाबाओं के विरोध करो तो अधर्मी समझा जाता है!

सफेदपोशों का विरोध करो तो समाज विरोधी समझा जाता है!

चमचों का विरोध करो तो नेता विरोधी समझा जाता है!

सिस्टम की खामियों का विरोध करो तो संविधान विरोधी समझा जाता है!

कुछ भी बोलो ,कुछ भी लिखो लोग कहीं ना कहीं आपकी गर्दन मरोड़ने को तैयार खड़े रहते हैं!

हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है!!

क्या करें ? बोलें की ना बोलें?

Valmiki Or Hanumaan

जब वाल्मीकि जी ने अपनी रामायण पूरी की नारद जी को दिखाने के लिये ले गये। नारद जी उससे बहुत प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने कहा, ‘तुमने अच्छा तो लिखा है, लेकिन हनुमान की रामायण तुम्हारी रामायण से कहीं सुंदर है’।

‘हनुमान जी ने भी रामायण भी लिखा है!’, वाल्मीकि जी को ये जानकर चकित हो गये, और यह सोचकर कि हनुमान जी की रामायण किस प्रकार उनकी रामायण से बेहतर है,जानने हेतु वो हनुमान जी की लिखी रामायण को ढूँढ़ने लगे!

कदली-वन के एक झुरमुट में ढूँढते हुए , उन्होंने पाया कि हनुमान जी ने अपनी रामायण को केले के पेड़ के सात व्यापक पत्तों पर अंकित किया था।

उसने इसे पढ़ा और पाया की व्याकरण और शब्दावली, रचना और माधुर्य की दृष्टी से हनुमान जी द्वारा लिखित रामायण उनकी रचना से कहीं ज्यादा सुंदर थी और उसे पढ़ते पढ़ते वो रोने लगे।

‘क्या मेरी रामायण इतनी बुरी है?’ हनुमान जी ने पूछा

वाल्मीकि ने कहा, ‘नहीं, यह बहुत उत्तम है!”

‘तो आप रो क्यों रहे हैं मुनिवर ?’ हनुमान जी ने पूछा

‘क्योंकि आपकी रामायण पढ़ने के बाद कोई भी मेरी रामायण पढ़ना नहीं चाहेगा,’ वाल्मीकि जी ने उत्तर दिया।

सुनते ही हनुमान जी ने सात केले के पत्तों को तोड़ दिया, “अब कोई भी हनुमान की रामायण को नहीं पढ़ेगा।”

हनुमान जी ने कहा, ‘मुनिवर आपको अपनी रामायण की ज़रूरत मेरी लिखी रामायण से कहीं अधिक है आपने रामायण लिखी है ताकि दुनिया वाल्मीकि को याद रखे; मैंने अपना रामायण लिखा था ताकि मैं राम याद रख सकूं। ‘

ठीक उसी पल में वाल्मिकी को एहसास हुआ कि वो उन्होंने रामायण स्वयं को स्थापित करने के लिए लिखी और वो अपनी रचना के माध्यम से प्रसिद्ध होना चाहते थे।

उन्होंने रामायण की रचना अपने विचारों को सत्यापित करने के लिए की।ना कि राम के प्रति प्रेम के लिये। उन्होंने रामायण लिखी जिस्से उनका नाम अमर हो जाये ना कि राम के प्रेम व भक्ति में सरोबार होकर ।वाल्मिकी ने रामायण लिखकर अपने लेखन को सिद्ध किया

और हनुमान!! रामजी उनका जीवन थे और रामायण उनकी भक्ति थी।

वाल्मिकी की रामायण उनकी महत्वाकांक्षा का एक उत्पाद था; लेकिन हनुमान जी की रामायण उनके राम के प्रति स्नेह का एक उत्पाद था।

यही कारण है कि हनुमान जी की रामायण वाल्मिकी की रामायण से कहीं ऊपर थी । क्योकि “राम से बड़ा … राम का नाम है!”

आज भी हमारे समाज मे हनुमान जैसे लोग हैं जो प्रसिद्ध नहीं बनना चाहते हैं वो निरंतर बिना कामना के अपना कर्म करते रहते हैं और अपने उद्देश्य को पूरा करते हैं।

जीवन मे जो लोग आपकी सफलता के हिस्सेदार हैं उनके कंधों पर पैर रखकर सीढ़ी ना चढ़ें।

आज के युग मे काम से ज्यादा काम का ढिंढोरा है। हर इंसान ये सिद्ध करने में लगा है कि वो दूसरे से बेहतर है।

बहुत से ऐसे प्रोग्रामों में जाती हूँ जहां ये दिखाने की गलाकाट प्रतियोगिता चलती रहती है कि जैसे सारे आयोजन मंच पर बैठे लोगों ने ही किया है।

जो व्यक्ति भाषण लिखकर देता है उसके शब्द ही वक्ता को तालियां दिलवाते हैं।लेकिन एक बार भी बोलने वाला भरी सभा मे उस गुमनाम लेखक का नाम नही लेता।

जीवन के हर क्षेत्र में होड़ लगी है है कि किस प्रकार अपने को बेहतर सिद्ध कर सकें। उत्पाद से ज्यादा उसकी पैकेजिंग पर तमाम ज़ोर रहता है। एक संकीर्ण सी मानसिकता चहूं ओर व्यपात है।

हमे वाल्मीकि की तरह नहीं बनना जो सिर्फ ये समझते रहें कि हमारी “रामायण” ही उत्कृष्ट है।

हमारे जीवन में बहुत सारे “हनुमान” भी हैं …

बहुत से ऐसे लोग हैं जो चुपचाप अपना काम कर रहें हैं ..बिना हेडलाइंस बने। जरूरी नही किसी नेता या VIP के साथ सेल्फी या अखबार में छप जाने से आपकी अहमियत बढ़ गई है।

याद रहे प्रसिद्धि की चाह से रामायण लिखने वाले वाल्मिकी सिर्फ पन्नों पर छपते हैं ..और राम की निष्काम सेवा करने वाले हनुमान घर घर मे पूजते हैं।

Babawaad

पिछले कुछ दिनों से एक के बाद एक बाबाओं का खुलासा हो रहा है। कभी आशाराम,कभी रामरहीम ,कभी फलाहारी और ना जाने कौन कौन !!

लेकिन यहां मैँ इन बाबाओं के कुत्सित कर्मों के बारे में बात नही कर रही। बाबाओं के काले किस्सों से अखबार व TV चँनेल्स रंगे पड़े हैं लेकिन सवाल ये उठता है की ये किस्से बनते कैसे हैं।

यदि विश्लेषण किया जाये तो हर बाबा के किस्से में कोई भी केस ब्लात्कार व शोषण की घटना के तुरंत बाद दर्ज नही हुआ। तकरीबन सारे ही केस हादसों के कुछ समय बाद सामने आये।

आज जब छेड़छाड़ व बलात्कार के शोषित तुरंत कानून की सहायता लेते हैं ब कानून भी अब पूरी तरह से शोषितों की मदद करता है तो इन मामलों में पुलिस में रिपोर्ट बाद में क्यों की जाती है।ज़ाहिर है ये बाबा बहुत ऊपर तक पहुंच रखते है ,नेता से लेकर मंत्री और पूंजीपति से लेकर कानून के रखवाले तक इनके दरबार मे हाजिरी भरते हैं।

अगर ये मान लिया जाए की बाबाओं की पहुंच ऊपर तक है और पीड़ित उनके भय से कानून की शरण लेने से डरते हैं तो फिर किस मोड़ पर वो ये निर्णय करते हैं की अब ये मामला खुले में आना है?

सभी बाबाओं के किस्सों में एक समानता तो है कि :

¶हर पीड़िता अपनी मर्ज़ी से उनके आश्रम में गई।
¶हर एक पीड़िता बाबा को पहले से जानती थी।
¶ हर पीड़िता का परिवार बाबा का भक्त होता है।
¶हर पीड़िता व उसके परिवार को बाबा पर अन्धभरोसा होता है।
¶हर पीड़िता हादसे से पहले भी बाबा के निकट संपर्क में रही हैं।
¶करीब सभी मामलों में पीड़ित के साथ मारपीट, प्रताड़ना या अन्य तरह का शारीरिक उत्पीड़न नही हुए।
¶सभी मामलों में पीड़ित के परिवार वालों ने इस मामलों को शुरू में ही report करने की ज़रूरत नही समझी?

यहाँ सभी को एक बात पर गहराई से ध्यान देना होगा कि महिलाओं को इश्वेर ने कुदरती रूप से ये समझने की ताक़त दी है कि वो जान जाती हैं की किसकी नज़र खराब है,कौनसी हरकत गलत है , गलत तरह से छुआ जाना,या कोई अश्लील इशारे करना।ये सब आभास महिलाएं छोटी उम्र से ही समझ जाती हैं।

एक औरत होने के नाते मैं जानती हूँ की महिलाओं में गलत नीयत को जानने की शक्ति पुरुषों से कहीं ज्यादा होती है।

लेकिन इन सभी किस्सों में ये महिलाएं शुरू में ही इन इशारों को समझ कर सतर्क क्यों नही होती?

इन बलात्कारों में आरोपी बाबा उन्हें सड़क से उठा कर किसी सुनसान जगह में ले जाकर बलात्कार नही करता अपितु ये महिलाएं ये जानते हुए भी की किसी भी पुरुष के पास इस प्रकार से एकांत में रहने पर खतरा हो सकता है फिर भी जाती हैं? क्यों?

जो घरवाले उन्हें किसी लड़के के साथ बात करते देखकर भड़क जाते है क्यो अपने परिवार की स्त्रियो को पराये पुरुष के पास इस प्रकार भेजते हैं?

जो जवान लड़कियाँ इन बाबाओं का शिकार होती हैं क्या उनकी माएँ इसे आभास नही कर पाती की किस प्रकार किसी पुरुष के पास अपनी जवान बेटी को भेजने में खतरा हो सकता है?

क्यों ऐसे समयों में परिवार की कोई अन्य स्त्री या पुरुष पीड़ित के साथ नही होती?

जहाँ बाबा गलत है वहाँ भक्त भी कुछ कम गलत नहीं!

ये वो भक्त हैं जो असलियत जानकर भी अनदेखा करते हैं कुछ पाने की लालसा में कुछ खोना भी पड़ेग ये उस बात को क्यों नही समझते ?

दरअसल इन मामलों की पीड़िता कहीं ना कहीं बाबा से प्रभावित होती हैं या फिर बाबा के पास अपनी किसी इच्छा की पूर्ती या निज स्वार्थ से जाती हैं।

यदि पीड़ित को बाबा कोई नौकरी दिलाता है ,या बाबा उनहे रुपिया पैसा देता है,व्यपार में पैसा देता है,जमीन जायदाद दिलवाता है,कार्य सिद्दी के लिए influential लोगों से जिनमे धनाढ्य व्यपारी से लेकर आला दर्जे के अधिकारी व राजनैतिक व्यक्ति होते हैं, उनसे पीड़ित का संपर्क कराता है, तो फिर पीड़ित को ये बात जान लेनी चाहिये की प्रतिफल में कुछ माँगा जायेगा।

बाबाओं की पावर इतनी होती है कि हनीप्रीत जैसी लड़की अपने पति को छोड़कर अधेड़ उम्र के थुलथुल भांड जैसे बाबा की सरपरस्ती में चली जाती है? वो इन बाबाओं के साथ क्यों संपर्क बनाती हैं? मतलब साफ है पैसा व पावर!!

लोग समझते हैं कि वो बाबा की शरण से सबकुछ फ्री में पा लेंगे।
Nothing is free in life, Everything has a price

बाबा अपनी कृपा की कीमत वसूलते हैं। यदि बाबा किसी जवान औरत पर उपकार करता है तो जानता है की उसे बदले में क्या चाहिये!! जानती ये औरतें भी हैं कि बाबा की उनपर नज़र है किंतु वो सोचती हैं काम निकल जाए फिर देखेँगे।

वो पहली बार शायद बाबा का विरोध नही करती लेकिन बाद में नही चाहती कि उसकी पुनरावृति हो इस डर से या मानसिक यातना से टूट कर वो कानून की शरण लेती हैं।

यदि कोई महिला किसी काम को निकलवाने किसी पुरुष के पास जाती है तो उसे इस बात का अहसास ज़रूर होता है कि सामने बैठा पुरुष बदले में क्या चाहता है लेकिन चाहे वो पारिवारिक मजबूरी हो या आर्थिक मज़बूरी हो या महत्वकांशा कहीं ना कहीं वो महिला झुकती ज़रूर है ,इस प्रकार के बने संबंधों में पुरुष अपने द्वारा दी गई सहायता या उपकार का बदला वसूलते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या महिला स्वयं अपने को इन स्थितियों में ले जाने के लिए किस हद तक तैयार होती है?

वो परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने के लिए तो मजबूरी वश इन संबंधों के लिए तैयार हो जाती है लेकिन वो मानसिक रूप से अपने आप को इसके लिए तैयार नही कर पाती। बाद में अंतर्द्वंद के चलते वो इन घटनाओं को उजागर करने को तैयार हो जाती है।

कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में एक प्रसिद्ध धर्मगुरु की शिष्या को ज्यों ही इस बात का अहसास हुआ की स्पेशल सेवा का मतलब क्या होता है और क्यों बाबाजी स्त्रियों को कमरे में बुलाते है उसने तुरंत पुलिस को सूचित कर दिया,लेकिन सवाल ये है उससे पहले जिन महिलाओं के साथ वो सबकुछ हुआ उसे वो जानकर भी अन्य महिलाओं को सतर्क क्यों नही करती। क्यों एक महिला दूसरी महिला की रक्षा के लिए आगे नही आती?

यौन शोषण भी एक प्रकार की रिश्वत ही है, यदि कोई फ़ेवर पुरुष को दिया जाए यो कीमत रुपये में वसूली जाती है और यही फ़ेवर महिला को दिया जाये तो कीमत शारीरिक संबंध के रूप में भी मांगी जा सकती है।

रिश्वत इसलिये ली जाती है क्योंकी हम अपना काम निकालने के लिए वो कीमत देने को तैयार हैं, यौन शोषण तब होता है जब आपका उद्देश्य, होने वाले शोषण से आपके लिए कहीं ज्यादा कीमत रखता है।

आज स्थिति इतनी खराब है महिलाओं को चरित्र हनन के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है ।यदि राजनीती में प्रतिद्वंदी को रास्ते से हटाना हो तो किसी महिला को छदम रूप में विरोधी के यहां भेज दो, वो महिला बाद में किसी प्रकार के आपतिजनक फ़ोटो व वीडियो बना कर मीडिया व सोशल मीडिया में उसे छपवा देगी। scandal बनेगा और विरोधी खत्म!!

सवाल ये है कि हम महिलाएँ कहीं ना कहीं स्वयं ही ऐसी स्थितियां पैदा कर रही है जिससे यौन शोषण जैसी घटनाएं कम होने की जगह बढ़ रही हैं ।कुछ महिलाएं थोड़े में सब्र करने को तैयार नही। महत्वकांशाएँ निरंतर बढ़ रही है।

यदि महिलाएँ इन situational compromises को छोड़कर यौग्यता बढाने पर ध्यान दें एक मजबूत चरित्र को लेकर चलें तो महिलाओं की स्थिति सम्मानजनक बनेगी। महिलाएं अपने को टूल बनने से रोकें।

यदि इच्छापूर्ती या महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए आप किसी बाबा,नेता,अधिकारी या महत्वपूर्ण व्यक्ति से सम्बंध बनाने को तैयार हैं तो आप समाज मे महिलाओं के सम्मान को गिराने की ज़िम्मेदार है जिसका नुकसान सभी स्त्रीजाति को होगा।

I request all my women fellow citizens to live life with dignity and do not use short cuts.